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Basti News: अधोमानक दवाओं में दोगुने से अधिक का मुनाफा
Thu, 18 Apr 2024 11:59 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Thu, 18 Apr 2024 11:59 PM IST
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निजी अस्पतालों में मरीजों के पर्चे पर ब्रांडेड की दवाएं लिखने से परहेज
कुछ जगहों पर गैर प्रांतों से अस्पताल संचालक खुद मंगवा रहे दवाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। मरीज के रूप में बच्चे हों या बुजुर्ग या जवान। सभी के पर्चे पर सेटिंग की दवाएं जरूर मिलेंगी। इनके बेहतर इलाज की परवाह धरती के दूसरे भगवान को नहीं है। निजी अस्पतालों में यह खेल ज्यादातर देखने को मिल रहा है। मरीज के पर्चे पर ब्रांडेड दवाओं के मिलते-जुलते नाम की अधोमानक दवाएं लिखी जा रही हैं। इसमें दवा सप्लायर, विक्रेता से लेकर चिकित्सक तक के मोटी कमाई की हसरत पूरी हो रही है। अधोमानक दवाओं में दोगुने से अधिक का मुनाफा है।
दवा कारोबारी उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल से दवा मंगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इससे मरीजों की जेब ढीली होने के साथ ही बीमारी भी जल्द ठीक नहीं होती है। क्योंकि इन दवाओं में मानक के मुताबिक साल्ट नहीं पाए जाते हैं। इस वजह से बीमारी ठीक करने में यह उतनी कारगर नहीं होती है जितना कि ब्रांडेड।
नकली और अधोमानक दवाओं का धंधा आजकल फिजिशियन सैंपल की दवाओं के रूप में चल रहा है। सूत्रों की माने तो मेरठ, आगरा, दिल्ली व कानपुर से बड़े स्तर पर ऐसी दवाओं की सप्लाई की जा रही है। दवा बाजार में सब स्टैंडर्ड या अधोमानक दवाओं का खेल काफी गहरे तक जड़ जमा चुकी हैं। छोटे-छोटे कस्बों और बाजारों में बड़े ब्रांड की दवाओं वाले नाम पर यह दवाएं बिक रही हैं। ऐसे मामलों में बड़ी कार्रवाई कम ही होती है। लिहाजा यह धंधा तेजी से फल-फूल रहा है।
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दवा कारोबार से जुड़े प्रसन्नजीत ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में छोटे-छोटे मेडिकल स्टोर संचालक ही आसपास के लोगों के लिए डॉक्टर की भूमिका में भी होते हैं। वे सर्दी-जुकाम, एसिडिटी, दर्द आदि की दवाएं खुद ही मरीज को लक्षण पूछकर दे देते हैं। वे ही ऐसी दवाओं की बिक्री के सबसे बड़े माध्यम बनते हैं। क्योंकि वे मरीजों को फुटकर में दवा देते हैं। दवा देते हुए पत्ते को इस तरह से काटते हैं कि उसका नाम बड़े ब्रांड जैसा प्रतीत हो। एक दवा कारोबारी ने बताया कि अधोमानक दवा के खेल में रेट का अंतर बहुत होता है। 40 रुपये पत्ते की दवा पर रेट 100 से 150 रुपये अंकित रहता है।
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अस्पताल संचालक खुद करने लगे दवा का धंधा
शहर एवं कस्बों में निजी अस्पताल के कुछ संचालक दवा के धंधे में खुद उतर गए हैं। उनकी अपनी फर्म है और उत्तराखंड, हिमाचल आदि शहरों से ब्रांडेड दवाओं की तर्ज पर विभिन्न साल्ट की दवाएं मंगवाई जा रही है। इसकी खपत उनके अस्पताल में ही हो जा रही है। यह धंधा दिन दूना रात चौगुना मालामाल करने वाला है। इन अधोमानक दवाओं में अनुमानित लागत 20 से 25 प्रतिशत का आता है। बाकी मुनाफा है। जबकि ब्रांडेड दवाओं में कुल मुनाफा 20 से 25 प्रतिशत का है। इसीलिए अपनी दवा मंगाने में कमाई ज्यादा है।
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प्रतिष्ठित डॉक्टर के पर्चे पर दिखती है ब्रांडेड दवाएं
जिले के कुछ नामचीन डॉक्टरों के ही पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं लिखी हुई मिलती हैं। प्रतिष्ठित कंपनियों की दवाएं लिखने वाले चिकित्सकों की संख्या कम है। ऐसे चिकित्सकों के यहां एजेंट के रूप में दवा कारोबारी कम पहुंचते है। केवल प्रतिष्ठित कंपनियों के एजेंट ही इन चिकित्सकों के पास आते हैं। हालांकि दलालों की घुसपैठ न होने से यहां मरीजों की संख्या कम रहती है। जागरूक एवं पढ़े लिखे मरीज ही इन चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं।
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इन दवाओं में है झोल
अधोमानक दवाएं तो सभी तरह के साल्ट में उपलब्ध है। ज्यादातर गैस के लिए डीएसआर, दर्द के लिए एसपी, एंटीबाॅयोटिक में क्लेवाम फार्म की दवाएं मंगाई जा रही है। इनकी खपत बाजार में ज्यादा है। अमूमन हर मर्ज में इन दवाओं की जरूरत होती है। इसीलिए इन दवाओं की खेप अलग- अलग नाम से बाजार में आ रही है।
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जांच के लिए भेजे गए हैं 140 नमूने
वर्ष 2023 में जिले भर से 140 दवाओं के नमूने लिए गए। विभाग ने इन दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए विभिन्न लैब में भेजा। अब तक महज सात दवाओं का रिजल्ट प्राप्त हो सका है। इसमें से एक दवा अधोमानक पाई गई है। लेकिन अभी इसके बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है। गैर प्रांत की निर्मित इस दवा से संबंधित कंपनी के खिलाफ कार्रवाई के लिए संबंधित राज्य को लिखा गया है। ऐसे में जब तक कुछ निष्कर्ष सामने आएगा तब तक बाजार में उपलब्ध यह दवाएं बिक जाएंगी।
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ब्रांडेड दवाओं पर भरोसा ज्यादा
वरिष्ठ परार्शदात डाॅ. पीके श्रीवास्तव ने कहा कि ब्रांडेड दवाओं पर भरोसा ज्यादा रहता है। यह बीमारी को ठीक करने में ज्यादा कारगर होती है। क्योंकि इसके निर्माण में मॉनिटरिंग ज्यादा होती है। संबंधित कंपनियां अपने ब्रांड की साख बचाने के लिए तत्पर रहती हैं। इसके अलावा अन्य नाम की दवाएं भी गुणवत्ता परक हो सकती है। इसके लिए पूंजी और तत्परता दोनों होना चाहिए। किसी भी प्रोडेक्ट की गुणवत्ता कायम रखकर मोटी कमाई करना मुशिकल रहता है।
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कोट
अधोमानक दवाओं पर अंकुश लगाने के लिए निरंतर जांच की जाती है। यहां तक कि सरकारी अस्पतालों में आपूर्ति की जा रही दवाओं के भी नमूने नियमित लिए जा रहे हैं। एक साल के भीतर केवल एक दवा की रिपोर्ट अधोमानक पाई गई है।
-अरविंद कुमार, औषधि निरीक्षक
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कुछ जगहों पर गैर प्रांतों से अस्पताल संचालक खुद मंगवा रहे दवाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। मरीज के रूप में बच्चे हों या बुजुर्ग या जवान। सभी के पर्चे पर सेटिंग की दवाएं जरूर मिलेंगी। इनके बेहतर इलाज की परवाह धरती के दूसरे भगवान को नहीं है। निजी अस्पतालों में यह खेल ज्यादातर देखने को मिल रहा है। मरीज के पर्चे पर ब्रांडेड दवाओं के मिलते-जुलते नाम की अधोमानक दवाएं लिखी जा रही हैं। इसमें दवा सप्लायर, विक्रेता से लेकर चिकित्सक तक के मोटी कमाई की हसरत पूरी हो रही है। अधोमानक दवाओं में दोगुने से अधिक का मुनाफा है।
दवा कारोबारी उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल से दवा मंगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इससे मरीजों की जेब ढीली होने के साथ ही बीमारी भी जल्द ठीक नहीं होती है। क्योंकि इन दवाओं में मानक के मुताबिक साल्ट नहीं पाए जाते हैं। इस वजह से बीमारी ठीक करने में यह उतनी कारगर नहीं होती है जितना कि ब्रांडेड।
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नकली और अधोमानक दवाओं का धंधा आजकल फिजिशियन सैंपल की दवाओं के रूप में चल रहा है। सूत्रों की माने तो मेरठ, आगरा, दिल्ली व कानपुर से बड़े स्तर पर ऐसी दवाओं की सप्लाई की जा रही है। दवा बाजार में सब स्टैंडर्ड या अधोमानक दवाओं का खेल काफी गहरे तक जड़ जमा चुकी हैं। छोटे-छोटे कस्बों और बाजारों में बड़े ब्रांड की दवाओं वाले नाम पर यह दवाएं बिक रही हैं। ऐसे मामलों में बड़ी कार्रवाई कम ही होती है। लिहाजा यह धंधा तेजी से फल-फूल रहा है।
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दवा कारोबार से जुड़े प्रसन्नजीत ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में छोटे-छोटे मेडिकल स्टोर संचालक ही आसपास के लोगों के लिए डॉक्टर की भूमिका में भी होते हैं। वे सर्दी-जुकाम, एसिडिटी, दर्द आदि की दवाएं खुद ही मरीज को लक्षण पूछकर दे देते हैं। वे ही ऐसी दवाओं की बिक्री के सबसे बड़े माध्यम बनते हैं। क्योंकि वे मरीजों को फुटकर में दवा देते हैं। दवा देते हुए पत्ते को इस तरह से काटते हैं कि उसका नाम बड़े ब्रांड जैसा प्रतीत हो। एक दवा कारोबारी ने बताया कि अधोमानक दवा के खेल में रेट का अंतर बहुत होता है। 40 रुपये पत्ते की दवा पर रेट 100 से 150 रुपये अंकित रहता है।
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अस्पताल संचालक खुद करने लगे दवा का धंधा
शहर एवं कस्बों में निजी अस्पताल के कुछ संचालक दवा के धंधे में खुद उतर गए हैं। उनकी अपनी फर्म है और उत्तराखंड, हिमाचल आदि शहरों से ब्रांडेड दवाओं की तर्ज पर विभिन्न साल्ट की दवाएं मंगवाई जा रही है। इसकी खपत उनके अस्पताल में ही हो जा रही है। यह धंधा दिन दूना रात चौगुना मालामाल करने वाला है। इन अधोमानक दवाओं में अनुमानित लागत 20 से 25 प्रतिशत का आता है। बाकी मुनाफा है। जबकि ब्रांडेड दवाओं में कुल मुनाफा 20 से 25 प्रतिशत का है। इसीलिए अपनी दवा मंगाने में कमाई ज्यादा है।
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प्रतिष्ठित डॉक्टर के पर्चे पर दिखती है ब्रांडेड दवाएं
जिले के कुछ नामचीन डॉक्टरों के ही पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं लिखी हुई मिलती हैं। प्रतिष्ठित कंपनियों की दवाएं लिखने वाले चिकित्सकों की संख्या कम है। ऐसे चिकित्सकों के यहां एजेंट के रूप में दवा कारोबारी कम पहुंचते है। केवल प्रतिष्ठित कंपनियों के एजेंट ही इन चिकित्सकों के पास आते हैं। हालांकि दलालों की घुसपैठ न होने से यहां मरीजों की संख्या कम रहती है। जागरूक एवं पढ़े लिखे मरीज ही इन चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं।
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इन दवाओं में है झोल
अधोमानक दवाएं तो सभी तरह के साल्ट में उपलब्ध है। ज्यादातर गैस के लिए डीएसआर, दर्द के लिए एसपी, एंटीबाॅयोटिक में क्लेवाम फार्म की दवाएं मंगाई जा रही है। इनकी खपत बाजार में ज्यादा है। अमूमन हर मर्ज में इन दवाओं की जरूरत होती है। इसीलिए इन दवाओं की खेप अलग- अलग नाम से बाजार में आ रही है।
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जांच के लिए भेजे गए हैं 140 नमूने
वर्ष 2023 में जिले भर से 140 दवाओं के नमूने लिए गए। विभाग ने इन दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए विभिन्न लैब में भेजा। अब तक महज सात दवाओं का रिजल्ट प्राप्त हो सका है। इसमें से एक दवा अधोमानक पाई गई है। लेकिन अभी इसके बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है। गैर प्रांत की निर्मित इस दवा से संबंधित कंपनी के खिलाफ कार्रवाई के लिए संबंधित राज्य को लिखा गया है। ऐसे में जब तक कुछ निष्कर्ष सामने आएगा तब तक बाजार में उपलब्ध यह दवाएं बिक जाएंगी।
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ब्रांडेड दवाओं पर भरोसा ज्यादा
वरिष्ठ परार्शदात डाॅ. पीके श्रीवास्तव ने कहा कि ब्रांडेड दवाओं पर भरोसा ज्यादा रहता है। यह बीमारी को ठीक करने में ज्यादा कारगर होती है। क्योंकि इसके निर्माण में मॉनिटरिंग ज्यादा होती है। संबंधित कंपनियां अपने ब्रांड की साख बचाने के लिए तत्पर रहती हैं। इसके अलावा अन्य नाम की दवाएं भी गुणवत्ता परक हो सकती है। इसके लिए पूंजी और तत्परता दोनों होना चाहिए। किसी भी प्रोडेक्ट की गुणवत्ता कायम रखकर मोटी कमाई करना मुशिकल रहता है।
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कोट
अधोमानक दवाओं पर अंकुश लगाने के लिए निरंतर जांच की जाती है। यहां तक कि सरकारी अस्पतालों में आपूर्ति की जा रही दवाओं के भी नमूने नियमित लिए जा रहे हैं। एक साल के भीतर केवल एक दवा की रिपोर्ट अधोमानक पाई गई है।
-अरविंद कुमार, औषधि निरीक्षक