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बरेली में संजय बने जिला पंचायत अध्यक्ष
बरेली
Updated Fri, 08 Jan 2016 01:43 AM IST
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संजय की विजय, जंग जीत ली भगवत ने
60 में से 50 सपा के, बसपा को मिले कुल आठ
बरेली। आखिर भगवत सरन गंगवार की रणनीति ने संजय को जिला पंचायत अध्यक्ष का ताज पहना दिया। साठ सदस्यीय सदन में सपा के संजय सिंह ने 50 वोट हासिल कर अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर ली है। सपा का 51वां वोट निरस्त हो गया। बसपा के राजेश सागर को सिर्फ आठ वोट ही मिले। बसपा का एक सदस्य इसलिए मत देने नहीं आया क्योंकि पार्टी के एक नेता ने उसकी निष्ठा पर सवाल उठा दिया था। परिणाम का अनुमान पहले ही था। सपाइयों में सुबह से ही जश्न का माहौल था वहीं बसपा के बड़े नेता चुनाव से ही किनारा किए रहे।
कलेक्ट्रेट स्थित कक्ष संख्या तीन में सुबह 11 बजे से शुरू हुए मतदान के लिए सपा खेमे से (भाजपाइयों व बसपा के बागियों समेत)50 सदस्यों को बस में बैठाकर लाया गया। एक घंटे में इन सभी 50 सदस्यों ने मतदान कर दिया। बसपा प्रत्याशी राजेश सागर लगभग एक बजे सात अन्य सदस्यों के साथ मतदान करने पहुंचे। भाजपा की प्रत्याशी रहीं मंजू सिंह दोपहर करीब डेढ़ बजे पहुंचीं और अपने पति मोहन सिंह तथा बहेड़ी के पूर्व भाजपा विधायक छत्रपाल सिंह गंगवार के साथ वोट डालकर निकल गईं। बसपा समर्थित वार्ड 34 के सदस्य मधुसूदन सिंह मतदान की समाप्ति के समय तीन बजे तक नहीं आए। इसके बाद प्रेक्षक अनिल कुमार सागर की देखरेख में रिटर्निंग आफिसर डीएम गौरव दयाल और सीडीओ शिवसहाय अवस्थी ने मतों की गणना की। करीब 15 मिनट में ही सारे मत गिन लिए गए और सवा तीन बजे संजय को विजयी घोषित कर दिया गया।
सपाइयों ने मनाया जश्न
जैसे ही मतगणना परिणाम की घोषणा की गई, सारे सपा नेता और कार्यकर्ताओं का हुजूम कलेक्ट्रेट कैंपस में जुट गया। फूल मालाओं से नवनिर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह को लाद दिया गया। कलेक्ट्रेट गेट के बाहर मतगणना होने तक जुटे रहे सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह, पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार, विधायक अताउररहमान, भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम, राज्य एकीकरण परिषद के उपाध्यक्ष आबिद खां, महानगर अध्यक्ष जफर बेग, प्रदेश सचिव डॉ. अनिल शर्मा और पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव समेत कई नेताओं ने भी संजय सिंह को बधाई दी।
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निरस्त वोट किसका था?
मतगणना के बाद सवाल उठा कि निरस्त वोट किसका था। हालांकि मतदान गोपनीय होता है लेकिन सपा के ही एक बड़े नेता का कहना है कि ये वोट कल्पना सागर का था, जो वोट देने तो आयी लेकिन ये वोट किसी के काम नहीं आया। विधायक सियाराम सागर का परिवार चुनाव से पहले हुई अपनी कूटनीतिक हार से बेहद आहत है। एक होटल में विधायक ने जिला अध्यक्ष के सामने अपना गुस्सा भी निकाला और 20 साल की सेवा का मेवा न मिलने पर हताशा जाहिर की।
सागर पस्त, शहजिल सरेंडर, वीरपाल की बल्ले-बल्ले
बरेली। प्रत्यक्ष तौर पर यह संजय सिंह की जीत है लेकिन असल जीत इस चुनाव की व्यूह रचना करने वाले भगवत सरन गंगवार की है। पिछले दिनों बरेली के पार्टी नेताओं के फीडबैक की वजह से मंत्री पद गंवाने के बाद भगवत ने इस चुनाव के बहाने न सिर्फ सभी विरोधियों को साध कर पार्टी को एकजुट किया बल्कि ऐसे लोगों को सरेंडर करने के लिए भी मजबूर कर दिया जो संजय का टिकट कटाने के लिए बड़े नेताओं को साधनेे में लगे थे। उन्होंने ही संजय के रूप में सपा के सामने जिला पंचायत की इस आरक्षित सीट पर प्रत्याशी का विकल्प खड़ा किया और उनका टिकट बचाने से लेकर जिताने तक में अहम भूमिका निभाई। बहुत खूबसूरती से उन्होंने जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह को आगे कर उनकी बल्ले बल्ले करवा दी।
असल में ये लड़ाई सपा और विपक्ष न होकर सपा की अंदरूनी लड़ाई अधिक हो गई थी। बसपा ने भी इसमें शिरकत करने की कोशिश की। इस चक्कर में उसका कुनबा ही बिखर गया। समजावादी पार्टी में शहजिल इस्लाम शुरू में कल्पना के पक्ष में आ गए थे। विधायक सियाराम सागर को संबल देेने वालों में शहजिल के अलावा नवाबगंज की चेयरमैन शहला ताहिर का नाम भी आया। ये नाम तब भी आए थे जब मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ। ये मोर्चा सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव से करीबी बना कर संजय के बहाने इस बार भी भगवत सरन का खेल बिगाड़ने के मूड में था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि संजय के पक्ष में इतने वोट जुट गए थे कि टिकट बदलना संभव नहीं था। संजय की जीत के जश्न में शहजिल कलेक्ट्रेट पर नजर आए। मतदान का दिन छोड़ दें तो बाकी समय अग्रिम मोर्चे पर पार्टी के जिलाध्यक्ष वीरपाल ही दिख रहे थे। सदस्यों का लाभ कराने में जिलाध्यक्ष का अहम रोल रहा और इस प्रक्रिया में वह भी बल्ले बल्ले मूड में रहे। संजय के बारे में चर्चा है कि वोट पटाने के लिए उन्हें बहुत खर्च करना पड़ा। पार्टी के बड़े नेता जो कहते वह करते रहे। विधायक सियाराम सागर के परिवार को टिकट तो नहीं ही मिला, इस चुनाव में उन्हें कई तरह से और कई मोर्चों पर आहत होना पड़ा। कहा तो ये भी जा रहा है कि उनके नुकसान की पूरी भरपाई भी नहीं हो पायी है।
गंगवार ने संजय को अपने इलाके के वार्ड आठ से सदस्य का चुनाव लड़ाकर इस खेल की नींव रख दी थी। संजय को अध्यक्ष का टिकट दिलाने से लेकर उनके लिए सदस्यों को जुटाने तक वह सबसे आगे रहे। मतदान के लिए संजय के पक्ष में जिन 50 सदस्यों को लेकर बस कलेक्ट्रेट पहुंची थी, उसमें भगवत सरन न सिर्फ सवार थे बल्कि गेट खुलने के बाद सबसे पहले वही नीचे उतरे और हाथ में थाम रखी लिस्ट में नाम देख-देखकर एक-एक सदस्य को नीचे उतारकर मतदान स्थल तक पहुंचवाया। सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव ने जिले में पार्टी संगठन का नेतृत्व करने की वजह से शो लूट लिया। गुटबाजी की वजह से बिखरे सपा के सदस्यों को एकजुट करना आसान नहीं था।
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60 में से 50 सपा के, बसपा को मिले कुल आठ
बरेली। आखिर भगवत सरन गंगवार की रणनीति ने संजय को जिला पंचायत अध्यक्ष का ताज पहना दिया। साठ सदस्यीय सदन में सपा के संजय सिंह ने 50 वोट हासिल कर अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर ली है। सपा का 51वां वोट निरस्त हो गया। बसपा के राजेश सागर को सिर्फ आठ वोट ही मिले। बसपा का एक सदस्य इसलिए मत देने नहीं आया क्योंकि पार्टी के एक नेता ने उसकी निष्ठा पर सवाल उठा दिया था। परिणाम का अनुमान पहले ही था। सपाइयों में सुबह से ही जश्न का माहौल था वहीं बसपा के बड़े नेता चुनाव से ही किनारा किए रहे।
कलेक्ट्रेट स्थित कक्ष संख्या तीन में सुबह 11 बजे से शुरू हुए मतदान के लिए सपा खेमे से (भाजपाइयों व बसपा के बागियों समेत)50 सदस्यों को बस में बैठाकर लाया गया। एक घंटे में इन सभी 50 सदस्यों ने मतदान कर दिया। बसपा प्रत्याशी राजेश सागर लगभग एक बजे सात अन्य सदस्यों के साथ मतदान करने पहुंचे। भाजपा की प्रत्याशी रहीं मंजू सिंह दोपहर करीब डेढ़ बजे पहुंचीं और अपने पति मोहन सिंह तथा बहेड़ी के पूर्व भाजपा विधायक छत्रपाल सिंह गंगवार के साथ वोट डालकर निकल गईं। बसपा समर्थित वार्ड 34 के सदस्य मधुसूदन सिंह मतदान की समाप्ति के समय तीन बजे तक नहीं आए। इसके बाद प्रेक्षक अनिल कुमार सागर की देखरेख में रिटर्निंग आफिसर डीएम गौरव दयाल और सीडीओ शिवसहाय अवस्थी ने मतों की गणना की। करीब 15 मिनट में ही सारे मत गिन लिए गए और सवा तीन बजे संजय को विजयी घोषित कर दिया गया।
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सपाइयों ने मनाया जश्न
जैसे ही मतगणना परिणाम की घोषणा की गई, सारे सपा नेता और कार्यकर्ताओं का हुजूम कलेक्ट्रेट कैंपस में जुट गया। फूल मालाओं से नवनिर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह को लाद दिया गया। कलेक्ट्रेट गेट के बाहर मतगणना होने तक जुटे रहे सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह, पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार, विधायक अताउररहमान, भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम, राज्य एकीकरण परिषद के उपाध्यक्ष आबिद खां, महानगर अध्यक्ष जफर बेग, प्रदेश सचिव डॉ. अनिल शर्मा और पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव समेत कई नेताओं ने भी संजय सिंह को बधाई दी।
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निरस्त वोट किसका था?
मतगणना के बाद सवाल उठा कि निरस्त वोट किसका था। हालांकि मतदान गोपनीय होता है लेकिन सपा के ही एक बड़े नेता का कहना है कि ये वोट कल्पना सागर का था, जो वोट देने तो आयी लेकिन ये वोट किसी के काम नहीं आया। विधायक सियाराम सागर का परिवार चुनाव से पहले हुई अपनी कूटनीतिक हार से बेहद आहत है। एक होटल में विधायक ने जिला अध्यक्ष के सामने अपना गुस्सा भी निकाला और 20 साल की सेवा का मेवा न मिलने पर हताशा जाहिर की।
सागर पस्त, शहजिल सरेंडर, वीरपाल की बल्ले-बल्ले
बरेली। प्रत्यक्ष तौर पर यह संजय सिंह की जीत है लेकिन असल जीत इस चुनाव की व्यूह रचना करने वाले भगवत सरन गंगवार की है। पिछले दिनों बरेली के पार्टी नेताओं के फीडबैक की वजह से मंत्री पद गंवाने के बाद भगवत ने इस चुनाव के बहाने न सिर्फ सभी विरोधियों को साध कर पार्टी को एकजुट किया बल्कि ऐसे लोगों को सरेंडर करने के लिए भी मजबूर कर दिया जो संजय का टिकट कटाने के लिए बड़े नेताओं को साधनेे में लगे थे। उन्होंने ही संजय के रूप में सपा के सामने जिला पंचायत की इस आरक्षित सीट पर प्रत्याशी का विकल्प खड़ा किया और उनका टिकट बचाने से लेकर जिताने तक में अहम भूमिका निभाई। बहुत खूबसूरती से उन्होंने जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह को आगे कर उनकी बल्ले बल्ले करवा दी।
असल में ये लड़ाई सपा और विपक्ष न होकर सपा की अंदरूनी लड़ाई अधिक हो गई थी। बसपा ने भी इसमें शिरकत करने की कोशिश की। इस चक्कर में उसका कुनबा ही बिखर गया। समजावादी पार्टी में शहजिल इस्लाम शुरू में कल्पना के पक्ष में आ गए थे। विधायक सियाराम सागर को संबल देेने वालों में शहजिल के अलावा नवाबगंज की चेयरमैन शहला ताहिर का नाम भी आया। ये नाम तब भी आए थे जब मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ। ये मोर्चा सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव से करीबी बना कर संजय के बहाने इस बार भी भगवत सरन का खेल बिगाड़ने के मूड में था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि संजय के पक्ष में इतने वोट जुट गए थे कि टिकट बदलना संभव नहीं था। संजय की जीत के जश्न में शहजिल कलेक्ट्रेट पर नजर आए। मतदान का दिन छोड़ दें तो बाकी समय अग्रिम मोर्चे पर पार्टी के जिलाध्यक्ष वीरपाल ही दिख रहे थे। सदस्यों का लाभ कराने में जिलाध्यक्ष का अहम रोल रहा और इस प्रक्रिया में वह भी बल्ले बल्ले मूड में रहे। संजय के बारे में चर्चा है कि वोट पटाने के लिए उन्हें बहुत खर्च करना पड़ा। पार्टी के बड़े नेता जो कहते वह करते रहे। विधायक सियाराम सागर के परिवार को टिकट तो नहीं ही मिला, इस चुनाव में उन्हें कई तरह से और कई मोर्चों पर आहत होना पड़ा। कहा तो ये भी जा रहा है कि उनके नुकसान की पूरी भरपाई भी नहीं हो पायी है।
गंगवार ने संजय को अपने इलाके के वार्ड आठ से सदस्य का चुनाव लड़ाकर इस खेल की नींव रख दी थी। संजय को अध्यक्ष का टिकट दिलाने से लेकर उनके लिए सदस्यों को जुटाने तक वह सबसे आगे रहे। मतदान के लिए संजय के पक्ष में जिन 50 सदस्यों को लेकर बस कलेक्ट्रेट पहुंची थी, उसमें भगवत सरन न सिर्फ सवार थे बल्कि गेट खुलने के बाद सबसे पहले वही नीचे उतरे और हाथ में थाम रखी लिस्ट में नाम देख-देखकर एक-एक सदस्य को नीचे उतारकर मतदान स्थल तक पहुंचवाया। सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव ने जिले में पार्टी संगठन का नेतृत्व करने की वजह से शो लूट लिया। गुटबाजी की वजह से बिखरे सपा के सदस्यों को एकजुट करना आसान नहीं था।