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वापस नहीं जाएंगे, आत्मनिर्भर बनने की उम्मीद लेकर लौटे हैं प्रवासी

Fri, 29 May 2020 02:06 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 29 May 2020 02:06 AM IST
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Will not go back, migrants have returned with the hope of becoming self-sufficient
अपनी व्यथा सुनाते ऊंचा गांव के लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

गांवों में वापस आए प्रवासियों ने पीएम की मुहिम को साकार करने का दिखाया जज्बा

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बरेली। लॉकडाउन में उद्योग धंधों पर ताला लग गया है। लिहाजा, शहरों में रोजगार का कोई जरिया नहीं बचा है। हालात सुधरने के इंतजार में अपनी जमापूंजी भी खर्च कर चुके मजदूरों को अब रोजगार चाहिए मगर, दिक्कत इस बात की है जो हुनर उनमें है उसके मुताबिक ही वह काम भी चाह रहे हैं। मनरेगा के तहत मजदूरी का रास्ता खुला है मगर प्रवासी अपने हुनर के मुताबिक काम मिलता न देख वह अब आत्मनिर्भर बनने का जज्बा संजो रहे हैं। अमर उजाला की टीम ने प्रवासियों से बात की तो उन्होंने बताया कि गांव में जो मनरेगा के तहत मजदूर हैं, उन्हें ही माह भर का काम नहीं मिल पा रहा है।
गांवों में वापस आए प्रवासियों के हालात का जायला लेने अमर उजाला की टीम क्यारा ब्लॉक के ऊंचा गांव पहुंची। दोपहर करीब एक बजे गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था। कुछ लोग पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर लॉकडाउन खत्म होने, फसलों की स्थिति, नए काम धंधे को लेकर चर्चा करते नजर आए। चर्चा में शामिल रहे रामप्रसाद पटेल, नरोत्तम पटेल, महावीर सिंह, रघुवीर ने बताया कि करीब एक हजार गांव की आबादी में चार सौ वोटर हैं। कहा, लॉकडाउन होने के बाद गांव में खानपान की कोई दिक्कत नहीं रही, मगर, खेती के कामों में दिक्कत आई। जिसकी वजह भी फर्टीलाइजर, उपकरण आदि का न मिल पाना रहा। बताया कि गांव में करीब छह लोग परिवार के साथ वापस आए हैं। हुनर के मुताबिक रोजगार न होने के चलते वह अभी कोई काम धंधा भी नहीं कर रहे हैं। जमापूंजी से ही परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं।
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मनरेगा जॉब कार्ड बनाने के लिए हो रही वसूली

ग्रामीणों के मुताबिक मनरेगा में गांव के करीब 60 कामगार पंजीकृत हैं। मगर, उन्हें भी पूरी तरह से काम नहीं मिल पा रहा है। मनरेगा जॉब कार्ड बनाने के लिए 40 रुपये मांगे जा रहे हैं। वहीं, मानव दिवस बेहद कम होने की वजह से माह भर का खर्च भी मजदूरी के बाद भी निकल पाना मुश्किल है। बताया कि मनरेगा के तहत 202 रुपए की मजदूरी सरकार दे रही है। जबकि व्यक्तिगत किसी के घर में मजूदरी करने पर तीन सौ रुपए की मजदूरी मिलती है। इसके अलावा चाय, पानी भी मिल जाता है। वहीं, मनरेगा में भुगतान पर भी संकट रहता है। इसलिए लोग मनरेगा के बजाय खुद ही अपना अपने हुनर के मुताबिक ही काम धंधा करने की सोच रहे हैं। लॉकडाउन खत्म होने के बाद प्रवासी शहर में हुनर के मुताबिक काम भी खोजेंगे।
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तकलीफ के अलावा शहर में कुछ नहीं मिला

ऊंचा गांव के रहने वाले 30 वर्षीय महेश पाल हरियाणा में एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करते थे। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के बावजूद कंपनी ने दो माह तक का काम न करने पर भी दो माह का भुगतान किया। मगर 17 दिन पहले उन्होंने आगे भुगतान करने में असमर्थता जता दी। परिवार भी साथ में था, इसलिए वहीं पर ही तमाम लोगों से बात कर काम खोजने की कोशिश की मगर सफलता नहीं मिली। ऐसे में कंपनी ने बाहर से आए हुए लोगों की मदद करते हुए घर पहुंचाया। वह आए और जांच कराई रिपोर्ट निगेटिव आई है। कहा, अब वे यहीं रहेंगे शहर वापस नहीं जाएंगे। मजूदरी नहीं करेंगे जो हुनर उनमें है उसी के मुताबिक व्यवसाय करेंगे।

गांव में कुछ ही लोग बाहर से आए हैं अगर वे मनरेगा में काम करना चाहेंगे तो उनका जॉब कार्ड बनवाया जाएगा। मगर कोई राजी ही नहीं हो रहा है। लॉकडाउन में मिली ढील के बाद गांव में किसी तरह की कोई खास दिक्कत नहीं है। फिलहाल लोग खेती किसानी में लगे हैं। - विमला देवी, प्रधान, ऊंचा गांव, क्यारा

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