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Basti News: मौला अली की विलादत के एलान के साथ मुकम्मल हुआ इस्लाम
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बस्ती। अंजुमन मोईनुल इस्लाम, पुरानी बस्ती में गदीर की घटना के सिलसिले में संदेश दिया। इसे लेकर जलसे का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में तमाम उलेमाओं ने अपनी बात रखी।
सूफी गुलजार हुसैन वारसी ने कहा कि पैगंब -ए-इस्लाम ने अपने आखिरी हज से लौटते समय गदीर नामक स्थान पर हाजियों व असहाब के बीच एक लंबा खुतबा फरमाया था। खुतबे के अंत में आपने मौला अली के उत्तराधिकारी का एलान किया था। नबी ने कहा था कि जिसका मैं मौला हूं, उसके यह अली मौला हैं। हाजियों ने इसके बाद मौला अली को मुबारकबाद पेश की थी। इसी के साथ अल्लाह ने एक लाख चौबीस हजार नबियों के सिलसिले से लाए गए इस्लाम को मुकम्मल होने की सनद जारी की।
उन्होंने कहा कि मोमिन होने के लिए अली को पैगंबर का वली मानना जरूरी है। कर्बला में इमाम हुसैन के मुकाबले में मुसलमान आए थे, वह मोमिन नहीं थे। मोमिन इस रोज को ईद के तौर पर मनाते हैं। इमाम बाकर अलै. का फरमान है कि इस दिन किसी एक मोमिन को खाना खिलाने का सवाब सवा लाख नबियों को खाना खिलाने के बराबर होता है।
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शहजादा तस्कीन वारसी ने कहा कि पैगंबर के इस आखिरी पैगाम को भुला दिया गया है। यही वजह है कि आज गदीर का नाम ही बर्दाश्त नहीं होता है। पैगंबर ने उम्मत से कहा था कि मेरे अहलेबैत से मवद्दत (मोहब्बत के साथ उनका अनुसरण) करो, और कुछ नहीं मांगा। आज मुल्ला का इस्लाम और है, मौला अली के मानने वालों का इस्लाम और है। पैगंबर ने कहा था कि अली का चेहरा देखना व उनका जिक्र करना भी इबादत है। मौलाना मो. हनीफ ने भी अजमते अहलेबैत पर रोशनी डाली।
प्रधानाचार्य मुहम्मद कमरूद्दीन की सदारत में आयोजित कार्यक्रम में उलेमाओं ने वाकिए गदीर पर बयान किया। मु. शमीम, मंजर हुसैन, मु. शहनवाज ने नात व मनकबत पेश की। अंजुमन के सचिव मुस्तफा हुसैन ने मौजूद लोगों का शुक्रिया अदा किया।
इस मौके पर रमजान अली, अलाउ्द्दीन, मो. आसिफ, मास्टर शमसुल होदा, मो.हनीफ कल्लू, हाजी इकबाल अहमद आदि मौजूद रहे।
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सूफी गुलजार हुसैन वारसी ने कहा कि पैगंब -ए-इस्लाम ने अपने आखिरी हज से लौटते समय गदीर नामक स्थान पर हाजियों व असहाब के बीच एक लंबा खुतबा फरमाया था। खुतबे के अंत में आपने मौला अली के उत्तराधिकारी का एलान किया था। नबी ने कहा था कि जिसका मैं मौला हूं, उसके यह अली मौला हैं। हाजियों ने इसके बाद मौला अली को मुबारकबाद पेश की थी। इसी के साथ अल्लाह ने एक लाख चौबीस हजार नबियों के सिलसिले से लाए गए इस्लाम को मुकम्मल होने की सनद जारी की।
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उन्होंने कहा कि मोमिन होने के लिए अली को पैगंबर का वली मानना जरूरी है। कर्बला में इमाम हुसैन के मुकाबले में मुसलमान आए थे, वह मोमिन नहीं थे। मोमिन इस रोज को ईद के तौर पर मनाते हैं। इमाम बाकर अलै. का फरमान है कि इस दिन किसी एक मोमिन को खाना खिलाने का सवाब सवा लाख नबियों को खाना खिलाने के बराबर होता है।
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शहजादा तस्कीन वारसी ने कहा कि पैगंबर के इस आखिरी पैगाम को भुला दिया गया है। यही वजह है कि आज गदीर का नाम ही बर्दाश्त नहीं होता है। पैगंबर ने उम्मत से कहा था कि मेरे अहलेबैत से मवद्दत (मोहब्बत के साथ उनका अनुसरण) करो, और कुछ नहीं मांगा। आज मुल्ला का इस्लाम और है, मौला अली के मानने वालों का इस्लाम और है। पैगंबर ने कहा था कि अली का चेहरा देखना व उनका जिक्र करना भी इबादत है। मौलाना मो. हनीफ ने भी अजमते अहलेबैत पर रोशनी डाली।
प्रधानाचार्य मुहम्मद कमरूद्दीन की सदारत में आयोजित कार्यक्रम में उलेमाओं ने वाकिए गदीर पर बयान किया। मु. शमीम, मंजर हुसैन, मु. शहनवाज ने नात व मनकबत पेश की। अंजुमन के सचिव मुस्तफा हुसैन ने मौजूद लोगों का शुक्रिया अदा किया।
इस मौके पर रमजान अली, अलाउ्द्दीन, मो. आसिफ, मास्टर शमसुल होदा, मो.हनीफ कल्लू, हाजी इकबाल अहमद आदि मौजूद रहे।