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रोकिए नही अभी पांच सौ किमी और चलाना है
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दिल्ली से दरभंगा के लिए ठेला लेकर निकल पड़े मनोहर कुमार और मुकेश रविवार को बस्ती पहुंचे।
- फोटो : BASTI
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रोकिए नहीं, अभी पांच सौ किमी और चलाना है
बस्ती। कोरोना के कहर से पूरा देश थम सा गया है। बिहार दरभंगा के मनोहर कुमार राय और मुकेश कुमार दिल्ली में ठेला चलाकर जीवन यापन करते थे। 25 मार्च को पूरा देश लॉकडाउन होने के कारण उनका जीवन थम गया। वह रोज कमाते और खाते थे। बंद होने के बाद उनकी जेब में न तो पैसे हैं और न ही खाने के लिए राशन लेकिन अपने अपने जीवन को लेकर वे फिक्रमंद जरूर थे। इसलिए 26 को ठेला लेकर दरभंगा के लिए दोनों निकल पड़े।
रविवार को बस्ती पहुंचने पर मनोहर कुमार ने बताया कि दिल्ली में काम बंद हो जाने के बाद कुछ खाने के लिए बचा था। दिल्ली सरकार की सुविधा लेने के लिए वहां का आधार कार्ड मांगा जा रहा था। दिल्ली के बाहर के लोगों को कोई सुविधा नहीं दी जा रही है। हम लोग 24 घंटे ठेला चलाकर यहां पहुंचे। यूपी में आने के बाद लोगों की ओर से खाने पीने को मिल रहा है। कई हजार लोग यूपी बार्डर पर फंसे हुए हैं। साहब भूखे मरने के बजाय अपने परिवार के बीच मरना अच्छा है। कम से कम हमारी लाश को कंधा देना वाला तो कोई होगा। इन लोगों का कहना है कि जिस तरह की स्थिति है, लगता है कि तीन चार महीने पर कोई काम दिल्ली में मिलेगा। वहां रखकर भूख से मरना नहीं चाहते हैं। रोकिए नहीं अभी पांच सौ किमी और ठेला चलाना है।
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बस्ती। कोरोना के कहर से पूरा देश थम सा गया है। बिहार दरभंगा के मनोहर कुमार राय और मुकेश कुमार दिल्ली में ठेला चलाकर जीवन यापन करते थे। 25 मार्च को पूरा देश लॉकडाउन होने के कारण उनका जीवन थम गया। वह रोज कमाते और खाते थे। बंद होने के बाद उनकी जेब में न तो पैसे हैं और न ही खाने के लिए राशन लेकिन अपने अपने जीवन को लेकर वे फिक्रमंद जरूर थे। इसलिए 26 को ठेला लेकर दरभंगा के लिए दोनों निकल पड़े।
रविवार को बस्ती पहुंचने पर मनोहर कुमार ने बताया कि दिल्ली में काम बंद हो जाने के बाद कुछ खाने के लिए बचा था। दिल्ली सरकार की सुविधा लेने के लिए वहां का आधार कार्ड मांगा जा रहा था। दिल्ली के बाहर के लोगों को कोई सुविधा नहीं दी जा रही है। हम लोग 24 घंटे ठेला चलाकर यहां पहुंचे। यूपी में आने के बाद लोगों की ओर से खाने पीने को मिल रहा है। कई हजार लोग यूपी बार्डर पर फंसे हुए हैं। साहब भूखे मरने के बजाय अपने परिवार के बीच मरना अच्छा है। कम से कम हमारी लाश को कंधा देना वाला तो कोई होगा। इन लोगों का कहना है कि जिस तरह की स्थिति है, लगता है कि तीन चार महीने पर कोई काम दिल्ली में मिलेगा। वहां रखकर भूख से मरना नहीं चाहते हैं। रोकिए नहीं अभी पांच सौ किमी और ठेला चलाना है।
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