मम्मियों ने ठानी बच्चों को पढ़कर है दिखाना
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बाकरगंज की रहने वाली शन्नी और रवीना ने अब पढ़ने की ठानी है। उनको कुछ बनना नहीं, बस अपने बच्चों के सामने खुद को साबित करना है कि वो भी हिंदी अंग्रेजी पढ़ सकती हैं। उनको भी पढ़ना आता है। होमवर्क के बारे में पूछने पर उनके बच्चे अक्सर उनको यह बोल देते थे कि उनको क्या पता स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है। कुछ ऐसे ही हाल में जी रहीं गौरी देवी और सुदामा ने भी शादी के कई साल बाद पढ़ने की ठानी हैं। वह पढ़ लिख नहीं सकती हैं, परिवार में उनको हीन भावना से देखा जाता है। समाज सेवा मंच नाम के सामाजिक संगठन ने जब बाकरगंज में गरीब तबके की महिलाओं को शिक्षित करने की पहल शुरू की तो यह महिलाएं सबसे पहले यहां पहुंची। अपनी व्यथा बताई और कहा कि बच्चों को दिखाना है कि वह भी हिंदी-अंग्रेजी पढ़ सकती हैं। उनको अनपढ़ कहकर बुलाया जाना बहुत चुभता है।
बरेली कॉलेज में लाइब्रेरी में कार्यरत गुले राना, फरजाना इकबाल शम्सी व कुछ अन्य पढ़ी लिखी महिलाओं ने सामाजिक संगठन से जुड़कर इन अनपढ़ महिलाओं को पढ़ाने का जिम्मा लिया है। बाकरगंज की अनपढ़ महिलाओं को पढ़ाने की पहल गुरुवार को शुरू हुई। कई महिलाएं पढ़ने की जिज्ञासा लेकर पहुंची और बताया कि वो इस उम्र में क्यों पढ़ना चाहती हैं। उनका कहना था कि अब हर काम पढ़ाई के बगैर नहीं हो सकता। परिवार में अपना महत्व साबित करना है तो पढ़ना भी पढ़ेगा। डॉ. शगुफ्ता गजल ने इन महिलाओं को निशुल्क किताबें वितरित कीं। समाज सेवा मंच के अध्यक्ष नदीम शमसी ने बताया कि संगठन की महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह पहल शुरू की है। आसपास की महिलाओं को शिक्षित करेंगी।