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Basti News: जीवनदान मिले न मिले... आईसीयू, वेंटिलेटर बना रहा कंगाल

Thu, 20 Mar 2025 12:23 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती Updated Thu, 20 Mar 2025 12:23 AM IST
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Whether life is saved or not... ICU and ventilator are making people poor
संवाद न्यूज एजेंसी
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बस्ती। निजी अस्पतालों में जीवनदान मिले न मिले, मगर आईसीयू-वेंटिलेटर की सुविधा के नाम पर दो-चार दिन में आप कंगाल जरूर हो जाएंगे। इसके बाद जेवर, गहने और संपत्ति बेचकर इलाज कराना होगा।
सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों को जीवन रक्षक प्रणाली पर रखने जैसी कोई व्यवस्था न होने का फायदा मरीज माफिया उठा रहे हैं। जैसे ही किसी मरीज की हालत बिगड़ती है इनकी चांदी हो जाती है। फिर मरीज माफिया आईसीयू बताकर मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती करा रहे हैं। जहां बिना विशेषज्ञ चिकित्सक के ही बेहिसाब बिल बन रहा है।
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चिकित्सा के क्षेत्र में मरीज माफिया हाबी हो चुके हैं। इनके काकस को तोड़ पाना आसान नहीं है। इसमें विभाग से लेकर सरकारी अस्पतालों के जिम्मेदारों तक की मिलीभगत है। यही वजह है कि शासन की सख्ती के बाद भी निजी अस्पतालों में जांच के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी हो रही है।
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जानकार बताते हैं कि निष्पक्ष जांच हो तो अधिकतर निजी अस्पतालों में ताला लटक जाएगा। क्योंकि इनके पास अल्ट्रासाउंड, पैथोलॉजिस्ट, हार्ट, किडनी, न्यूरो, एनेस्थीसिया से संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक पंजीकृत नहीं हैं। बावजूद इसके यहां सर्जरी, हार्ट अटैक के गंभीर मरीजों को आईसीयू दिखाकर भर्ती लिया जा रहा है। ऐसे मरीजों से 24 घंटे में 15 से 20 हजार रुपये बिल वसूल किया जा रहा है।
प्रभात कुमार ने बताया कि उनके मरीज को कैली से गंभीर बताकर रेफर कर दिया गया। वह निजी एंबुलेंस से लखनऊ ले जाने के लिए निकले। रास्ते में एंबुलेंस चालक ने तत्काल राहत पाने के लिए शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी। उसके कहने पर हम मरीज लेकर संबंधित अस्पताल पहुंच गए।
जहां रिसेप्शन काउंटर पर तत्काल उनसे 10 हजार रुपये जमा करा लिए गए। उनके मरीज को आईसीयू में भर्ती किया गया। रात भर इंतजार के बाद भी कोई विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं आया। अस्पताल में मौजूद स्टॉफ ही दवा-इलाज का जिम्मा निभा रहे थे। एक दिन आईसीयू में रखने का चार्ज छह हजार रुपये बताया गया।
वहीं अमरनाथ ने बताया कि बस्ती के निजी अस्पतालों में लखनऊ और गोरखपुर से महंगा इलाज है। इसके बाद भी मरीज के ठीक होने की गारंटी नहीं है। यहां तत्काल देखने के नाम पर प्राइवेट चिकित्सक की फीस 700 रुपये है।

जांच और दवा में 50 प्रतिशत से ज्यादा कमीशन का खेल है। इन अस्पतालों में मरीज के प्रति मानवता देखने को नहीं मिलती। मरीज और उसके परिजन आर्थिक रूप से कंगाल हो जाते हैं।
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