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सूरत में ‘सूरत’ दिखाकर लौट आए विकास के गुर सीखने गए लोग
बरेली
Updated Mon, 18 Dec 2017 01:41 AM IST
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नगर निगम की ओर से सूरत में विकास के मॉडल को जानने-समझने गए लोग सूरत में अपनी ‘सूरत’ दिखाकर लौट आए। इस टूर का शहर को क्या और कितना फायदा मिला यह आज तक साफ नहीं हो पाया है। हालांकि पांच दिन के इस टूर पर नगर निगम ने करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च किए थे।
नगर निगम ने तीन साल पहले गुजरात के सूरत में विकास के मॉडल को बेहतरीन बताते हुए उससे विकास के गुर सीखने और उनका अपने शहर के विकास में इस्तेमाल करने की मंशा से एक दल भेजा था। इसमें पार्षद राजेश अग्रवाल, बबलू खान, रेहान अली, गौरव सक्सेना, छंगामल मौर्य, उवैस खां और सुखदेश कश्यप के अलावा अपर नगर आयुक्त ईश शक्ति सिंह, पर्यावरण अभियंता उत्तम कुमार वर्मा और तत्कालीन नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संधू शामिल थे। दल ने बरेली से दिल्ली और दिल्ली से सूरत तक का सफर थर्ड एसी ट्रेन में तय किया। अपर नगर आयुक्त ने बताया कि टूर के दौरान दल ने वहां वार्ड कार्यालय, जोन कार्यालय, कूड़ा इकट्ठा करने का तरीका, मेडिकल वेस्ट प्लांट, डोर टू डोर कलेक्शन, पानी सप्लाई, सीवेज प्लांट, टैक्स कलेक्शन की जानकारी ली थी। तत्कालीन कार्यकारिणी सदस्यों का कहना है कि उस समय सूरत के कई सुझावाें को निगम बोर्ड में भी रखा था लेकिन उनमें से एक भी लागू नहीं हो पाया। इसके बाद चंडीगढ़ भी एक दल भेजा गया, नतीजा उसका भी कुछ नहीं निकला।
सिंगापुर और यूरोप तक हो आए तत्कालीन नगर आयुक्त, नतीजा सिफर
तत्कालीन नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह और शीलधर सिंह यादव के साथ प्रदेश के अन्य नगर आयुक्त नगर विकास मंत्री आजम खां के साथ सिंगापुर में सफाई का मॉडल देखने गए थे, लेकिन वहां से लौटने के बाद किसी भी प्लान को धरातल पर नहीं लाया गया। सिंगापुर और यूरोप का आठ से दस दिन का टूर था। सिंगापुर और यूरोप के किसी एक शहर में जाने और आने का एक व्यक्ति का औसतन खर्च डेढ़ से दो लाख रुपये बैठता है।
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इंदौर टूर से लौटे नगर आयुक्त बोले- लागू करेंगे सफाई का प्लान
पिछले दिनाें इंदौर टूर पर गए बरेली के नगर आयुक्त आरके श्रीवास्तव का कहना है कि इस तरह के टूर से अगर शहर को फायदा न पहुंचे तो बेकार है। उन्होंने बताया कि इंदौर में उनको सफाई का एक काम काफी अच्छा लगा था, जिसे बरेली में लागू करने का प्लान बन गया है। इसके लिए सभी दुकानों और घराें के बाहर डस्टबिन रखने को अनिवार्य किया गया है। डस्टबिन उन्हीं के होंगे, सिर्फ कूड़ा हमारे कर्मी उठाएंगे, इससे कूड़ा कहीं फैल नहीं पाएगा वह डस्टबिन में ही रहेगा। इसके अलावा जल्द ही कुछ और रिक्शे भी बरेली में आएंगे जो एक ही रंग के होंगे। फूलों के कचरे के लिए भी अलग से रिक्शे मंगाए गए हैं जो शासन के अनुरूप ई-टेंडर से खरीदे जाएंगे। हालांकि नगर आयुक्त को इंदौर से लौटे डेढ़ महीने से ज्यादा वक्त हो गया है, मगर अभी तक किसी योजना को लागू करने की रूपरेखा नहीं बनी है।
कोट
सूरत से लौटकर डोर टू डोर सिस्टम में सुधार और बायोमेट्रिक हाजिरी लगवाने का सुझाव दिया गया था। इस पर नगर निगम आज तक काम नहीं कर पाया है। बायोमेट्रिक हाजिरी भी फेल हो गई। - राजेश अग्रवाल, नवनिर्वाचित पार्षद, रामपुरबाग वार्ड 35
सुझाव दिया गया था कि कूड़े का यूजर चार्ज अलग से न देकर लोगाें के बिलों में जोड़ दिया जाए। इससे यूजर चार्ज आसानी से वसूला जा सकेगा। इसके अलावा होर्डिंग हटाने संबंधी भी एक सुझाव था। इस पर भी कोई काम नहीं हुआ।
- गौरव सक्सेना, नवनिर्वाचित पार्षद, शास्त्रीनगर वार्ड 49
शिक्षा में भी रिसर्च टूर के नाम पर टूरिज्म
विदेशों में रिसर्च पेपर प्रजेंटेशन पर ही खर्च हो जाते लाखों
उच्च शिक्षा विभाग में कुछ शिक्षक तो वार्कई रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने जाते हैं पर ऐसे शिक्षकों की संख्या भी कम नहीं जो सिर्फ घूमने फिरने के लिए ही विदेशों में आयोजित कॉन्फ्रेंस में जाते हैं। सरकार इसके लिए लाखों की ग्रांट देती है। इनका नतीजा सिर्फ कागजों पर ही दिखता है हकीकत में नहीं। बरेली कॉलेज के एक विभाग में कुछ शिक्षकों का ग्रुप थाइलैंड एक कॉन्फ्रेंस में शामिल होने गया लेकिन वहां घूमने फिरने के अलावा कुछ नहीं किया। दूसरी तरफ जूलॉजी विभाग के एक शिक्षक इंडोनेशिया में साइंस कॉन्फ्रेंस में गए तो उनको वहां नार्थ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय में पिछले साल पांच शिक्षक अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के टूर पर टेक्यूप की ग्रांट से गए। आठ लाख रुपये की ग्रांट खर्च हुई। उसका फायदा सिर्फ शिक्षकों के एपीआई स्कोर बढ़ने में हुआ। छात्रों को क्या फायदा हुआ इसका असर नहीं दिखा। इनमें दो शिक्षक तो सिर्फ सैर सपाटा के ही मकसद से गए थे।
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नगर निगम ने तीन साल पहले गुजरात के सूरत में विकास के मॉडल को बेहतरीन बताते हुए उससे विकास के गुर सीखने और उनका अपने शहर के विकास में इस्तेमाल करने की मंशा से एक दल भेजा था। इसमें पार्षद राजेश अग्रवाल, बबलू खान, रेहान अली, गौरव सक्सेना, छंगामल मौर्य, उवैस खां और सुखदेश कश्यप के अलावा अपर नगर आयुक्त ईश शक्ति सिंह, पर्यावरण अभियंता उत्तम कुमार वर्मा और तत्कालीन नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संधू शामिल थे। दल ने बरेली से दिल्ली और दिल्ली से सूरत तक का सफर थर्ड एसी ट्रेन में तय किया। अपर नगर आयुक्त ने बताया कि टूर के दौरान दल ने वहां वार्ड कार्यालय, जोन कार्यालय, कूड़ा इकट्ठा करने का तरीका, मेडिकल वेस्ट प्लांट, डोर टू डोर कलेक्शन, पानी सप्लाई, सीवेज प्लांट, टैक्स कलेक्शन की जानकारी ली थी। तत्कालीन कार्यकारिणी सदस्यों का कहना है कि उस समय सूरत के कई सुझावाें को निगम बोर्ड में भी रखा था लेकिन उनमें से एक भी लागू नहीं हो पाया। इसके बाद चंडीगढ़ भी एक दल भेजा गया, नतीजा उसका भी कुछ नहीं निकला।
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सिंगापुर और यूरोप तक हो आए तत्कालीन नगर आयुक्त, नतीजा सिफर
तत्कालीन नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह और शीलधर सिंह यादव के साथ प्रदेश के अन्य नगर आयुक्त नगर विकास मंत्री आजम खां के साथ सिंगापुर में सफाई का मॉडल देखने गए थे, लेकिन वहां से लौटने के बाद किसी भी प्लान को धरातल पर नहीं लाया गया। सिंगापुर और यूरोप का आठ से दस दिन का टूर था। सिंगापुर और यूरोप के किसी एक शहर में जाने और आने का एक व्यक्ति का औसतन खर्च डेढ़ से दो लाख रुपये बैठता है।
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इंदौर टूर से लौटे नगर आयुक्त बोले- लागू करेंगे सफाई का प्लान
पिछले दिनाें इंदौर टूर पर गए बरेली के नगर आयुक्त आरके श्रीवास्तव का कहना है कि इस तरह के टूर से अगर शहर को फायदा न पहुंचे तो बेकार है। उन्होंने बताया कि इंदौर में उनको सफाई का एक काम काफी अच्छा लगा था, जिसे बरेली में लागू करने का प्लान बन गया है। इसके लिए सभी दुकानों और घराें के बाहर डस्टबिन रखने को अनिवार्य किया गया है। डस्टबिन उन्हीं के होंगे, सिर्फ कूड़ा हमारे कर्मी उठाएंगे, इससे कूड़ा कहीं फैल नहीं पाएगा वह डस्टबिन में ही रहेगा। इसके अलावा जल्द ही कुछ और रिक्शे भी बरेली में आएंगे जो एक ही रंग के होंगे। फूलों के कचरे के लिए भी अलग से रिक्शे मंगाए गए हैं जो शासन के अनुरूप ई-टेंडर से खरीदे जाएंगे। हालांकि नगर आयुक्त को इंदौर से लौटे डेढ़ महीने से ज्यादा वक्त हो गया है, मगर अभी तक किसी योजना को लागू करने की रूपरेखा नहीं बनी है।
कोट
सूरत से लौटकर डोर टू डोर सिस्टम में सुधार और बायोमेट्रिक हाजिरी लगवाने का सुझाव दिया गया था। इस पर नगर निगम आज तक काम नहीं कर पाया है। बायोमेट्रिक हाजिरी भी फेल हो गई। - राजेश अग्रवाल, नवनिर्वाचित पार्षद, रामपुरबाग वार्ड 35
सुझाव दिया गया था कि कूड़े का यूजर चार्ज अलग से न देकर लोगाें के बिलों में जोड़ दिया जाए। इससे यूजर चार्ज आसानी से वसूला जा सकेगा। इसके अलावा होर्डिंग हटाने संबंधी भी एक सुझाव था। इस पर भी कोई काम नहीं हुआ।
- गौरव सक्सेना, नवनिर्वाचित पार्षद, शास्त्रीनगर वार्ड 49
शिक्षा में भी रिसर्च टूर के नाम पर टूरिज्म
विदेशों में रिसर्च पेपर प्रजेंटेशन पर ही खर्च हो जाते लाखों
उच्च शिक्षा विभाग में कुछ शिक्षक तो वार्कई रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने जाते हैं पर ऐसे शिक्षकों की संख्या भी कम नहीं जो सिर्फ घूमने फिरने के लिए ही विदेशों में आयोजित कॉन्फ्रेंस में जाते हैं। सरकार इसके लिए लाखों की ग्रांट देती है। इनका नतीजा सिर्फ कागजों पर ही दिखता है हकीकत में नहीं। बरेली कॉलेज के एक विभाग में कुछ शिक्षकों का ग्रुप थाइलैंड एक कॉन्फ्रेंस में शामिल होने गया लेकिन वहां घूमने फिरने के अलावा कुछ नहीं किया। दूसरी तरफ जूलॉजी विभाग के एक शिक्षक इंडोनेशिया में साइंस कॉन्फ्रेंस में गए तो उनको वहां नार्थ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय में पिछले साल पांच शिक्षक अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के टूर पर टेक्यूप की ग्रांट से गए। आठ लाख रुपये की ग्रांट खर्च हुई। उसका फायदा सिर्फ शिक्षकों के एपीआई स्कोर बढ़ने में हुआ। छात्रों को क्या फायदा हुआ इसका असर नहीं दिखा। इनमें दो शिक्षक तो सिर्फ सैर सपाटा के ही मकसद से गए थे।