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नर्सेज डे आजः कोविड वार्ड के दायरे में ही सिमट गई जिंदगी

Wed, 12 May 2021 01:54 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 12 May 2021 01:54 AM IST
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Nurses Day today: life reduced to the limits of the Kovid ward
कोरोना संक्रमित एक मरीज की सेवा करती एक नर्स। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

कोविड वार्ड में ड्यूटी करने वाली तमाम नर्सों ने परिवारों से बनाई दूरी, संगी-साथी भी छूटे
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दिन भर संक्रमितों के बीच और फिर क्वारंटीन, यही रह गया है हर रोज का सिलसिला

बरेली। आप उन्हें मन का डॉक्टर कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। उनका काम डॉक्टरों से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। दवाएं किसी मर्ज में तभी और कारगर होती हैं जब मरीज का हौसला कायम रहता हो और जहां इस हौसले की कमी दिखती है, वहीं नर्स का काम शुरू होता है। हर वक्त मरीजों के नजदीक रहते हुए उनकी देखभाल और दवा देने के साथ उनके मानसिक स्तर को मजबूत रखना और तनाव में न आने देना, यह इनकी ऐसी खूबी है जिसने कोरोना के भयावह दौर में न जाने कितने लोगों को फिर सेहतमंद बनाकर उनके परिवार को लौटाया है। इसके बदले खुद इन्होंने बहुत कुछ खोया है। कोरोना के दौर में मरीजों की सेवा करते हुए घर-परिवार बहुत पीछे छूट गया है। साथी और दोस्त छूटे तो जिंदगी जीने का ढंग भी बदल गया है। बस, स्वस्थ हुए लोगों की मुस्कराहटें ही इनकी पूंजी हैं।

दो साल में सिर्फ चार बार ही परिवार से मिल पाईं नेहा

सफेद यूनिफॉर्म के ऊपर नेहा राजपूत जब भी पीपीई किट पहनती है तो खुद को वाकई एक योद्धा महसूस करती हैं। एक मेडिकल कॉलेज के कोविड वार्ड में ड्यूटी करते हुए वह इस युद्ध में इतनी तल्लीनता से जुटी हैं कि पिछले दो सालों में सिर्फ चार बार ही परिवार से मिलना हो पाया है। नेहा कहती हैं कि यह एक ऐसी जंग है जिसे लड़ने के साथ जीतना भी जरूरी है। वह मरीजों को भी इसी तरह ढांढस बंधाती हैं। कहती हैं, कोविड आने से पहले ऐसा नहीं था। वह एटा की हैं लेकिन फिर भी परिवार से हर महीने मिलना-जुलना होता था। कई बार परिवार से इतना लंबे समय दूर रहना बहुत कठिन लगने लगता है लेकिन फिर खुद को समझाती हैं। मरीज संक्रमण मुक्त होने के बाद जब खिले चेहरे लेकर लौटते हैं तो उन्हें मन में चलने वाली उथल-पुथल काफी हद तक शांत हो जाती है। दो साल की ड्यूटी के दौरान एक बार वह खुद भी संक्रमित हो चुकी हैं।
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कोविड वार्ड में नहीं परिवार में जाने से डर लगता है

दीक्षा मैसी की जिंदगी उनकी हमउम्र लड़कियों से काफी अलग है। दो साल से वह भी लगातार कोविड वार्ड में ड्यूटी कर रही हैं। इन दो सालों में उन्होंने न बाजार में शॉपिंग की है न कहीं घूमने गई हैं। परिवार और परिचितों में कई शादी कार्यक्रम हो चुके हैं लेकिन वहां भी नहीं गईं। वजह इतनी ही है कि उनके जहन में हर वक्त उनके वार्ड में भर्ती कोरोना के मरीज रहते हैं। दीक्षा कहती हैं कि कोविड आने से पहले जिंदगी कुछ अलग थी लेकिन अब जैसे सबकुछ बदल सा गया है। अब महीने में 14 दिन उनकी ड्यूटी होती है। इसके बाद वह क्वारंटीन हो जाती है और फिर उनका कोविड टेस्ट होता है। भोजीपुरा में ही घर है लेकिन इस दौरान भी वह घर नहीं जातीं। कोविड वार्ड में ड्यूटी करने में उन्हें डर नहीं लगता लेकिन परिवार में जाते हुए लगता है। मरीजों की मुस्कान याद रहती है। वह मरीजों के ठीक होने का इंतजार करती है। मरीजों की दवाओं का ख्याल रखने के साथ यह भी सोचती हैं कि उन्हें कैसे सकारात्मक रखा जाए और कैसे हंसाकर तनाव कम किया जाए।
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मरीज की रिपोर्ट निगेटिव देखती हूं तो मन खुश हो जाता है

भोजीपुरा की ही राखी पाल भी एक मेडिकल कॉलेज के नर्सिंग स्टाफ का हिस्सा हैं। राखी बताती हैं कोविड आने से पहले उनकी जिंदगी बहुत सामान्य थी। ड्यूटी करके रोज घर लौटती थीं लेकिन अब ऐसा नहीं रहा है। पिछले दो साल में उनकी दिनचर्या इस तरह बदल गई है जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अब महीने में सिर्फ चार-पांच ही दिन होते हैं जब वह परिवार के साथ होती हैं। बाकी दिनों में कोविड ड्यूटी और कोरोना की जांच और रिपोर्ट आने तक क्वारंटीन रहना, यही जिंदगी हिस्सा बन गया है। राखी कहती हैं कि शुरू में कोरोना से डर लगता था लेकिन अब कोई डर नहीं है। एक ही लक्ष्य होता है कि मरीज स्वस्थ्य होकर घर लौटे। मरीजों की निगेटिव रिपोर्ट आने का इंतजार रहता है। किसी भी मरीज की रिपोर्ट निगेटिव देखती हूं तो मन खुश होता है।
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