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Bareilly News: पद्मश्री कंवल सिंह चौहान बोले- खेती में जोखिम घटाएं, उत्पादन बढ़ाकर बनाएं मुनाफे का व्यवसाय
Tue, 02 Jun 2026 04:48 PM IST
Mukesh Kumar
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Published by: Mukesh Kumar
Updated Tue, 02 Jun 2026 04:48 PM IST
सार
बरेली के आईवीआरआई में आयोजित कार्यक्रम में पद्मश्री कंवल सिंह चौहान ने खेती में रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने किसानों की आय बढ़ाने के लिए खेती में जोखिम कम करने व उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।
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पद्मश्री कंवल सिंह चौहान
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
खेती को मुनाफा देने वाले व्यवसाय में कैसे बदला जाए, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं पद्मश्री कंवल सिंह चौहान। 15 वर्ष की आयु में उन्होंने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को समझा और लीक से हटकर काम किया। उनके अनूठे मॉडल से जुड़े क्षेत्र के 10,000 किसानों की आय में तीन-चार गुना तक की वृद्धि हुई है। सोमवार को बरेली के आईवीआरआई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बातचीत में उन्होंने रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर चिंता जताई। किसानों की आय बढ़ाने के लिए उनका जोखिम कम करने व उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।
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सवाल : पारंपरिक खेती से मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योग तक का सफर कैसा रहा?
जवाब : वर्ष 1978 से मैंने आय बढ़ाने के उपायों पर काम शुरू किया। 1990 के दशक में मुझे बेबीकॉर्न की खेती के बारे में पता चला। इससे न केवल आय बढ़ी, बल्कि पशुपालन को भी बढ़ावा मिला। वर्ष 1999 में मैंने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने का निर्णय लिया। एक छोटे किसान के लिए यह आसान नहीं था। मुझे इसमें 10 साल लग गए। वर्ष 2009 में पहली इकाई शुरू हुई। आज चार इकाइयां काम कर रही हैं।
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सवाल : आपकी प्रसंस्करण इकाइयों ने किसानों के भीतर खेती को लेकर किस तरह का विश्वास जगाया, इसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
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जवाब : जब हमारी पहली प्रसंस्करण इकाई स्थापित हुई तो हमने किसानों को बेबीकॉर्न, स्वीटकॉर्न, मशरूम और टमाटर जैसी फसलों के लिए न्यूनतम गारंटी मूल्य उपलब्ध कराया। इससे किसानों का जोखिम खत्म हो गया और उनका विश्वास बढ़ा। नतीजा, उत्पादन में भी वृद्धि हुई। ग्रामीण विकास और किसानों की आय में बदलाव के कारण ही मुझे वर्ष 2019 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।
सवाल : रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग पर आपकी क्या चिंताएं हैं और इसका क्या समाधान है?
जवाब : 1980 और 1990 के दशक में ऐसी स्थिति बन गई थी कि रसायनों के बिना खेती असंभव लगने लगी थी। इससे हमारे खाद्यान्न भंडार तो भर गए, लेकिन भूमि की उर्वरता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इसका एकमात्र समाधान यही है कि हम जैविक, प्राकृतिक और जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैसी पद्धतियों को अपनाएं।
सवाल : टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए आपने कौन से वैज्ञानिक और पारंपरिक प्रयोग किए हैं?
जवाब : भारतीय कृषि हमेशा से पशुधन पर आधारित रही है। गोबर और गोमूत्र का वैज्ञानिक उपयोग करके हम बेहद टिकाऊ कृषि मॉडल तैयार कर सकते हैं। मैंने प्राकृतिक खेती के माध्यम से बेहतरीन परिणाम हासिल किए हैं। हाल ही में मैंने गोबर आधारित उन्नत जैविक खाद और घोल का उपयोग किया है। ये रासायनिक उर्वरकों पर हमारी निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर उत्पादकता को बढ़ाते हैं।
सवाल : कृषि क्षेत्र में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित बीजों के उपयोग पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
जवाब : नई तकनीकों को लेकर मेरा दृष्टिकोण बहुत संतुलित है। हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग अवश्य करना चाहिए, लेकिन आंखें बंद करके नहीं। आनुवंशिक रूप से परिवर्तित बीजों को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना बेहद जरूरी है।
जवाब : 1980 और 1990 के दशक में ऐसी स्थिति बन गई थी कि रसायनों के बिना खेती असंभव लगने लगी थी। इससे हमारे खाद्यान्न भंडार तो भर गए, लेकिन भूमि की उर्वरता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इसका एकमात्र समाधान यही है कि हम जैविक, प्राकृतिक और जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैसी पद्धतियों को अपनाएं।
सवाल : टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए आपने कौन से वैज्ञानिक और पारंपरिक प्रयोग किए हैं?
जवाब : भारतीय कृषि हमेशा से पशुधन पर आधारित रही है। गोबर और गोमूत्र का वैज्ञानिक उपयोग करके हम बेहद टिकाऊ कृषि मॉडल तैयार कर सकते हैं। मैंने प्राकृतिक खेती के माध्यम से बेहतरीन परिणाम हासिल किए हैं। हाल ही में मैंने गोबर आधारित उन्नत जैविक खाद और घोल का उपयोग किया है। ये रासायनिक उर्वरकों पर हमारी निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर उत्पादकता को बढ़ाते हैं।
सवाल : कृषि क्षेत्र में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित बीजों के उपयोग पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
जवाब : नई तकनीकों को लेकर मेरा दृष्टिकोण बहुत संतुलित है। हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग अवश्य करना चाहिए, लेकिन आंखें बंद करके नहीं। आनुवंशिक रूप से परिवर्तित बीजों को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना बेहद जरूरी है।