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विश्व हिंदी दिवस: रोजगार की भाषा बनने के बजाय हो रहा ‘खिलवाड़’

Tue, 12 Jan 2021 01:18 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 12 Jan 2021 01:18 AM IST
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World Hindi Day: 'Khilwad' happening instead of becoming the language of employment
demo photo - फोटो : अमर उजाला

हिंदी की प्रगति के लिए प्रयासरत् लोगों ने साझा की मन की बात
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विवशता: इंग्लिश के जानकार ही बन पाते हैं राजभाषा अधिकारी

बरेली। ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल..’ अक्सर हिंदी के विकास के लिए होने वाले व्याख्यानों में भारतेंदु हरिश्चंद्र की इन पंक्तियों को जोरदार तरीके से रखा जाता है। आम बोलचाल में तो हिंदी अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रही है मगर रोजगार परक भाषा अभी तक नहीं बन सकी है। यह कहना है हिंदी के विकास के लिए जुटे साहित्यकारों का। उनके मुताबिक जब तक युवा अन्य भाषाओं के बजाय हिंदी के लिए प्रेरित नहीं होंगे तब तक यह संभव नहीं और युवा तब ही इससे जुड़ेंगे जब यह रोजगार की भाषा बनेगी। इसके लिए समाज के हर तबके को अपने स्तर से प्रयास करना होगा।
साहित्य भूषण से सम्मानित साहित्यकार सुरेश बाबू मिश्र का कहना है कि हिंदी बेहद लचीली भाषा है। यही गुण इसकी मजबूती और कमजोरी भी है। लिहाजा, इसका विस्तार भी तेजी से हो रहा है। विश्व के लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वाले मिल जाएंगे। विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा भी हिंदी ही है। हैरत यह कि हिंदी बोलने वालों को आज भी वह मान सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। जिसकी मुख्य वजह दूसरी भाषा बोलने वालेे नहीं बल्कि हिंदीभाषी खुद हैं। जब तक हिंदी बोलने के बाद ह्दय में गौरव का एहसास नहीं होगा तब तक यही स्थिति रहेगी। जरूरत है तो अपनी भाषा के सम्मान के लिए हर संभव प्रयास करने की। कहा, वर्चुअल युग ने हिंदी का भूमंडलीयकरण किया है। जिसके असर से अब भाषा क्षेत्रीयता की मोहताज नहीं रही। हिंदी की लिपि भले ही बदली मगर उसका उच्चारण नहीं बदला। जिससे इंग्लिश बोलने वाले भी इसे अब समझ सकते हैं। मार्केटिंग में सर्वाधिक प्रयोग ‘हिंग्लिश’ का हो रहा है। हिंग्लिश तब तक सही है जब तक उसका द्विअर्थी प्रयोग न हो अन्यथा विप्रूदता का सामना करना पड़ेगा।
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ज्यादा मरोडने से भाषा का बनता है मजाक

साहित्यकार डॉ. मुरारी लाल सारस्वत का कहना है कि हिंदी वैज्ञानिक तौर पर संस्कृत के समकक्ष है। सामाजिक, सांस्कृतिक हर तरह से समृद्ध भाषा है। बावजूद इसके हिंदी भाषा का सम्मान सिर्फ मंच तक और हिंदी दिवस तक ही सीमित हो रहा है। जिसकी वजह है रोजगार परक न होना। दुर्भाग्य है कि बगैर दूसरी भाषा का जानकार बने कोई राजभाषा अधिकारी, धर्मगुरू नहीं बन सकता। इंटरव्यू में हिंदी का प्रयोग करने का सुझाव दिया जाता है मगर ज्यादातर दूसरी भाषाओं के जानकार ही बाजी मार लेते हैं। वर्तमान में हिंग्लिश का प्रयोग हो रहा है जो गलत नहीं है। मगर, आधुनिक बनने के फेर में हिंदी को तोड़ने की जो लत लोगों को लगी है वह भविष्य में हिंदी के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा रही है। शब्दों के बोलने और लिखने में बदलाव किया जाना ठीक नहीं है।
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