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मजबूरी के खून से सने हैं धंधेबाजों के हाथ 

Wed, 29 Aug 2018 12:17 AM IST
basti
basti Updated Wed, 29 Aug 2018 12:17 AM IST
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blood donation matter
डेमो - फोटो : डेमो
बस्ती। पुलिस की गिरफ्त में आए प्रभाकर ने सरकारी कर्मियों, निजी हास्पिटल संचालकों और प्रोफेशनल रक्तदाताओं का ऐसा जाल बनाया है, जिसके चंगुल से जरूरतमंदों का बचना मुश्किल होता है। इनका धंधा तब शुरू होता है जब मरीज की जिंदगी की जंग अंतिम दौर में हो और परिवारवाले उसकी जान बचाने को कुछ भी करने पर आमादा हों। उसी वक्त सारी संवेदनाओं का खून करते हुए यह काले कारोबारी खून का सौदा करने लगते हैं।  
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सोमवार को सुर्खियों में आए रैकेट के पीछे यही कहानी सामने आ रही है। तकनीकी रूप से दक्ष प्रभाकर पहले गोरखपुर जिले के बड़हलगंज स्थित एक ब्लड बैँक में लैब टेक्नीशियन के रूप में काम करता था। वहां इस धंधे की बारीकियां सीखने के बाद उसने काम छोड़ दिया। बताया जा रहा है कि उसने अपने रैकेट में कुछ नशेड़ियों और दलालों को शामिल कर लिया। जो दूसरे बेरोजगार युवकों को शौक पूरा करने के लिए रक्तदान करने का झांसा देकर उस तक पहुंचाने लगे। 
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सूत्रों के मुताबिक मूल रूप से नेपाल के रहने वाले प्रभाकर ने शहर के तमाम निजी नर्सिंग होम संचालकों से गठजोड़ करके अपना ठिकाना महरीखावां में बना लिया। जहां आकाश जैसे सहयोगी प्रदीप जैसे पड़ोसियों को भी पहुंचाते रहे। जिसके एवज में दोनों को पांच-पांच सौ रुपये दिए जाते थे। 
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पसोपेश में पड़ गई पुलिस 
खून के अवैध कारोबार का खुलासा होने के बावजूद पुलिस कभी आगे तो कभी पीछे कदम खींच रही है। इसलिए पूछताछ और तफ्तीश में जो भी तथ्य सामने आए उसे छिपाने की कोशिश करते दिखी। जबकि प्रभाकर के रहस्यमयी किरदार से काफी मुतमइन नजर आई। तिल का ताड़ बनाने में दक्ष पुलिस का बैकफुट होना कई सवाल पैदा कर रहा है।  

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आखिर किसे सप्लाई करता था खून 
पुलिस अभी यह पता लगाने में जुटी है कि लोगों को झांसा देकर प्रभाकर और आकाश जो ब्लड निकालते थे, उसे किसे पहुंचाते थे, यदि ऐसा नहीं तो फिर उसका मकसद क्या था। रही बात प्रदीप की तो पुरानी बस्ती एसओ सर्वेश राय के अनुसार उसकी महरीखावां मोहल्ले में ससुराल है, जिसके पास ही प्रभाकर रहता था। आते-जाते दोनों में पहचान थी। अक्सर वह रुपयों की जरूरत के लिए वहां जाकर खून देता रहा।  
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