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Bareilly News: पीडब्ल्यूडी में 1.28 करोड़ के घोटाले में 16 दिन बाद एफआईआर नहीं
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बरेली। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के निर्माण खंड भवन में 1.28 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। वेतन और एरियर भुगतान से जुड़े इस मामले में 16 दिन बाद भी प्राथमिकी दर्ज नहीं हो सकी है। इस घोटाले में 89 लाख रुपये की वसूली हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। विभागीय अधिकारी पुलिस कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं।
विभाग की ओर से 1 अक्तूबर को छह लोगों के नाम से अज्ञातों पर प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोतवाली में तहरीर दी गई थी। हालांकि, तहरीर पर केवल अधिशासी अभियंता अब्दुल सत्तार के हस्ताक्षर थे। पुलिस ने संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर मांगे, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया। इसके चलते अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हो पाई है। पुलिस ने अब मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए उच्च अधिकारियों से अनुमति मांगने के लिए पत्र लिखा है।
इस मामले का खुलासा एजी कार्यालय से पत्र आने के बाद हुआ था। विभाग का पूरा ध्यान केवल रकम की वसूली और दोषियों को बचाने पर रहा। यही कारण है कि तहरीर भी अज्ञात के नाम पर दी गई। घोटाले में 22 कर्मचारियों और अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर कर भुगतान किया गया था। इनमें से 16 लोग कभी विभाग में कार्यरत ही नहीं रहे। छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है, लेकिन बड़े अधिकारियों पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। अधीक्षण अभियंता केके सिंह ने बताया कि मामले की जांच लखनऊ स्तर से चल रही है। टीम लगातार पुराने रिकॉर्ड और दूसरी चीजों को खंगाल कर जांच कर रही है। मामले में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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विभाग की ओर से 1 अक्तूबर को छह लोगों के नाम से अज्ञातों पर प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोतवाली में तहरीर दी गई थी। हालांकि, तहरीर पर केवल अधिशासी अभियंता अब्दुल सत्तार के हस्ताक्षर थे। पुलिस ने संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर मांगे, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया। इसके चलते अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हो पाई है। पुलिस ने अब मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए उच्च अधिकारियों से अनुमति मांगने के लिए पत्र लिखा है।
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इस मामले का खुलासा एजी कार्यालय से पत्र आने के बाद हुआ था। विभाग का पूरा ध्यान केवल रकम की वसूली और दोषियों को बचाने पर रहा। यही कारण है कि तहरीर भी अज्ञात के नाम पर दी गई। घोटाले में 22 कर्मचारियों और अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर कर भुगतान किया गया था। इनमें से 16 लोग कभी विभाग में कार्यरत ही नहीं रहे। छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है, लेकिन बड़े अधिकारियों पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। अधीक्षण अभियंता केके सिंह ने बताया कि मामले की जांच लखनऊ स्तर से चल रही है। टीम लगातार पुराने रिकॉर्ड और दूसरी चीजों को खंगाल कर जांच कर रही है। मामले में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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