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दवा-दुआ और अपनेपन से पूरी हुई यह तपस्या.. अब सुकून
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कोरोना से बचने की एक कोशिश ऐसी भी
- फोटो : PTI
दहशत के सागर से निकले संकल्प से शुरू हुआ कोरोना को हराने का सफर
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कोरोना संक्रमित परिवार को स्वस्थ कर घर भेजने वाले डॉक्टरों और नर्सों की आपबीती
बरेली। दिमाग जैसे सुन्न हो गया था, कुछ भी सोचना व्यर्थ लग रहा था फिर भी एक सवाल बार-बार जेहन में हथौड़े की तरह टकरा रहा था कि कुछ हो गया तो परिवार का क्या होगा। परिवार के लोगों के चेहरों से भी साफ दहशत टपक रही थी। आपस में नजरें मिलाना मुश्किल हो गया, सवालों का जवाब ढूंढने जैसे हालात भी नहीं थे, हालांकि मन ही मन इसी जद्दोजहद से जूझते हुए अंतर्मन ने फैसला कर लिया कि अब अगला पड़ाव कोरोना से जंग का मैदान ही होगा, अंजाम चाहे जो हो।
यह लब्बोलुआब है उन योद्धाओं से अमर उजाला की बातचीत का जो करीब 20 दिनों से जिला अस्पताल के कोरोना वार्ड में इस महामारी को पराजित करने की दिन-रात कोशिशों में जुटे हुए थे और आखिरकार कामयाब होकर ही दम लिया। सुभाषनगर के एकमात्र कोरोना संक्रमित परिवार के सभी छह सदस्यों के स्वस्थ होकर घर लौटने के बाद इस टीम के चेहरों पर राहत और सुकून के भाव हैं। पिछले 18 दिनों का एक-एक वाकया उनके जेहन में साफ है। पहली ही सबसे मुश्किल चुनौती संक्रमित परिवार के लोगों का डर दूर कर उन्हें इलाज में सहयोग देने के लिए तैयारी करने की थी जो दवा-दुआ और स्वस्थ होने का भरोसा के अपनेपन से भरे रवैये के जरिये पूरी हुई। संक्रमित परिवार के घर लौटने के बाद भी ये योद्धा अभी अपने घर से दूर हैं। कोरोना वार्ड अब भी उनके लिए जंग का मैदान है. लेकिन मन में यह दुआ भी है कि यह जंग आगे और न बढ़े।
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मेरी तरफ से इतना जरूर लिख देना.. हैप्पी बर्थडे डियर सन
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक एक अप्रैल को उन्हें कोरोना वार्ड का चार्ज सौंपा गया और पहली ड्यूटी सुबह की पाली में लगी थी। पहली बार कोरोना वार्ड में घुसे तो मन काफी घबराया हुआ था। अंदर मरीज भी काफी घबराए हुए थे, उनके चेहरों से कुछ ऐसा झलक रहा था जिसे महसूस करने से ही डर लग रहा था। लंबी बातचीत कर उन्हें समझाते उम्मीद जगाने की कोशिश की कि वह और पूरा स्टाफ उनके साथ हैं। इसके बाद भी वह हर दिन वार्ड के बाहर से ही नहीं बल्कि वार्ड के अंदर जाकर इन लोगों बातचीत करते थे। 25 साल के करियर में उन्हें ऐसे हालात से कभी नहीं गुजरना पड़ा था जब अनिश्चितता के गहरे साये में एक अनजान बीमारी का इलाज करना पड़ा हो। अब संक्रमित परिवार ठीक होकर लौट चुका है लेकिन वह खुद 18 दिनों से घर नहीं गए हैं। 19 अप्रैल को को पहला मौका होगा जब वह अपने शिवम वैश्य के जन्मदिन पर उसके साथ नहीं होंगे। चलते-चलते गुजारिश की.. मेरी तरफ इतना जरूर लिख देना- हैप्पी बर्थडे डियर सन शिवम।
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कोरोना वार्ड में पहली बार आने
के बाद दो दिन तक नहीं आई
छोटे-छोटे बच्चे पूछते हैं मम्मी
कब आएगी, पति बनाते हैं खाना
नर्सिंग ऑफिसर प्रमिला मैसी ने बताया कि कोरोना वार्ड में पहली बार जाने के बाद दो दिन तक वह सो ही नहीं पाईं। एक-दो दिन कोरोना से संक्रमित हो जाने का डर हावी रहा लेकिन फिर उन्होंने समझ लिया कि ऐसी स्थिति में वह न मरीजों का इलाज कर पाएंगी न ही उनमें सकारात्मकता पैदा कर पाएंगी। इसके बाद पूरी कोशिश खुद पर काबू पाने में की और फिर मरीजों की काउंसिलिंग शुरू कर दी। मरीज पहले तैनात हुए स्टाफ के व्यवहार से दुखी और नाराज थे। उन्होंने उन्हें अच्छे इलाज और स्वस्थ होने का भरोसा दिलाया। उन्हें प्रार्थना करना भी सिखाया ताकि उनका ईश्वर पर भरोसा बना रहे। इलाज चलता रहा। अब तक वह अपने परिवार से दूर हैं, सिर्फ फोन पर ही बच्चों और पति से बात होती है। बच्चे छोटे हैं और खाना नहीं बना सकते। उनके पति ही खाना बना रहे हैं लेकिन उन्हें भी रोटी बनानेृी नहीं आती। बच्चों को मलाल है कि मम्मी जल्दी घर आ जाएं तो उन्हें रोटी खाने को मिले।
बता नहीं सकती.. मरीजों की पहली रिपोर्ट
निगेटिव आने के बाद कितनी खुशी हुई
हो सकता है कोरोना का इलाज मिल
जाए पर यह वक्त कभी नहीं भूलूंगी
सीनियर नर्सिंग ऑफिसर सोनिया मसीह ने बताया कि जब उन्हें कोरोना वार्ड में तैनाती का आदेश मिला तो वह काफी घबरा गईं। संक्रमित होकर परिवार से बिछड़ने का डर काफी देर तक हावी रहा लेकिन फिर भी उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। शुरू में मरीजों में पिछले स्टाफ के व्यवहार के कारण इतनी नाराजगी थी कि वह उनसे बात करने का प्रयास करती थीं तो वह बात नहीं करते थे। दो दिन तक यह सिलसिला चला, फिर मरीजों की शिकायत दूर हुई तो वे उन्हें सिस्टर के बजाय दीदी कहकर पुकारने लगे। उन लोगों के बीच एक अपनेपन का रिश्ता बन गया। मगर फिर भी परिवार से दूर रहने की कसक लगातार परेशान करती रही। इस बीच जब मरीजों की पहली निगेटिव रिपोर्ट आई तो वह खुशी से झूम उठी। सोनिया का कहना था कि कोरोना पर रिसर्च चल रही है, हो सकता है जल्द इसका कोई इलाज भी खोज लिया जाए लेकिन जो वक्त उन्होंने मरीजों के साथ गुजारा है, वह उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगी।
इस जंग में हमने जो हासिल किया
वह जो खोया उससे बहुत कम
संक्रमित परिवार को पहले ही दिन बताया
था सिर्फ भरोसा ही इस बीमारी की दवा
डॉ. संजय सिंह के मुताबिक कोरोना से जंग लड़ना उनका नया अनुभव है। उनकी ड्यूटी शाम की पाली में लगी थी। जब वह पहुंचते थे तो दिन भर की गतिविधियों पर मरीजों से साथ स्टाफ से भी बातचीत करते थे। और लोगों की तरह कोरोना वार्ड में पहली बार दाखिल होने के बाद वह भी अपने घर वापस नहीं गए। खुद को और परिवार को सुरक्षित करने के लिए क्वारंटीन कर लिया। मरीजों को भी बता दिया बीमारी का इलाज मुश्किल है और सिर्फ उम्मीद, भरोसा और सकारात्मक सोच ही इसका इलाज है। उनके साथ बाकी स्टाफ लगातार यह कोशिश करता रहा और मरीजों में भरोसा जगाने कामयाब रहा। पहली रिपोर्ट के बाद दूसरी रिपोर्ट नेगेटिव आई। पति-पत्नी घर गए उसके बाद उनके माता, पिता, भाई, बहन भी घर चले गए। मगर इस जंग में उन्होंने जो अर्पित किया है उससे ज्यादा उन्होंने कुछ हासिल किया है जिसका उन्हें गर्व है।
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कोरोना संक्रमित परिवार को स्वस्थ कर घर भेजने वाले डॉक्टरों और नर्सों की आपबीती बरेली। दिमाग जैसे सुन्न हो गया था, कुछ भी सोचना व्यर्थ लग रहा था फिर भी एक सवाल बार-बार जेहन में हथौड़े की तरह टकरा रहा था कि कुछ हो गया तो परिवार का क्या होगा। परिवार के लोगों के चेहरों से भी साफ दहशत टपक रही थी। आपस में नजरें मिलाना मुश्किल हो गया, सवालों का जवाब ढूंढने जैसे हालात भी नहीं थे, हालांकि मन ही मन इसी जद्दोजहद से जूझते हुए अंतर्मन ने फैसला कर लिया कि अब अगला पड़ाव कोरोना से जंग का मैदान ही होगा, अंजाम चाहे जो हो।
यह लब्बोलुआब है उन योद्धाओं से अमर उजाला की बातचीत का जो करीब 20 दिनों से जिला अस्पताल के कोरोना वार्ड में इस महामारी को पराजित करने की दिन-रात कोशिशों में जुटे हुए थे और आखिरकार कामयाब होकर ही दम लिया। सुभाषनगर के एकमात्र कोरोना संक्रमित परिवार के सभी छह सदस्यों के स्वस्थ होकर घर लौटने के बाद इस टीम के चेहरों पर राहत और सुकून के भाव हैं। पिछले 18 दिनों का एक-एक वाकया उनके जेहन में साफ है। पहली ही सबसे मुश्किल चुनौती संक्रमित परिवार के लोगों का डर दूर कर उन्हें इलाज में सहयोग देने के लिए तैयारी करने की थी जो दवा-दुआ और स्वस्थ होने का भरोसा के अपनेपन से भरे रवैये के जरिये पूरी हुई। संक्रमित परिवार के घर लौटने के बाद भी ये योद्धा अभी अपने घर से दूर हैं। कोरोना वार्ड अब भी उनके लिए जंग का मैदान है. लेकिन मन में यह दुआ भी है कि यह जंग आगे और न बढ़े।
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जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक एक अप्रैल को उन्हें कोरोना वार्ड का चार्ज सौंपा गया और पहली ड्यूटी सुबह की पाली में लगी थी। पहली बार कोरोना वार्ड में घुसे तो मन काफी घबराया हुआ था। अंदर मरीज भी काफी घबराए हुए थे, उनके चेहरों से कुछ ऐसा झलक रहा था जिसे महसूस करने से ही डर लग रहा था। लंबी बातचीत कर उन्हें समझाते उम्मीद जगाने की कोशिश की कि वह और पूरा स्टाफ उनके साथ हैं। इसके बाद भी वह हर दिन वार्ड के बाहर से ही नहीं बल्कि वार्ड के अंदर जाकर इन लोगों बातचीत करते थे। 25 साल के करियर में उन्हें ऐसे हालात से कभी नहीं गुजरना पड़ा था जब अनिश्चितता के गहरे साये में एक अनजान बीमारी का इलाज करना पड़ा हो। अब संक्रमित परिवार ठीक होकर लौट चुका है लेकिन वह खुद 18 दिनों से घर नहीं गए हैं। 19 अप्रैल को को पहला मौका होगा जब वह अपने शिवम वैश्य के जन्मदिन पर उसके साथ नहीं होंगे। चलते-चलते गुजारिश की.. मेरी तरफ इतना जरूर लिख देना- हैप्पी बर्थडे डियर सन शिवम।
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के बाद दो दिन तक नहीं आई
छोटे-छोटे बच्चे पूछते हैं मम्मी
कब आएगी, पति बनाते हैं खाना
नर्सिंग ऑफिसर प्रमिला मैसी ने बताया कि कोरोना वार्ड में पहली बार जाने के बाद दो दिन तक वह सो ही नहीं पाईं। एक-दो दिन कोरोना से संक्रमित हो जाने का डर हावी रहा लेकिन फिर उन्होंने समझ लिया कि ऐसी स्थिति में वह न मरीजों का इलाज कर पाएंगी न ही उनमें सकारात्मकता पैदा कर पाएंगी। इसके बाद पूरी कोशिश खुद पर काबू पाने में की और फिर मरीजों की काउंसिलिंग शुरू कर दी। मरीज पहले तैनात हुए स्टाफ के व्यवहार से दुखी और नाराज थे। उन्होंने उन्हें अच्छे इलाज और स्वस्थ होने का भरोसा दिलाया। उन्हें प्रार्थना करना भी सिखाया ताकि उनका ईश्वर पर भरोसा बना रहे। इलाज चलता रहा। अब तक वह अपने परिवार से दूर हैं, सिर्फ फोन पर ही बच्चों और पति से बात होती है। बच्चे छोटे हैं और खाना नहीं बना सकते। उनके पति ही खाना बना रहे हैं लेकिन उन्हें भी रोटी बनानेृी नहीं आती। बच्चों को मलाल है कि मम्मी जल्दी घर आ जाएं तो उन्हें रोटी खाने को मिले।
बता नहीं सकती.. मरीजों की पहली रिपोर्ट
निगेटिव आने के बाद कितनी खुशी हुई
हो सकता है कोरोना का इलाज मिल
जाए पर यह वक्त कभी नहीं भूलूंगी
सीनियर नर्सिंग ऑफिसर सोनिया मसीह ने बताया कि जब उन्हें कोरोना वार्ड में तैनाती का आदेश मिला तो वह काफी घबरा गईं। संक्रमित होकर परिवार से बिछड़ने का डर काफी देर तक हावी रहा लेकिन फिर भी उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। शुरू में मरीजों में पिछले स्टाफ के व्यवहार के कारण इतनी नाराजगी थी कि वह उनसे बात करने का प्रयास करती थीं तो वह बात नहीं करते थे। दो दिन तक यह सिलसिला चला, फिर मरीजों की शिकायत दूर हुई तो वे उन्हें सिस्टर के बजाय दीदी कहकर पुकारने लगे। उन लोगों के बीच एक अपनेपन का रिश्ता बन गया। मगर फिर भी परिवार से दूर रहने की कसक लगातार परेशान करती रही। इस बीच जब मरीजों की पहली निगेटिव रिपोर्ट आई तो वह खुशी से झूम उठी। सोनिया का कहना था कि कोरोना पर रिसर्च चल रही है, हो सकता है जल्द इसका कोई इलाज भी खोज लिया जाए लेकिन जो वक्त उन्होंने मरीजों के साथ गुजारा है, वह उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगी।
इस जंग में हमने जो हासिल किया
वह जो खोया उससे बहुत कम
संक्रमित परिवार को पहले ही दिन बताया
था सिर्फ भरोसा ही इस बीमारी की दवा
डॉ. संजय सिंह के मुताबिक कोरोना से जंग लड़ना उनका नया अनुभव है। उनकी ड्यूटी शाम की पाली में लगी थी। जब वह पहुंचते थे तो दिन भर की गतिविधियों पर मरीजों से साथ स्टाफ से भी बातचीत करते थे। और लोगों की तरह कोरोना वार्ड में पहली बार दाखिल होने के बाद वह भी अपने घर वापस नहीं गए। खुद को और परिवार को सुरक्षित करने के लिए क्वारंटीन कर लिया। मरीजों को भी बता दिया बीमारी का इलाज मुश्किल है और सिर्फ उम्मीद, भरोसा और सकारात्मक सोच ही इसका इलाज है। उनके साथ बाकी स्टाफ लगातार यह कोशिश करता रहा और मरीजों में भरोसा जगाने कामयाब रहा। पहली रिपोर्ट के बाद दूसरी रिपोर्ट नेगेटिव आई। पति-पत्नी घर गए उसके बाद उनके माता, पिता, भाई, बहन भी घर चले गए। मगर इस जंग में उन्होंने जो अर्पित किया है उससे ज्यादा उन्होंने कुछ हासिल किया है जिसका उन्हें गर्व है।