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Bareilly News: जिले में मिली कोझिकोड लीफ फ्लॉवर की दुर्लभ प्रजाति
Fri, 09 Aug 2024 06:01 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Fri, 09 Aug 2024 06:01 AM IST
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बरेली। जिले में कोझिकोड लीफ फ्लॉवर की दुर्लभ प्रजाति मिली है। इसके मिलने के बाद प्रदेश में इस प्रजाति की संख्या 10 हो गई है। इससे शोधार्थियों को नए शोध करने में सहायता मिलेगी। साथ ही, पौधे की इस प्रजाति के औषधीय गुणों का सदुपयोग हो सकेगा।
बरेली कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर विनय कुमार सिंह के अनुसार ''''''''कोझिकोड लीफ फ्लॉवर'''''''' फूल वाला पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम फाइलैंथस है। इसकी नौ प्रजातियां अब तक प्रदेश में मिली हैं। हाल ही में एक शोध में टीम को सेटेलाइट बस स्टैंड क्षेत्र में इसकी रीडिआई प्रजाति मिली है। इसके बाद प्रदेश में इसकी संख्या 10 हो गई है।
फाइलैंथस पौधे का जीनस है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति में औषधि के रूप में किया जाता है। इस प्रजाति पर अन्य की तरह शोध नहीं किया गया है। इसके सटीक औषधीय गुणों की पुष्टि के लिए आगे शोध किया जाएगा। नई प्रजाति से स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण के प्रयासों को भी बल मिलेगा। डॉ. विनय के साथ शोध में बरेली कॉलेज के शिक्षक डॉ. रागिब हुसैन, डॉ. नीरज पाल मलिक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. राघवेंद्र सिंह भी शामिल रहे। इस खोज को ‘इंडियन जर्नल ऑफ फॉरेस्ट्री’ में प्रकाशित किया गया है।
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बरेली कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर विनय कुमार सिंह के अनुसार ''''''''कोझिकोड लीफ फ्लॉवर'''''''' फूल वाला पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम फाइलैंथस है। इसकी नौ प्रजातियां अब तक प्रदेश में मिली हैं। हाल ही में एक शोध में टीम को सेटेलाइट बस स्टैंड क्षेत्र में इसकी रीडिआई प्रजाति मिली है। इसके बाद प्रदेश में इसकी संख्या 10 हो गई है।
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फाइलैंथस पौधे का जीनस है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति में औषधि के रूप में किया जाता है। इस प्रजाति पर अन्य की तरह शोध नहीं किया गया है। इसके सटीक औषधीय गुणों की पुष्टि के लिए आगे शोध किया जाएगा। नई प्रजाति से स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण के प्रयासों को भी बल मिलेगा। डॉ. विनय के साथ शोध में बरेली कॉलेज के शिक्षक डॉ. रागिब हुसैन, डॉ. नीरज पाल मलिक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. राघवेंद्र सिंह भी शामिल रहे। इस खोज को ‘इंडियन जर्नल ऑफ फॉरेस्ट्री’ में प्रकाशित किया गया है।
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