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Basti News: सुविधाओं की कमी...मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए नहीं आ रहे मरीज
Thu, 30 Nov 2023 12:12 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Thu, 30 Nov 2023 12:12 AM IST
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ठंड में मोतियाबिंद के ऑपरेशन में तेजी आती है। मगर, जिम्मेदारों की ढिलाई से यह रफ्तार धीमी है। हाल यह है कि डॉक्टर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए मरीज खोज रहे हैं। दूसरी ओर सुविधाओं का भी टोटा है। इसे एसआईसी सुरेश कुमार कौशल भी स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि निजी अस्पताल में घर तक पहुंचाने की व्यवस्था है। मगर, जिला अस्पताल केवल ऑपरेशन व दवा ही मुहैया कराता है। इसका प्रभाव भी है।
अंधता निवारण योजना के तहत हर साल बड़ी संख्या में मरीजों के आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन होता है। इसके लिए शासन से बकायदा बजट भी उपलब्ध कराया जाता है। इस बजट से चश्मा और लेंस की खरीदारी की जाती है। इसके बाद मरीजों को निशुल्क ऑपरेशन की सुविधा दी जाती है। वर्तमान में जिला अस्पताल की ओपीडी में 50 से 60 मरीजों को परामर्श दिया जा रहा है। उनकी आंख की रोशनी की जांच होती है तो पता चलता है कि पांच से छह मरीज मोतियाबिंद के शिकार हैं, जिन्हें ऑपरेशन के लिए सलाह दी जाती है। हालांकि, इसमें से अधिकतर रोगी बिना ऑपरेशन के घर चले जा रहे हैं। इससे ऑपरेशन की गति नहीं बढ़ रही है।
मुख्यालय तक आने वाले मरीजों को हो रही परेशानी
रोगियों का कहना है कि यदि सीएचसी स्तर पर नेत्र की जांच ठीक प्रकार से हो जाए तो मुख्यालय तक आने की जरूरत नहीं पड़ती। सीएचसी पर कभी नेत्र परीक्षण अधिकारी मिलते हैं तो कभी नहीं। मजबूर होकर जिला अस्पताल आना पड़ता है। यहां से जांच और परामर्श लेने में एक से दो दिन लग जाते हैं। बाद में ऑपरेशन के लिए भी समय लगता है। जबकि निजी अस्पतालों में रहने खाने दवाएं चश्मा के साथ अत्याधुनिक विधि से आपरेशन की सुविधा मुहैया होती है। जिला अस्पताल में यह व्यवस्था नहीं है।
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जिला अस्पताल में तैनात हैं पांच नेत्र रोग विशेषज्ञ
जिला अस्पताल में वर्तमान में पांच नेत्र रोग विशेषज्ञ तैनात हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सारिब सुहेल का कहना है कि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में लेंस और चिकित्सा उपकरण समेत दवाएं हैं। डॉ. सीएल कन्नौजिया ने कहा कि सीएचसी स्तर से यदि मरीजों की जांच कर संदर्भित की जाए तो संख्या बढ़ेगी।
व्यवस्था चाक चौबंद की जाएगी
जिला अस्पताल में नेत्र रोगियों के आपरेशन के लिए फिलहाल अभी मैनुअल सर्जरी ही होती है। फेको मशीन है जरूर मगर तमाम मरीजों का आपरेशन इससे संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में सभी का ऑपरेशन मैनुअल कराया जाता है। सुविधा के नाम पर उन्हें दवा, चश्मा आदि तो दिया जाता है, मगर घर तक पहुंचाने की कोई व्यवस्था सरकारी तंत्र में नहीं है। फिर भी प्रयास है कि मरीज व उनके तीमारदार को बेहतर सुविधा दी जाए।
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अंधता निवारण योजना के तहत हर साल बड़ी संख्या में मरीजों के आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन होता है। इसके लिए शासन से बकायदा बजट भी उपलब्ध कराया जाता है। इस बजट से चश्मा और लेंस की खरीदारी की जाती है। इसके बाद मरीजों को निशुल्क ऑपरेशन की सुविधा दी जाती है। वर्तमान में जिला अस्पताल की ओपीडी में 50 से 60 मरीजों को परामर्श दिया जा रहा है। उनकी आंख की रोशनी की जांच होती है तो पता चलता है कि पांच से छह मरीज मोतियाबिंद के शिकार हैं, जिन्हें ऑपरेशन के लिए सलाह दी जाती है। हालांकि, इसमें से अधिकतर रोगी बिना ऑपरेशन के घर चले जा रहे हैं। इससे ऑपरेशन की गति नहीं बढ़ रही है।
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मुख्यालय तक आने वाले मरीजों को हो रही परेशानी
रोगियों का कहना है कि यदि सीएचसी स्तर पर नेत्र की जांच ठीक प्रकार से हो जाए तो मुख्यालय तक आने की जरूरत नहीं पड़ती। सीएचसी पर कभी नेत्र परीक्षण अधिकारी मिलते हैं तो कभी नहीं। मजबूर होकर जिला अस्पताल आना पड़ता है। यहां से जांच और परामर्श लेने में एक से दो दिन लग जाते हैं। बाद में ऑपरेशन के लिए भी समय लगता है। जबकि निजी अस्पतालों में रहने खाने दवाएं चश्मा के साथ अत्याधुनिक विधि से आपरेशन की सुविधा मुहैया होती है। जिला अस्पताल में यह व्यवस्था नहीं है।
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जिला अस्पताल में तैनात हैं पांच नेत्र रोग विशेषज्ञ
जिला अस्पताल में वर्तमान में पांच नेत्र रोग विशेषज्ञ तैनात हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सारिब सुहेल का कहना है कि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में लेंस और चिकित्सा उपकरण समेत दवाएं हैं। डॉ. सीएल कन्नौजिया ने कहा कि सीएचसी स्तर से यदि मरीजों की जांच कर संदर्भित की जाए तो संख्या बढ़ेगी।
व्यवस्था चाक चौबंद की जाएगी
जिला अस्पताल में नेत्र रोगियों के आपरेशन के लिए फिलहाल अभी मैनुअल सर्जरी ही होती है। फेको मशीन है जरूर मगर तमाम मरीजों का आपरेशन इससे संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में सभी का ऑपरेशन मैनुअल कराया जाता है। सुविधा के नाम पर उन्हें दवा, चश्मा आदि तो दिया जाता है, मगर घर तक पहुंचाने की कोई व्यवस्था सरकारी तंत्र में नहीं है। फिर भी प्रयास है कि मरीज व उनके तीमारदार को बेहतर सुविधा दी जाए।