UP: सोने पर छाई महंगाई, ग्राहकों को लुभा रही बरेली की एंब्रोस कारीगरी, ऑर्डर पर बन रहे गहने; जानें खासियत
सोने की बढ़ती कीमतों के चलते हल्के वजन के गहनों की मांग बढ़ी है, जिससे बरेली की पारंपरिक एंब्रोस कारीगरी से बने आभूषणों की मांग में उछाल आया है। अक्षय तृतीया के लिए उत्तर प्रदेश सहित राजस्थान, मुंबई, मध्य प्रदेश और जम्मू कश्मीर से ऑर्डर मिल रहे हैं।
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सोने की महंगाई से हल्के वजन के गहनों की मांग बढ़ गई है। इससे बरेली की पारंपरिक स्वर्णकारी पद्धति एंब्रोस से तराशे गहनों की मांग में उछाल आया है। अक्षय तृतीया के लिए उत्तर प्रदेश समेत राजस्थान, मुंबई, मध्य प्रदेश, जम्मू कश्मीर के ऑर्डर पर गहने बनाए जा रहे हैं।
बरेली में एंब्रोस पद्धति की कारीगरी सदियों से चली आ रही है। सैकड़ों परिवारों की कई पीढ़ियां इससे जुड़ी रही हैं। मूल रूप से शाहजहांपुर निवासी स्वर्णकार दिनेश वर्मा की तीसरी पढ़ी बरेली में गहनों को तराश रही है। उन्होंने बताया कि शाहजहांपुर में दादा स्वर्णकारी करते थे। वह एंब्रोस कारीगरी सीखने के लिए बरेली आए। कारोबार बेहतर हुआ तो यहीं आशियाना भी बना लिया। मेरठ, कोलकाता, राजकोट, मुंबई में सोने के गहनों का काम विजिल पद्धति से होता है, जबकि एंब्रोस सिर्फ बरेली की कला है।
एंब्रोस की कला से झुमके, नथुनी, हार आदि गहने बनते हैं। ये वजन में बेहद हल्के होते हैं। कहा कि झुमका गिरा रे..., झुमका बरेली वाला, व्हाट झुमका.. जैसे गीतों ने बरेली के झुमके की मांग बढ़ा दी थी। अब सोने की महंगाई से झुमकी, पेंडेंट की मांग सर्वाधिक हो रही है।
ढाई ग्राम सोने में बनते झुमके, पांच मिलीग्राम में झुमकी
किसना ज्वैलर्स के उदित गोयल के मुताबिक, एंब्रोस कारीगरी से सोने की न्यूनतम मात्रा में भी खूबसूरत गहने तैयार हो सकते हैं। पांच मिलीग्राम में झुमकी बनती है जो देखने में आकर्षक लेकिन किफायती होती है। वहीं, ढाई ग्राम सोने से एक जोड़ी झुमका बन जाता है। आकार ग्राहक की मांग के अनुसार दिया जाता है। शहर में बमनपुरी, पुराना शहर समेत जिले के पांच सौ स्वर्णकार फिलहाल गहनों को आकार दे रहे हैं।
निम्न आयवर्ग की कला अब उच्च मध्यम वर्ग की बनी पसंद
हरसहाय मल ज्वैलर्स के मोहित आनंद के मुताबिक, एंब्रोस कारीगरी पहले निम्न आयवर्ग की पहचान थी। सोना महंगा होने से अब मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के लोग भी इसे खरीदने लगे हैं। इससे पूर्व मेरठ, राजकोट, कोयंबटूर, कटक, टर्की, अमृतसरी, कोलकाता, मुंबई के फैंसी व भारी गहनों की मांग ज्यादा थी। महीन तार की कारीगरी वाले रामपुरी डिजाइन के गहनों को एक वर्ग विशेष के लोग ही खरीदते हैं। आर्थिक क्षमता के आधार पर सभी तरह के गहनों की मांग बाजार में है।
एंब्रोस पद्धति से गहने बनाने की प्रक्रिया स्वर्णकार के मुताबिक, जिस वजन के गहने बनाने हैं, उतना सोना गलाकर रेनी बनाकर मशीन से पतला करते हैं। फिर डाई काटकर डिजाइन बनाते हैं। इसे टांका काटना कहते हैं। चमक के लिए लाख चिपकाकर नोकदार चाकू से छिलाई (कटिंग) करते हैं। आखिर में मोटर पॉलिश से गहना निखरता है। क्रमवार सोने को गलाने, घिसाई, डाई, टांका, पॉलिश में सोने का वजन थोड़ा कम हो जाता है। लिहाजा, जितनी मात्रा में गहना बनाना है, उससे ज्यादा सोना प्रयोग होता है। यह अंतर मेकिंग जार्च में जुड़ता है।