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कविता के तैराक नहीं गोताखोर थे वीरेन डंगवाल: रवि भूषण
बरेली
Updated Mon, 22 Feb 2016 01:55 AM IST
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बरेली कॉलेज सभागार में आयोजित कार्यक्रम में हजार जुल्मों से सताए लोग और कविता, कविता और जगहें पर विमर्श हुआ। वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने कहा कि वीरेन डंगवाल परिवर्तनकामी और मुक्तिकामी कवि हैं। प्रेम, प्रतिबद्धता और प्रतिरोध उनकी कविताओं में प्रमुख है। गहरे अर्थ में वह राजनीतिक कवि हैं। उनकी कविताओं में राजनीति मुखर नहीं इसलिए कविता का सौन्दर्य मौजूद है। वह तैराक नहीं, गोताखोर थे। उनकी कविता के मूल में न्याय की आकांक्षा है। उनकी कविताओं में आलोचनात्मक विवेक था। आलोचनात्मक विवेक ही उन्हें बड़ा कवि बनाता है। उनका व्यक्तित्व झरने की तरह था। वीरेन की कविता के लिए आलोचना को भी रचनात्मक होना होगा।
कवि एवं आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने संवेदनाओं से भरे अपने वक्तव्य में कहा कि वीरेन दा कविताओं में शब्दों के चुनाव में बहुत सख्त और संवेदनशील थे। हर शब्द का चुनाव वह बेहद सावधानी से करते थे। वह लापरवाह दिखते थे लेकिन ऐसा था नहीं। लापरवाही उनके लिए एक खोल था। उनकी कविता बहुत अनुशासित है। उनकी कविताओं में नगण्यता का वैभव इसलिए है, क्योंकि वह किसी को नगण्य मानते ही नहीं थे। उनकी कविता समता पर जोर देती है। उनके जाने के बाद उन पर लिखी कविता भी साझा की, जिसे सुनाते हुए वह खुद आंसू पोछते रहे और श्रोताओं की भी आंखें भिगो दीं।
युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि वीरेन डंगवाल ने कविताएं ही लिखकर बताया कि कविता एक मुकम्मल जीवन दर्शन हो सकता है। उनकी कविताओं में विचार है, जीवन है, इतिहास है और धड़कता हुआ समाज है। वीरेन डंगवाल ने अपनी कविताओं से यह राह बनायी कि जैसे-जैसे जुल्म बढ़ेंगे कविता के भीतर प्रतिरोध बढ़ेगा। उनकी कविता में शहर का जीवन उत्सव प्रकट होता है। वह नई सदी के समाजवाद के गायक हैं। उनको यकीन था कि बदलाव होगा और यह बदलाव सामान्य लोग ही लाएंगे। इसलिए उनकी कविताओं में नगण्यता का वैभव है।
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युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने वीरेन डंगवाल की कविता में संरचना की हिंसा की शिनाख्त को केन्द्रीय तत्व बताया। उन्होंने ‘राम सिंह’, ‘नदी’, ‘व ‘कटनी की रूक्मिनी’ कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि वीरेन डंगवाल की संस्कृति की हिंसा पर कई कविताए हैं। वह हिंसा की पहचान करते है ताकि प्रेम और प्रतिरोध पैदा हो सके।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा- बहुत कम कवि छंदों के साथ खेलने की जोखिम उठाते हैं। वीरेन डंगवाल ने यह जोखिम उठाया और इसमें वह सफल भी रहे। उनकी कविताओं में छुपी हुई चीजे दिखाई देती हैं तो पहले कविता में नहीं आई थीं।
वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि वीरेन डंगवाल की प्राथमिकता बेहतर मनुष्य होने की है। हम उनके पूरे व्यक्तित्व को उनकी कविता में देख सकते हैं और उनकी कविता में उनके व्यक्तित्व को देख सकते हैं। उनकी कविता में विचार और रचनात्मकता का संतुलन अद्वितीय है।
कार्यक्त्रस्म की अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार ने कहा कि आज प्रश्न यह नहीं है कि कविता क्या है बल्कि कविता क्या कर सकती है और इस सवाल का जवाब वीरेन डंगवाल की कविताएं हैं। वह हमें बताते हैं कि जिस दौर में जीना मुश्किल है उस दौर में जीना लाजिम है। पत्रकार दिनेश श्रीनेत ने बरेली शहर और कवि वीरेन डंगवाल के पारस्परिक संबंधों की पड़ताल करते हुए उनकी कविता की बारीकियों को उकेरा। इसके अलावा चंद्रेश्वर, अरूणाभ सौरभ समेत तमाम लोगों ने उनकी कविता और जीवन पर बातचीत की। कार्यक्त्रस्म के आयोजन में जन संस्कृति के राज्य सचिव प्रेमशंकर सिंह, केके पांडेय, प्रणय कृष्ण, अशोक चौधरी, मनोज सिंह और वीरेन डंगवाल स्मृति आयोजन समिति के सदस्यों का खास सहयोग रहा।
हिरावल के गीतों में उभरी वीरेन डंगवाल की कविताई
पटना से आई हिरावल की टीम के गीतों से वीरेन डंगवाल की कविताई भी उभरी। टीम के संतोष झा, डीपी सोनी बंटू और अशोक चौधरी द्वारा गोरख पांडेय, महेश्वर और वीरेन डंगवाल की कविताओं की लयबद्ध प्रस्तुति से हुई। कार्यक्त्रस्म का समापन वीरेन डंगवाल की प्रसिद्ध कविता ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’ से हुआ। संचालन समकालीन जनमत के संपादक केके पांडेय ने किया।
देश विरोधी नारे लगाने वालों को खंडन करना होगा: नरेश सक्सेना
भाजपा संकट के दौर से गुजर रही थी। दिल्ली और बिहार की हार के पराजय के बाद इनकी स्थिति बहुत खराब हो गई थी। रोहित वेमुला ने इन्हें बहुत बड़ा झटका दिया था, इसलिए चैनलों की मदद से भाजपा ने यह भ्रम फैला दिया कि जो कन्हैया के साथ हैं, वो पाकिस्तान के साथ हैं। जिन्होंने यह बोलने में सावधानी नहीं बरती कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला, उन्हें खंडन करना होगा। पाकिस्तान ऐसा देश नहीं है, जिसके लिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाएं। यह अलग बात है कि कश्मीर में आर्मी और सुरक्षा बलों का अत्याचार ऐसा है कि लोग त्रस्त होकर नारे लगाते रहते हैं। कश्मीर के ही लोगों ने नारे लगाए होंगे। शायद जेएनयू में नारे लगाने वालों में कुछ मोआवादी भी शामिल हैं। भाजपा ने लोगों में यह भ्रम फैलाया कि जेएनयू में भारत विघटन और दुर्दशा का एक समूह पैदा हो गया है। इससे भाजपा में प्राण पड़ गए।
- नरेश सक्सेना, कवि
देश को बचाना है तो लड़ना होगा: मंगलेश डबराल
कन्हैया को लेकर दिल्ली में प्रोटेस्ट भी हो रहा है। उसके समर्थन में पंद्रह हजार लोगों का मार्च भी निकला उसमें लोग अपने हाथों में गुलाब लिए हुए थे। रोहित वेमुला के समर्थन में भी मार्च निकले। इससे पता चलता है कि युवा कंप्यूटर टेक्नोलॉजी से बाहर निकला है। वह दूसरे मूड में है, वह सड़कों पर संघर्ष कर रहा है। संघ परिवार और बीजेपी की मनमानी, बढ़ती असहिष्णुता का चारों ओर विरोध हो रहा है। देश के सभी विश्वविद्यालयों को उनके साथ होना चाहिए। जो हालात हैं इससे तो वह दिन दूर नहीं जब बोलने, कहने की आजादी खत्म कर दी जाएगी। स्वायत्त संस्थाओं पर संघ परिवार कब्जा कर लेगा। इनके खिलाफ मोर्चा लेने की जरूरत है। वैसे इनका विरोध तो सम्मान वापसी से चला आ रहा है। इसकी गूंज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। अगर इस देश को बचाना है तो लड़ना होगा।
- मंगलेश डबराल, कवि
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कवि एवं आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने संवेदनाओं से भरे अपने वक्तव्य में कहा कि वीरेन दा कविताओं में शब्दों के चुनाव में बहुत सख्त और संवेदनशील थे। हर शब्द का चुनाव वह बेहद सावधानी से करते थे। वह लापरवाह दिखते थे लेकिन ऐसा था नहीं। लापरवाही उनके लिए एक खोल था। उनकी कविता बहुत अनुशासित है। उनकी कविताओं में नगण्यता का वैभव इसलिए है, क्योंकि वह किसी को नगण्य मानते ही नहीं थे। उनकी कविता समता पर जोर देती है। उनके जाने के बाद उन पर लिखी कविता भी साझा की, जिसे सुनाते हुए वह खुद आंसू पोछते रहे और श्रोताओं की भी आंखें भिगो दीं।
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युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि वीरेन डंगवाल ने कविताएं ही लिखकर बताया कि कविता एक मुकम्मल जीवन दर्शन हो सकता है। उनकी कविताओं में विचार है, जीवन है, इतिहास है और धड़कता हुआ समाज है। वीरेन डंगवाल ने अपनी कविताओं से यह राह बनायी कि जैसे-जैसे जुल्म बढ़ेंगे कविता के भीतर प्रतिरोध बढ़ेगा। उनकी कविता में शहर का जीवन उत्सव प्रकट होता है। वह नई सदी के समाजवाद के गायक हैं। उनको यकीन था कि बदलाव होगा और यह बदलाव सामान्य लोग ही लाएंगे। इसलिए उनकी कविताओं में नगण्यता का वैभव है।
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युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने वीरेन डंगवाल की कविता में संरचना की हिंसा की शिनाख्त को केन्द्रीय तत्व बताया। उन्होंने ‘राम सिंह’, ‘नदी’, ‘व ‘कटनी की रूक्मिनी’ कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि वीरेन डंगवाल की संस्कृति की हिंसा पर कई कविताए हैं। वह हिंसा की पहचान करते है ताकि प्रेम और प्रतिरोध पैदा हो सके।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा- बहुत कम कवि छंदों के साथ खेलने की जोखिम उठाते हैं। वीरेन डंगवाल ने यह जोखिम उठाया और इसमें वह सफल भी रहे। उनकी कविताओं में छुपी हुई चीजे दिखाई देती हैं तो पहले कविता में नहीं आई थीं।
वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि वीरेन डंगवाल की प्राथमिकता बेहतर मनुष्य होने की है। हम उनके पूरे व्यक्तित्व को उनकी कविता में देख सकते हैं और उनकी कविता में उनके व्यक्तित्व को देख सकते हैं। उनकी कविता में विचार और रचनात्मकता का संतुलन अद्वितीय है।
कार्यक्त्रस्म की अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार ने कहा कि आज प्रश्न यह नहीं है कि कविता क्या है बल्कि कविता क्या कर सकती है और इस सवाल का जवाब वीरेन डंगवाल की कविताएं हैं। वह हमें बताते हैं कि जिस दौर में जीना मुश्किल है उस दौर में जीना लाजिम है। पत्रकार दिनेश श्रीनेत ने बरेली शहर और कवि वीरेन डंगवाल के पारस्परिक संबंधों की पड़ताल करते हुए उनकी कविता की बारीकियों को उकेरा। इसके अलावा चंद्रेश्वर, अरूणाभ सौरभ समेत तमाम लोगों ने उनकी कविता और जीवन पर बातचीत की। कार्यक्त्रस्म के आयोजन में जन संस्कृति के राज्य सचिव प्रेमशंकर सिंह, केके पांडेय, प्रणय कृष्ण, अशोक चौधरी, मनोज सिंह और वीरेन डंगवाल स्मृति आयोजन समिति के सदस्यों का खास सहयोग रहा।
हिरावल के गीतों में उभरी वीरेन डंगवाल की कविताई
पटना से आई हिरावल की टीम के गीतों से वीरेन डंगवाल की कविताई भी उभरी। टीम के संतोष झा, डीपी सोनी बंटू और अशोक चौधरी द्वारा गोरख पांडेय, महेश्वर और वीरेन डंगवाल की कविताओं की लयबद्ध प्रस्तुति से हुई। कार्यक्त्रस्म का समापन वीरेन डंगवाल की प्रसिद्ध कविता ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’ से हुआ। संचालन समकालीन जनमत के संपादक केके पांडेय ने किया।
देश विरोधी नारे लगाने वालों को खंडन करना होगा: नरेश सक्सेना
भाजपा संकट के दौर से गुजर रही थी। दिल्ली और बिहार की हार के पराजय के बाद इनकी स्थिति बहुत खराब हो गई थी। रोहित वेमुला ने इन्हें बहुत बड़ा झटका दिया था, इसलिए चैनलों की मदद से भाजपा ने यह भ्रम फैला दिया कि जो कन्हैया के साथ हैं, वो पाकिस्तान के साथ हैं। जिन्होंने यह बोलने में सावधानी नहीं बरती कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला, उन्हें खंडन करना होगा। पाकिस्तान ऐसा देश नहीं है, जिसके लिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाएं। यह अलग बात है कि कश्मीर में आर्मी और सुरक्षा बलों का अत्याचार ऐसा है कि लोग त्रस्त होकर नारे लगाते रहते हैं। कश्मीर के ही लोगों ने नारे लगाए होंगे। शायद जेएनयू में नारे लगाने वालों में कुछ मोआवादी भी शामिल हैं। भाजपा ने लोगों में यह भ्रम फैलाया कि जेएनयू में भारत विघटन और दुर्दशा का एक समूह पैदा हो गया है। इससे भाजपा में प्राण पड़ गए।
- नरेश सक्सेना, कवि
देश को बचाना है तो लड़ना होगा: मंगलेश डबराल
कन्हैया को लेकर दिल्ली में प्रोटेस्ट भी हो रहा है। उसके समर्थन में पंद्रह हजार लोगों का मार्च भी निकला उसमें लोग अपने हाथों में गुलाब लिए हुए थे। रोहित वेमुला के समर्थन में भी मार्च निकले। इससे पता चलता है कि युवा कंप्यूटर टेक्नोलॉजी से बाहर निकला है। वह दूसरे मूड में है, वह सड़कों पर संघर्ष कर रहा है। संघ परिवार और बीजेपी की मनमानी, बढ़ती असहिष्णुता का चारों ओर विरोध हो रहा है। देश के सभी विश्वविद्यालयों को उनके साथ होना चाहिए। जो हालात हैं इससे तो वह दिन दूर नहीं जब बोलने, कहने की आजादी खत्म कर दी जाएगी। स्वायत्त संस्थाओं पर संघ परिवार कब्जा कर लेगा। इनके खिलाफ मोर्चा लेने की जरूरत है। वैसे इनका विरोध तो सम्मान वापसी से चला आ रहा है। इसकी गूंज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। अगर इस देश को बचाना है तो लड़ना होगा।
- मंगलेश डबराल, कवि