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Basti News: संविदा कर्मियों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट, मरीज बेहाल

Sat, 17 Oct 2026 03:02 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 17 Oct 2026 03:02 AM IST
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Contract workers' strike threatens healthcare services, patients suffer
जिला महिला अस्पताल में समय से उपचार न मिलने पर बेहोश होकर गिरी महिला को संभालते परिजन संवाद
बस्ती। जिले में संविदा स्वास्थ्य कर्मियों और चिकित्सकों की 16 दिन से जारी हड़ताल का असर अब गांवों से लेकर अस्पतालों तक दिखने लगा है। करीब 1100 कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने से जन आरोग्य मंदिरों और सब सेंटरों पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हैं। 120 सब सेंटरों पर नियमित टीकाकरण प्रभावित होने के साथ गैर संचारी रोगों समेत अन्य गंभीर बीमारियों की स्क्रीनिंग और ऑनलाइन चिकित्सा परामर्श सेवा भी बाधित है। जन्म प्रमाण पत्र जारी करने और जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के भुगतान से जुड़े कार्य भी अटक गए हैं। इससे मरीजों और तीमारदारों की परेशानी बढ़ती जा रही है।
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हड़ताल में जन आरोग्य मंदिर, सब सेंटर, जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और सीएचसी-पीएचसी में तैनात संविदा कर्मी शामिल हैं। कई जन आरोग्य मंदिरों पर ताले लटकने से ग्रामीणों को सिरदर्द, बुखार, खांसी और जुकाम जैसी सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए 10 से 15 किलोमीटर दूर प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ रहा है। वहां भी स्टाफ की कमी के चलते मरीजों को इंतजार करना पड़ रहा है।
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इससे उनका समय और पैसा दोनों खर्च हो रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभावित होने का असर टीबी समेत अन्य बीमारियों की स्क्रीनिंग पर भी पड़ रहा है। गैर संचारी रोगों की जांच और ऑनलाइन परामर्श की सुविधा बाधित होने से मरीजों को समय पर जांच व उपचार मिलने में दिक्कत हो रही है। टेलीमेडिसिन, संक्रमण रोग कक्ष बंद है। इससे मरीज बिना परामर्श वापस जा रहे हैं। शुक्रवार को जिला अस्पताल में 974 मरीजों को परामर्श दिया गया। जिला महिला अस्पताल में 317 मरीजों को परामर्श मिला।
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टीकाकरण के लिए अस्पताल पहुंच रहे अभिभावक
संविदा एएनएम के हड़ताल पर रहने से 120 सब सेंटरों पर टीकाकरण कार्य प्रभावित है। नियमित टीकाकरण सत्र नहीं लगने के कारण अभिभावकों को बच्चों को लेकर जिला महिला अस्पताल और जिला अस्पताल के टीकाकरण केंद्रों पर पहुंचना पड़ रहा है। संध्या और रोशनी ने बताया कि बुधवार को नियमित टीकाकरण सत्र नहीं लगा तो वे बच्चों को लेकर महिला अस्पताल आईं। वहीं, टीकाकरण के लिए पहुंचीं कुछ गर्भवती महिलाओं को भी सेवा नहीं मिलने पर लौटना पड़ा।
अस्पताल में प्रसव का दबाव बरकरार
हड़ताल के बावजूद जिला महिला अस्पताल में प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं की संख्या में कमी नहीं आई है। अस्पताल में प्रतिदिन औसतन आठ से 10 सामान्य प्रसव और 12 से 15 ऑपरेशन से प्रसव कराए जा रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी के बीच अस्पताल पर काम का दबाव बना हुआ है।
मरीजों ने बताई परेशानी
मुंडेरवा के सचिन ने बताया कि उन्हें तीन दिन से सिरदर्द की समस्या है। वह रोज जन आरोग्य मंदिर जाते हैं, लेकिन वहां ताला लगा मिलता है। मजबूरी में उन्हें निजी क्लीनिक पर परामर्श लेना पड़ा। गोटवा के गौरव ने बताया कि उन्हें तीन दिन से बुखार आ रहा है। जन आरोग्य मंदिर बंद होने के कारण उन्हें मरवटिया सीएचसी जाना पड़ा। वहां भी करीब 30 मिनट इंतजार करने के बाद डॉक्टर से परामर्श मिल सका।
मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा आंदोलन
एनएचएम संविदा कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने बताया कि संगठन की प्रमुख मांगों में नियमितीकरण या समान कार्य-समान वेतन, कैशलेस चिकित्सा सुविधा, महंगाई भत्ता, ईपीएफ का लाभ, रिक्त पदों पर गैर जनपद स्थानांतरण नीति और अनुकंपा नियुक्ति शामिल हैं। मांगों को लेकर कुछ कर्मचारी सीएमओ कार्यालय पर धरना दे रहे हैं, जबकि अधिकांश लखनऊ में आयोजित धरने में शामिल हैं।
कोट:::
सीएचओ की हड़ताल से जन आरोग्य मंदिर बंद हैं। 120 संविदा एएनएम भी हड़ताल पर हैं। टीकाकरण के लिए अलग व्यवस्था की गई है। पीएचसी और सीएचसी में सेवाएं सुचारु रखने के लिए रोस्टर के अनुसार ड्यूटी लगाई गई है। टीकाकरण प्रभावित न हो, इसके लिए स्थायी एएनएम की ड्यूटी दो दिन के बजाय चार दिन की गई है। -डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती।
बोले मरीज
कर्मचारी हड़ताल पर हैं। सीएचसी पर गई। वहां सुविधा नहीं मिली तो जिला महिला अस्पताल पहुंची। नौ बजे आई। पर्चा बनवाकर परामर्श लेने में 11 बज गए। ब्लड जांच के लिए गई तो समय बताया गया। दो घंटे में जांच रिपोर्ट मिली। किसी तरह से रिपोर्ट दिखाकर दवा ली। -गरिमा सिंह, मेंहदावल

ग्रामीण क्षेत्र में आसानी से स्क्रीनिंग नहीं हो पा रही है। पहले सीएचसी-पीएचसी पर जांच हो जाती थी, अब मुख्यालय आना पड़ रहा है। इससे आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। 20 किमी. चलकर मुख्यालय के अस्पताल आना पड़ रहा है। नियमित कर्मी अस्पताल में न के बराबर हैं। -सविता, अभई
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