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होली की ठिठोली-औपचारिकता निभाने तक की रह गई बात

Sat, 16 Mar 2019 12:20 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 16 Mar 2019 12:20 AM IST
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होली की ठिठोली-औपचारिकता निभाने तक की रह गई बात

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ज्ञानपुर। वो भी क्या दिन थे, जब महीनेभर पहले से ही होली के रंग फिजा में घुलने लगते थे। त्योहार की उमंग सौहार्द के रस से खिलकर मन-मयूर झंकृत करती थी। लेकिन, भौतिक जिंदगी की भागदौड़ के साथ बढ़ी रोजमर्रा की दुश्वारियों ने इस रस को ही सुखा दिया। लिहाजा होली आती है और चली जाती है, पता ही नहीं चलता। किसी जमाने में गांवों में घूम-घूम कर फाग गाने और दूधभंग की खुमारी में होलियाना माहौल की तस्दीक रह चुके गोपीनाथ उपाध्याय यह कहते हुए थोड़े से निराश हो जाते हैं।
कहते हैं परंपराओं के लोप के साथ त्योहार की खुशियां भी गुम हो गईं। जिंदगी ऐसी मशीन हो गई कि मन के भाव भी चेहरे पर नहीं आ पाते। होली का त्योहार सिर्फ औपचारिकता निभाने तक ही सीमित होकर रह गई है। महंगाई ने गुझिया की मिठास को फीका कर आपसी होली के सौहार्द को फुहड़पन के मुंहाने पर लाकर छोड़ दिया है। राम क पुरा गांव निवासी उपाध्याय कहते हैं कि ज्यादा नहीं तीन-चार दशक पहले और अब के माहौल में परिवर्तन आ गया है। न तो वह रस रह गया और न ही मिठास। चारों तरफ मनमुटाव ही देखने को मिलता है।
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त्योहार के दिन कोई किसी के यहां जाने से बार-बार सोचता है। नहीं तो पहले होली की खुमारी त्योहार के एक सप्ताह पहले लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगती थी। घरों में बनने वाले पकवानों की तैयारी लोग एक दिन पहले से ही करने लगते थे। रसभंगा की बात की जाए या होली जलाने की, हर काम में उत्साह था। हर जगह आपसी एकता का परिचय देकर लोग रस्म निभाते थे। जगह-जगह अबीर-गुलाल से रंगे कपड़ों को पहनकर टीम भावना से फाग गीत कुछ अलग ही माहौल बनाती थी। वर्तमान समय में बजने वाले गीतों को सुनकर ही लोग मुंह छिपा लेते हैं। सड़क पर कोई निकलना नहीं चाहता। पुरुष के साथ ही महिलाओं की टोली सामाजिक रीति-रिवाज को पिरोते हुए मिठास पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी। रंग हो या फिर खानपान के सामान खाने लायक नहीं रह गए हैं। मिलावटी खोवा सेहत को बिगाड़ने में भूमिका निभाने लगा है। पहले की गुझिया में गुड़ और सोंठ की खुशबू एक सप्ताह आगे तक लोगों को नशे में रखती थी। आज कोई भी पुरानी परंपरा को निभाने की बजाए औपचारिकता तक सीमित हो गई है। काश! होली का वही मीठापन फिर आ जाता...।
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