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परनाना का घर खोजने हॉलैंड से पहुंचीं सफीकन
ब्यूरो/अमर उजाला बस्ती
Updated Thu, 10 May 2018 11:41 PM IST
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परनाना के पैतृक गांव खोजने डिंगरापुर पहुंची एनआरआई सफीकन गुलाम हैदर।
- फोटो : अमर उजाला
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कलवारी। मातृभूमि के मोहपाश में बंधकर अपनी जड़ों की तलाश में हॉलैंड की प्रवासी भारतीय महिला सफीकन गुुलाम हैदर बस्ती के गांवों तक पहुंच गईं। बुधवार दोपहर बाद अपने परनाना के गांव डिंगरापुर को खोजते हुए वे कलवारी थाने पर पहुंचीं। यहां से जब वे गांव पहुंचीं तो लोगों ने बताया कि गांव में कोई भी मुस्लिम परिवार नहीं है। इसके बाद वे हरिपालपुर के लिए रवाना हुईं जहां उन्हें बताया गया कि उनके वंशज पैकोलिया थाना क्षेत्र के कुर्दा गांव में रहते हैं।
गांव-गांव भटकती सफीकन फिर भी निराश नहीं हुईं। मन में अपने पूर्वजों के गांव की माटी का सोंधापन महसूस करने की आस लिए सफीकन गुलाम हैदर अपने परनाना के वंशजों से मिलने के लिए कुर्दा गांव चली गई हैं। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में 48 वर्षीया सफीकन गुलाम हैदर ने बताया कि उनके परनाना का नाम बकरीदी था। वर्ष 1898 में वे यहां से कोलकाता होते हुए हॉलैंड पहुंच गये। उनके नाना खुदाबक्श ने हॉलैंड के सूर्यनम शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया और वहीं के होकर रह गए। सफीकन की मां ओमीदा व पिता पेओनिया का जन्म भी वहीं हुआ। कहा कि उनकी शादी वहीं गुलाम हैदर से हुई है।
अपने परनाना के वंशजों से मिलने के लिए आतुर सफीकन ने बताया कि वे भारत घूमने आई थीं। मन में अपने पूर्वजों के पैतृक गांव देखने की इच्छा बलवती हुई तो यहां तक खिंची चली आई हैं। उप्र पर्यटन विभाग की मदद से लखनऊ से यहां पहुंची हैं। यहां पता चला कि यह गांव दुबौलिया थाने में पड़ता है। कलवारी थाने के प्रभारी संजय शुक्ल ने उनकी मदद करते हुए उन्हें डिंगरापुर भेजा, जहां उन्हें अपने वंशजों के बारे में पता चला है। कहती हैं कि वे कुर्दा जाकर उस माटी को जरूर नमन करेंगी जिसमें मेरे परनाना पले-बढ़े।
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गांव-गांव भटकती सफीकन फिर भी निराश नहीं हुईं। मन में अपने पूर्वजों के गांव की माटी का सोंधापन महसूस करने की आस लिए सफीकन गुलाम हैदर अपने परनाना के वंशजों से मिलने के लिए कुर्दा गांव चली गई हैं। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में 48 वर्षीया सफीकन गुलाम हैदर ने बताया कि उनके परनाना का नाम बकरीदी था। वर्ष 1898 में वे यहां से कोलकाता होते हुए हॉलैंड पहुंच गये। उनके नाना खुदाबक्श ने हॉलैंड के सूर्यनम शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया और वहीं के होकर रह गए। सफीकन की मां ओमीदा व पिता पेओनिया का जन्म भी वहीं हुआ। कहा कि उनकी शादी वहीं गुलाम हैदर से हुई है।
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अपने परनाना के वंशजों से मिलने के लिए आतुर सफीकन ने बताया कि वे भारत घूमने आई थीं। मन में अपने पूर्वजों के पैतृक गांव देखने की इच्छा बलवती हुई तो यहां तक खिंची चली आई हैं। उप्र पर्यटन विभाग की मदद से लखनऊ से यहां पहुंची हैं। यहां पता चला कि यह गांव दुबौलिया थाने में पड़ता है। कलवारी थाने के प्रभारी संजय शुक्ल ने उनकी मदद करते हुए उन्हें डिंगरापुर भेजा, जहां उन्हें अपने वंशजों के बारे में पता चला है। कहती हैं कि वे कुर्दा जाकर उस माटी को जरूर नमन करेंगी जिसमें मेरे परनाना पले-बढ़े।
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