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बीमारी से बचने के लिए थाली में शामिल करें मोटा अनाज : डॉ. खादर वल्ली

Mon, 14 Oct 2024 05:11 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Updated Mon, 14 Oct 2024 05:11 AM IST
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To avoid diseases, include coarse grains in your plate: Dr. Khadar Valli
बरेली। आपका खाना ठीक है तो दवा जरूरी नहीं, लेकिन खाना खराब है तो दवा भी बेअसर होगी। बीमारी से बचना है तो थाली से गेहूं, चावल को हटाकर मोटा अनाज शामिल करें। हजारों वर्षों तक मोटा अनाज ही मुख्य आहार रहा। सौ वर्षों में इसके प्रति भ्रम फैलाया गया।
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आईवीआरआई केंद्रीय सभागार में नारायण कॉलेज की ओर से मोटे अनाज (मिलेट्स) का उपयोग स्वस्थ मानव जीवन एवं सुरक्षित पर्यावरण विषय पर आयोजित संगोष्ठी के दौरान मिलेट्स मैन पद्मश्री डॉ. खादर वल्ली ने ये जानकारी साझा कीं। कहा कि बीते सौ वर्षों से रसायनयुक्त भोजन के सेवन से ही बीमारियां बढ़ रही हैं। इसके इलाज में गाढ़ी कमाई खर्च होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गेहूं, चावल का सेवन कराकर शरीर को रोगों का घर बना दिया है। स्टील और एल्युमिनियम के बर्तन में खाना पका रहे हैं। यानी पकाने और खाने का तरीका दोनों सही नहीं।
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कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, माइग्रेन, थाॅयराइड, रूमेटाइस ऑर्थराइटिस, हृदय संबंधी रोग इसलिए ही हो रहे हैं। पुरुषों में गंजापन और महिलाओं में अनियमित माहवारी के मामले बढ़ रहे हैं। कम उम्र में माहवारी, मेनोपॉज शुरू हो रहे हैं। जो चिंताजनक है। इसकी मुख्य वजह खानपान है।
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पर्यावरण भी प्रभावित करता है गेहूं और चावल
पद्मश्री डॉ. खादर वल्ली ने कहा कि मोटा अनाज उपजाने में पर्यावरणीय कारक बाधा नहीं। गेहूं, चावल और गन्ना उत्पादन के लिए विशेष रासायनिक उर्वरक व बेतहाशा पानी चाहिए। एक किलो गेहूं, चावल उपजाने में करीब दस हजार लीटर पानी की जरूरत होती है। जबकि मोटा अनाज के लिए बारिश काफी है। वैकल्पिक सिंचाई की जरूरत नहीं, इसलिए यह पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता।

डॉक्टर नहीं बताएंगे कि खाओ फाइबर युक्त भोजन
मिलेट्स मैन पद्मश्री डॉ. खादर वल्ली ने कहा कि डॉक्टर बीमार को दवाएं देंगे पर उससे मुक्त होने का तरीका नहीं बताएंगे। इससे उनका व्यवसाय प्रभावित होगा। कहा कि गेहूं, चावल और चीनी में रेशा यानी फाइबर एक फीसदी भी नहीं होता। ग्लूकोज की मात्रा ज्यादा होती है। जो रक्त में मिलकर गाढ़ा बनाता है। जो बीमारियों की वजह होती है। मोटा अनाज में फाइबर 8 से 14 फीसदी तक होता है। जो रक्त को सुचारु बनाकर रोगों से मुक्त करता है।

सौ वर्षों की लत धीरे-धीरे छूटेगी, शुरुआत कीजिए
डॉ. खादर वल्ली ने लोगों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए कहा कि गेहूं, चावल और चीनी सौ वर्षों से खा रहे हैं। इसे तुरंत छोड़ना मुमकिन नहीं। सप्ताह में एक दिन मोटा अनाज खाएं अगले सप्ताह दो दिन, इसी तरह आगे बढ़ाते जाएं तभी बदलाव आएगा। पहले इसका सेवन शुरू करें तभी किसान इसे उपजाएंगे। अगर किसान उपजाएं और कोई न खाए तो उनकी मेहनत और समय का मूल्य नहीं मिलेगा।

मोटा अनाज के 200 प्रकार, पांच ही मुख्य आहार
मुख्य अतिथि एसआईएस ग्रुप के संस्थापक अध्यक्ष, पूर्व सांसद डॉ. आरके सिन्हा ने कहा कि मोटा अनाज 200 तरह का होता है पर कोदो, सांवा, कुटकी, हरा सांवा, कंगनी सबसे बेहतर है। पूर्वज इसे खाकर सौ वर्ष जिये। कोरोना में जिसने मोटा अनाज का सेवन किया, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी। सरकार धान, गेहूं, गन्ने की खेती पर सब्सिडी दे रही है। जबकि मोटा अनाज पर पांच फीसदी सेवा शुल्क लग रहा है।


ये रहे मौजूद
वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार, कैंट विधायक संजीव अग्रवाल, नवाबगंज विधायक डॉ. एमपी आर्य, एडवोकेट अनिल सक्सेना, संगत पंगत की राष्ट्रीय संयोजिका रत्ना सिन्हा, नारायण काॅलेज के चेयरमैन शशिभूषण, वरिष्ठ पत्रकार राधा रमण समेत उद्यमी, व्यापारी, समाजसेवी समेत शहर के अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।
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