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‘रोशनी की मीनार थी दिलीप कुमार की शख्सियत’
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शायर वसीम बरेलवी।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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प्रख्यात शायर प्रो. वसीम बरेलवी ने साझा किए उनसे जुड़े कई संस्मरण
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बोले- दिलीप साहब की एक झलक पाने के लिए छत पर बैठकर किया कई घंटे इंतजार
बरेली। ‘दिलीप साहब की शख्सियत रोशनी की मीनार थी। जो भी किरदार उन्होंने निभाया वह अमर हो गया। जो उनसे मिलता उन्हीं का हो जाता था।’ यह कहना हैं मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी का। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि कम लफ्जों में हजारों बातें करने वाले दिलीप साहब के जाने पर तीन पीढ़ियों ने खिराजे अकीदत पेश की है। यह साहित्य, सांस्कृतिक जगत के लिए अपूर्णनीय क्षति है।
वसीम बरेलवी ने कहा कि जब वह दिल्ली के हिंदू कॉलेज में पढ़ाते थे, तब इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के रामलीला मैदान में कार्यक्रम आयोजित किया था। उसमें दिलीप साहब के आने की जानकारी मिलने पर वह अपने साथी के संग उन्हें देखने पहुंचे। जगह नहीं मिली तो पास के एक घर की छत पर चढ़ गए। रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। लोग घरोें की छतों, पेड़ों और जहां से भी मंच दिखाई दे सकता था, उस जगह बैठकर दिलीप कुमार की एक झलक पाने को बेताब थे। नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ। नेहरू मंच से भाषण दे रहे थे। इसी बीच दिलीप साहब गाड़ी से पहुंचे। सफेद पैंट और कोट पहने थे। हजारों तालियों की गूंज से नेहरू का भाषण प्रभावित हो गया। तभी उन्होंने दिलीप साहब का परिचय दिया।
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जब पीछे वाली सीट पर बैठे दिलीप साहब
प्रो. वसीम ने बताया कि साठ के दशक में दिल्ली के विज्ञान भवन में बड़ी कॉन्फ्रें स हुई थी। इसमें सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खां भी मौजूद थे। आजाद हिंद फौज के जनरल शहनवाज साहब कन्वीनर थे। हम सभी लोग नीचे बैठे थे, मंच पर सभी बड़ी सियासी शख्सियत थीं। इसी दौरान दिलीप साहब आए। हाल भरा हुआ था। वह पीछे के दरवाजे से दाखिल हुए और वहीं एक सीट पर बैठ गए। लोगों की नजर उन पर पड़ी तो मंच से फिल्म निर्माता, निर्देशक ताराचंद बड़जात्या जी ने उद्घोषणा की हिंदी सिनेमा के महान कलाकार दिलीप साहब हमारे बीच मौजूद हैं, तब दिलीप साहब ने हाथ जोड़कर कहा कि वह वहीं ठीक हैं, लेकिन ताराचंद जी खुद उनके पास पहुंचे और मंच तक ले गए।
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फिराक साहब ने पूछा- ‘कौन हो भाई’
वसीम बरेलवी ने बताया कि मुंबई के साबू सिद्दीक हॉल में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। इसमें मजरूह सुल्तानपुरी, फिराक गोरखपुरी के साथ वह खुद भी मौजूद थे। देश के और भी कई बड़े शायर मौजूद थे। जैसे ही दिलीप साहब वहां पहुंचे आठ से दस हजार लोगों की तालियों से हाल गूंज उठा। फिराक साहब का व्यक्तित्व और मिजाज थोड़ा अलग था। दिलीप साहब मंच पर सभी शायरों से मुखातिब हो रहे थे। उनकी नजर फिराक साहब पर पड़ी तो वह पास जा पहुंचे। कहा- फिराक साहब आदाब पेश करता हूं तो फिराक साहब का जवाब था ‘कौन हो भाई’। दिलीप साहब ने अपना परिचय दिया और अपने भाषण में फिराक साहब की जमकर तारीफ की।
उन्हें कई रंगों में देखने का मुझे मौका मिला
वसीम बरेलवी ने बताया कि उन्हें दिलीप साहब को कई रंगों में देखने का मौका मिला। कभी कोई हल्की बात उन्होंने नहीं की। न ही स्टेज पर और न ही व्यक्तिगत जीवन में। वह कभी कंट्रोवर्सी में नहीं पड़े। मैं उन्हें यही कहकर खिराजे अकीदत पेश करता हूं कि उन जैसी शख्सियत बहुत कम दुनिया के अंदर आती हैं। फिल्मी मकबूलियत तो अपनी जगह पर है, लेकिन इल्मी और अदब की मकबूलियत और इतना एतबार उनके अलावा कहीं और नहीं देखा जा सकता। दिलीप कुमार जैसे इंसान विरले ही पैदा होते हैं।
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बोले- दिलीप साहब की एक झलक पाने के लिए छत पर बैठकर किया कई घंटे इंतजार बरेली। ‘दिलीप साहब की शख्सियत रोशनी की मीनार थी। जो भी किरदार उन्होंने निभाया वह अमर हो गया। जो उनसे मिलता उन्हीं का हो जाता था।’ यह कहना हैं मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी का। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि कम लफ्जों में हजारों बातें करने वाले दिलीप साहब के जाने पर तीन पीढ़ियों ने खिराजे अकीदत पेश की है। यह साहित्य, सांस्कृतिक जगत के लिए अपूर्णनीय क्षति है।
वसीम बरेलवी ने कहा कि जब वह दिल्ली के हिंदू कॉलेज में पढ़ाते थे, तब इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के रामलीला मैदान में कार्यक्रम आयोजित किया था। उसमें दिलीप साहब के आने की जानकारी मिलने पर वह अपने साथी के संग उन्हें देखने पहुंचे। जगह नहीं मिली तो पास के एक घर की छत पर चढ़ गए। रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था। लोग घरोें की छतों, पेड़ों और जहां से भी मंच दिखाई दे सकता था, उस जगह बैठकर दिलीप कुमार की एक झलक पाने को बेताब थे। नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ। नेहरू मंच से भाषण दे रहे थे। इसी बीच दिलीप साहब गाड़ी से पहुंचे। सफेद पैंट और कोट पहने थे। हजारों तालियों की गूंज से नेहरू का भाषण प्रभावित हो गया। तभी उन्होंने दिलीप साहब का परिचय दिया।
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जब पीछे वाली सीट पर बैठे दिलीप साहब
प्रो. वसीम ने बताया कि साठ के दशक में दिल्ली के विज्ञान भवन में बड़ी कॉन्फ्रें स हुई थी। इसमें सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खां भी मौजूद थे। आजाद हिंद फौज के जनरल शहनवाज साहब कन्वीनर थे। हम सभी लोग नीचे बैठे थे, मंच पर सभी बड़ी सियासी शख्सियत थीं। इसी दौरान दिलीप साहब आए। हाल भरा हुआ था। वह पीछे के दरवाजे से दाखिल हुए और वहीं एक सीट पर बैठ गए। लोगों की नजर उन पर पड़ी तो मंच से फिल्म निर्माता, निर्देशक ताराचंद बड़जात्या जी ने उद्घोषणा की हिंदी सिनेमा के महान कलाकार दिलीप साहब हमारे बीच मौजूद हैं, तब दिलीप साहब ने हाथ जोड़कर कहा कि वह वहीं ठीक हैं, लेकिन ताराचंद जी खुद उनके पास पहुंचे और मंच तक ले गए।
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