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Basti News: ओवरफ्लो हुआ मेडिकल कॉलेज का प्रसूता वार्ड
Mon, 09 Oct 2023 12:42 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Mon, 09 Oct 2023 12:42 AM IST
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- हाई ब्लडप्रेशर, कम हीमोग्लोबिन पर भर्ती नहीं ली जा रहीं प्रसव पीड़ा से कराहतीं महिलाएं
- मेडिकल कॉलेज में क्षमता से अधिक मरीज हुए भर्ती, बरामदों में लगाना पड़ा अतिरिक्त बेड
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। प्रसव पीड़ा से कराहती महिलाओं को पीएचसी, सीएचसी से लगायत जिला महिला अस्पताल तक शरण नहीं मिल पा रहा है। थोड़ी गंभीर स्थिति होने पर इन मरीजों के साथ रेफर-टू-रेफर का खेल खेला जा रहा है। जिससे मेडिकल कॉलेज का प्रसूता वार्ड ओवरफ्लो हो गया है। वार्ड के बाहर बरामदों में प्रसूताओं के लिए अतिरिक्त बेड लगाए गए हैं। इस अव्यवस्था के चलते दलालों की चांदी हो गई है। वह सरकारी अस्पतालों में सकि्रय हो गए हैं। मरीज के भर्ती न होने की स्थिति में उनकी दाल गल जा रही है और निजी एवं छद्दम अस्पतालों की ओर उन्हें रवाना कर दे रहे हैं।
प्रसूता रोगियाें को सरकारी अस्पतालों में भर्ती करना बड़ी चुनौती है। सबकुछ नार्मल होने के बाद भी सीएचसी, पीएचसी स्तर पर इन्हें भर्ती नहीं लिया जा रहा है। यहां से जिला महिला अस्पताल के लिए रेफर किया जा रहा है। जिला महिला अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचने पर मरीजों की भर्ती प्रकि्रया नहीं पूरी की जा रही है। यहां उन्हें वापस लौटाने की पहले हर जुगत की जा रही है। मरीज के परिजनों से जांच से संबंधित प्रपत्र मांगे जा रहे हैं। इसमें यदि खून, पानी आदि की कमी का उल्लेख मिल रहा है तो डिलेवरी कराने से जिम्मेदार हाथ खड़े कर दे रहे हैं। इस परिस्थिति में मरीज को भर्ती ही नहीं किया जा रहा है। तत्काल मेडिकल कॉलेज जाने का सुझाव दे दिया जा रहा है। यहीं वहज है इन दिनों मेडिकल कॉलेज पर प्रसूता मरीजों के इलाज का दबाव बढ़ गया है।
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60 बेड के वार्ड में 97 मरीज भर्ती
मेडिकल कॉलेज के प्रसूता विभाग के 60 बेड के वार्ड मरीजों से ठसाठस भरे हुए हैं। वर्तमान यहां 97 प्रसूताओं को भर्ती किया गया है। वार्ड में बेड पर मरीज है और नीचे फर्श पर तीमारदार पड़े हुए हैं। हाउसफुल वार्ड में अव्यवस्था का बोलबाला है। वहीं बाहर बरामदे में भी मरीजों की बढ़ी तादाद के चलते 50 अतिरिक्त बेड लगाए गए हैं। अंदर जगह न होने से प्रसूताओं को बरामदे में ही भर्ती किया गया है। यहां आना-जाना सभी का रहता है। ऐसे में आपरेशन केस से जुड़े मरीजों में संक्रमण फैलने का भी भय बना हुआ है।
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ओपीडी में पहुंच रहे 150 से 200 मरीज
मेडिकल कॉलेज प्रसूत रोग विभाग की ओपीडी में भी मरीजों का दबाव बढ़ गया है। यहां प्रतिदिन डेढ़ सौ से दो सौ मरीज पहुंच रहे हैं। उनके साथ तीमारदार भी होने से भीड़ बढ़ जा रही है। ओपीडी में चिकित्सक कक्ष से लेकर बाहर प्रतीक्षालय तक मरीज और तीमारदारों की कसमकस भीड़ बनी हुई है। कुर्सियों के अलावा लोग फर्श पर ही बैठकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं।
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दलाल कांट रहे मलाई
अस्पतालों की स्थिति बिगड़ने पर दलालों की चांदी हो गई है। वह ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों से लेकर जिला महिला चिकित्सालय एवं मेडिकल कॉलेज तक सकि्रय हो गए हैं। जैसी मरीज को भर्ती करने से इनकार किया जाता है वह उनके संपर्क में आ जा रहे हैं। किसी भी तरह समझाबुझाकर मरीजों को अपने सेटिंग के निजी अस्पताल में पहुंचा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज और महिला अस्पताल में दलालों की भरमार है।
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आप भी जानिए वाकया एक मरीज का
बहु को प्रसव पीड़ा हुई पहले सल्टौआ सीएचसी लेकर पहुंचे। वहां चिकित्सक मौजूद नहीं थे, महिला स्टॉफ ने थोड़ा बहुत देखकर जिला महिला अस्पताल जाने को कहा। न मरीज का पर्चा बना और न ही कोई लिखा पढ़ी हुई। वहां से तुरंत हम लोग महिला अस्पताल चले आए। रात लगभग दस बज रहे थे। स्टॉफ नर्स ने मरीज को अंदर बुलाया। कुछ देर बाद चिकित्सक आए और जांच रिपोर्ट मांगे। उन्हें सभी जांच दिखाया गया। इसमें हीमोग्लोबिन 9 प्वाइंट देखते ही चिकित्सक ने भर्ती करने से मना कर दिया। यहां भी लिखा पढ़ी किए बगैर मेडिकल कॉलेज जाने को कह दिया गया। मेडिकल कॉलेज 12 बजे रात में पहुंचे अगले दिन नार्मल डिलेवरी हुई। वाकया 5 सितंबर का है।
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50-50 पर होती है दलालों की सेटिंग
निजी अस्पतालों में मरीजों को पहुंचाने पर दलालों को 50 प्रतिशत कमीशन मिलता है। इसीलिए इस कार्य में स्वास्थ्य महकमे से जुड़े कुछ कर्मचारी, निजी एंबुलेंस चालक एवं अन्य प्राइवेट लोग लगे रहते हैं। ऐसे में दिन भर में एक दलाल को यदि एक केस भी मिल जाता है तो उसका काम पूरा हो जाता है। मरीज के डिस्चार्ज होने के बाद तैयार बिल के अनुसार दलाल को उसका हिस्सा दे दिया जाता है।
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केस- एक
जिला महिला अस्पताल में प्रसूता को लेकर पहुंचे थे। यहां हाई ब्लडप्रेशकर बताकर मरीज भर्ती करने से मना कर दिया गया। हम लोग परेशान हो गए तभी एक महिला ने सुझाव दिया कि थोड़ी दूर पर एक निजी अस्पताल है वहां सकुशल डिलेवरी करा दी जाएगी। वह हम लोगों के साथ चलकर मरीज को उस अस्पताल में भर्ती कराई। 35 हजार रुपये का बिल बना और आपरेशन से बच्चा पैदा हुआ।-- -
राम प्रगट, बनकटी।
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केस- दो
मै अपनी बेटी को लेकर मेडिकल कॉलेज आई थी। यहां भीड़ देखकर उसने भर्ती होने से मना कर दिया। बाहर आए तो एक प्राइवेट एंबुलेंस चालक मिला। उसने दो तीन प्राइवेट अस्पतालों का नाम बताया। उसके एंबुलेंस से हम लोग उसी के बताए हुए दक्षिण दरवाजा स्थित एक निजी अस्पताल में गए। वहां आपरेशन से डिलेवरी हुई। सात दिन भर्ती रहे। 38 हजार रुपये बिल भुगतान करना पड़ा।
शोभा देवी, शिवा कालोनी।
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हमारे यहां प्रसूता रोगियों का दबाव ज्यादा है। 60 बेड का वार्ड है लेकिन, 97 मरीज भर्ती किए गए हैं। जिससे कुछ अव्यवस्था हुई है। फिर भी मरीजों को सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है।
डॉ. एएन प्रसाद, सीएमएस, ओपेक चिकित्सालय कैली।
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अस्पताल में आने वाले मरीजों को तत्काल इलाज की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। गंभीर स्थिति में ही रेफर किए जा रहे हैं। चिकित्सकों को निर्देश है कि मरीजों को भर्ती करने के बाद ही रेफर किया जाए। दलालों का प्रवेश वर्जित है। कैमरे से निगरानी भी होती है।
डॉ. पीके श्रीवास्तव, सीएमएस, महिला अस्पताल
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- मेडिकल कॉलेज में क्षमता से अधिक मरीज हुए भर्ती, बरामदों में लगाना पड़ा अतिरिक्त बेड
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। प्रसव पीड़ा से कराहती महिलाओं को पीएचसी, सीएचसी से लगायत जिला महिला अस्पताल तक शरण नहीं मिल पा रहा है। थोड़ी गंभीर स्थिति होने पर इन मरीजों के साथ रेफर-टू-रेफर का खेल खेला जा रहा है। जिससे मेडिकल कॉलेज का प्रसूता वार्ड ओवरफ्लो हो गया है। वार्ड के बाहर बरामदों में प्रसूताओं के लिए अतिरिक्त बेड लगाए गए हैं। इस अव्यवस्था के चलते दलालों की चांदी हो गई है। वह सरकारी अस्पतालों में सकि्रय हो गए हैं। मरीज के भर्ती न होने की स्थिति में उनकी दाल गल जा रही है और निजी एवं छद्दम अस्पतालों की ओर उन्हें रवाना कर दे रहे हैं।
प्रसूता रोगियाें को सरकारी अस्पतालों में भर्ती करना बड़ी चुनौती है। सबकुछ नार्मल होने के बाद भी सीएचसी, पीएचसी स्तर पर इन्हें भर्ती नहीं लिया जा रहा है। यहां से जिला महिला अस्पताल के लिए रेफर किया जा रहा है। जिला महिला अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचने पर मरीजों की भर्ती प्रकि्रया नहीं पूरी की जा रही है। यहां उन्हें वापस लौटाने की पहले हर जुगत की जा रही है। मरीज के परिजनों से जांच से संबंधित प्रपत्र मांगे जा रहे हैं। इसमें यदि खून, पानी आदि की कमी का उल्लेख मिल रहा है तो डिलेवरी कराने से जिम्मेदार हाथ खड़े कर दे रहे हैं। इस परिस्थिति में मरीज को भर्ती ही नहीं किया जा रहा है। तत्काल मेडिकल कॉलेज जाने का सुझाव दे दिया जा रहा है। यहीं वहज है इन दिनों मेडिकल कॉलेज पर प्रसूता मरीजों के इलाज का दबाव बढ़ गया है।
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60 बेड के वार्ड में 97 मरीज भर्ती
मेडिकल कॉलेज के प्रसूता विभाग के 60 बेड के वार्ड मरीजों से ठसाठस भरे हुए हैं। वर्तमान यहां 97 प्रसूताओं को भर्ती किया गया है। वार्ड में बेड पर मरीज है और नीचे फर्श पर तीमारदार पड़े हुए हैं। हाउसफुल वार्ड में अव्यवस्था का बोलबाला है। वहीं बाहर बरामदे में भी मरीजों की बढ़ी तादाद के चलते 50 अतिरिक्त बेड लगाए गए हैं। अंदर जगह न होने से प्रसूताओं को बरामदे में ही भर्ती किया गया है। यहां आना-जाना सभी का रहता है। ऐसे में आपरेशन केस से जुड़े मरीजों में संक्रमण फैलने का भी भय बना हुआ है।
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ओपीडी में पहुंच रहे 150 से 200 मरीज
मेडिकल कॉलेज प्रसूत रोग विभाग की ओपीडी में भी मरीजों का दबाव बढ़ गया है। यहां प्रतिदिन डेढ़ सौ से दो सौ मरीज पहुंच रहे हैं। उनके साथ तीमारदार भी होने से भीड़ बढ़ जा रही है। ओपीडी में चिकित्सक कक्ष से लेकर बाहर प्रतीक्षालय तक मरीज और तीमारदारों की कसमकस भीड़ बनी हुई है। कुर्सियों के अलावा लोग फर्श पर ही बैठकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं।
दलाल कांट रहे मलाई
अस्पतालों की स्थिति बिगड़ने पर दलालों की चांदी हो गई है। वह ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों से लेकर जिला महिला चिकित्सालय एवं मेडिकल कॉलेज तक सकि्रय हो गए हैं। जैसी मरीज को भर्ती करने से इनकार किया जाता है वह उनके संपर्क में आ जा रहे हैं। किसी भी तरह समझाबुझाकर मरीजों को अपने सेटिंग के निजी अस्पताल में पहुंचा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज और महिला अस्पताल में दलालों की भरमार है।
आप भी जानिए वाकया एक मरीज का
बहु को प्रसव पीड़ा हुई पहले सल्टौआ सीएचसी लेकर पहुंचे। वहां चिकित्सक मौजूद नहीं थे, महिला स्टॉफ ने थोड़ा बहुत देखकर जिला महिला अस्पताल जाने को कहा। न मरीज का पर्चा बना और न ही कोई लिखा पढ़ी हुई। वहां से तुरंत हम लोग महिला अस्पताल चले आए। रात लगभग दस बज रहे थे। स्टॉफ नर्स ने मरीज को अंदर बुलाया। कुछ देर बाद चिकित्सक आए और जांच रिपोर्ट मांगे। उन्हें सभी जांच दिखाया गया। इसमें हीमोग्लोबिन 9 प्वाइंट देखते ही चिकित्सक ने भर्ती करने से मना कर दिया। यहां भी लिखा पढ़ी किए बगैर मेडिकल कॉलेज जाने को कह दिया गया। मेडिकल कॉलेज 12 बजे रात में पहुंचे अगले दिन नार्मल डिलेवरी हुई। वाकया 5 सितंबर का है।
50-50 पर होती है दलालों की सेटिंग
निजी अस्पतालों में मरीजों को पहुंचाने पर दलालों को 50 प्रतिशत कमीशन मिलता है। इसीलिए इस कार्य में स्वास्थ्य महकमे से जुड़े कुछ कर्मचारी, निजी एंबुलेंस चालक एवं अन्य प्राइवेट लोग लगे रहते हैं। ऐसे में दिन भर में एक दलाल को यदि एक केस भी मिल जाता है तो उसका काम पूरा हो जाता है। मरीज के डिस्चार्ज होने के बाद तैयार बिल के अनुसार दलाल को उसका हिस्सा दे दिया जाता है।
केस- एक
जिला महिला अस्पताल में प्रसूता को लेकर पहुंचे थे। यहां हाई ब्लडप्रेशकर बताकर मरीज भर्ती करने से मना कर दिया गया। हम लोग परेशान हो गए तभी एक महिला ने सुझाव दिया कि थोड़ी दूर पर एक निजी अस्पताल है वहां सकुशल डिलेवरी करा दी जाएगी। वह हम लोगों के साथ चलकर मरीज को उस अस्पताल में भर्ती कराई। 35 हजार रुपये का बिल बना और आपरेशन से बच्चा पैदा हुआ।
राम प्रगट, बनकटी।
केस- दो
मै अपनी बेटी को लेकर मेडिकल कॉलेज आई थी। यहां भीड़ देखकर उसने भर्ती होने से मना कर दिया। बाहर आए तो एक प्राइवेट एंबुलेंस चालक मिला। उसने दो तीन प्राइवेट अस्पतालों का नाम बताया। उसके एंबुलेंस से हम लोग उसी के बताए हुए दक्षिण दरवाजा स्थित एक निजी अस्पताल में गए। वहां आपरेशन से डिलेवरी हुई। सात दिन भर्ती रहे। 38 हजार रुपये बिल भुगतान करना पड़ा।
शोभा देवी, शिवा कालोनी।
हमारे यहां प्रसूता रोगियों का दबाव ज्यादा है। 60 बेड का वार्ड है लेकिन, 97 मरीज भर्ती किए गए हैं। जिससे कुछ अव्यवस्था हुई है। फिर भी मरीजों को सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है।
डॉ. एएन प्रसाद, सीएमएस, ओपेक चिकित्सालय कैली।
अस्पताल में आने वाले मरीजों को तत्काल इलाज की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। गंभीर स्थिति में ही रेफर किए जा रहे हैं। चिकित्सकों को निर्देश है कि मरीजों को भर्ती करने के बाद ही रेफर किया जाए। दलालों का प्रवेश वर्जित है। कैमरे से निगरानी भी होती है।
डॉ. पीके श्रीवास्तव, सीएमएस, महिला अस्पताल