Lok Sabha Elections: सियासी जमीन का पता नहीं, जातीय आंकड़ों पर नजर; जानिए इन दो लोकसभा सीटें के समीकरण
बरेली और आंवला लोकसभा क्षेत्र में सियासी बिसात बिछने लगी है। सभी दलों की नजर जातीय समीकरण पर है। उसी आधार पर उन्हें रिझाने व लुभाने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
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चुनावी बिसात पर जनता के मुद्दों के साथ ही जातीय समीकरणों को इस बार भी पूरी तरजीह दी जा रही है। राजनैतिक दलों से लेकर प्रत्याशियों तक ने अपनी-अपनी लोकसभा सीट पर जातिगत व धार्मिक आधार पर मतदाताओं का वर्गीकरण कर रखा है। उसी आधार पर उन्हें रिझाने व लुभाने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
बात बरेली व आंवला लोकसभा सीट की हो तो यहां का चुनाव भी इससे अछूता नहीं। पार्टियों व राजनैतिक विश्लेषकों के गुणा-गणित के हिसाब से कहीं मुस्लिम और कुर्मी मतदाता बहुसंख्यक हैं तो कहीं पिछड़ा वर्ग व अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। पार्टियों ने टिकट वितरण में भी जातीय समीकरण का ध्यान रखा है। चुनाव में जीत की राह भी प्रत्याशी इन्हीं समीकरणों को साधकर तय करने में जुटे हैं।
मुस्लिम और कुर्मी वोटर माने जा रहे निर्णायक
बरेली लोकसभा क्षेत्र में 18 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। राजनैतिक जानकारों के अनुसार इनमें मुस्लिम वोट बहुलता में हैं। कुर्मी, वैश्य वोटर भी अच्छी संख्या में हैं। राजनैतिक दलों ने अपने स्तर पर जो जातीय आकलन कराया है, उसके अनुसार शहर की सीट पर मुस्लिम मतदाता करीब सात लाख की संख्या में हैं। वहीं कुर्मी मतदाताओं की संख्या लगभग छह लाख है। जीत के लिए इन बड़े धड़ों को मुख्य रूप से रिझाने के साथ ही अन्य वर्गों को पक्ष में लाने की कोशिश उम्मीदवारों की रहती है।
यहां अन्य में अनुसूचित वर्ग का वोट करीब सवा दो लाख बताया जा रहा है। वैश्य मतदाता पौने दो लाख, कश्यप व मौर्य डेढ़-डेढ़ लाख, ब्राह्मण व कायस्थ सवा-सवा लाख और सिख व पंजाबी मतदाता करीब एक लाख हैं। बाकी में अन्य वर्ग के वोटर हैं। इसी क्रम में जातिवार मतदाताओं को उनकी संख्या और उनके प्रभाव के अनुसार रिझाने की जद्दोजहद इस समय भी तेज है।
पिछड़ा वर्ग की धमक, एससी का भी प्रभाव
जिले की प्रमुख आंवला लोकसभा सीट में करीब 15 लाख वोटर हैं। मुस्लिम मतदाता यहां भी ज्यादा हैं और उनकी संख्या करीब चार लाख है, लेकिन पिछड़ा वर्ग की धमक कहीं ज्यादा है। राजनैतिक जानकारों का कहना है कि अगर इस वोटबैंक को साध लिया जाए तो चुनावी वैतरणी पार करने में आसानी होगी। हो भी क्यों न, यहां कश्यप व यादव मतदाता करीब दो-दो लाख हैं। वहीं लोध राजपूतों की संख्या करीब पौने दो लाख है, जबकि लगभग सवा लाख मौर्य व करीब 80 हजार कुर्मी मतदाता हैं।
इस तरह ये संख्या बाकी सब पर भारी बैठती है। यहां अनुसूचित जाति के मतदाता भी कम नहीं और उनकी संख्या लगभग साढ़े तीन लाख है। इसके अलावा सवा लाख ठाकुर, एक लाख वैश्य व करीब 90 हजार ब्राह्मण मतदाता बताए जाते हैं। इन्हीं जातिगत आंकड़ों को आधार बनाकर राजनैतिक दल यहां प्रत्याशी उतारने से लेकर चुनाव जीतने के समीकरण तक तय करते हैं। प्रत्याशी भी अलग-अलग ढंग से इसी वोट बैंक में सेंध लगाकर अपने प्रचार को धार दे रहे हैं।
जाति व्यवस्था से प्रभावित है पूरी सामाजिक संरचना
बरेली कॉलेज के राजनीतिशास्त्री प्रो. वंदना शर्मा का कहना है कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रणाली की आत्मा होती है। यदि भारत में चुनाव और मतदान व्यवहार की बात की जाए तो यह तथ्य दिमाग में रखना होगा कि यहां की पूरी सामाजिक संरचना जाति व्यवस्था से प्रभावित है। ऐसे में मतदान व्यवहार पर इसका स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिलता है। राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों को मतदान व्यवहार को प्रभावित करने के लिए प्रयोग करते हैं। यही नहीं अगर कहा जाए कि भारत में जाति व्यवस्था राजनीतिकृत है तो गलत नहीं होगा।