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Bareilly News: नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज ही...
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बरेली। नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा। मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे... लता मंगेशकर की आवाज में वर्ष 1977 की फिल्म किनारा का यह गाना रेडियो के इतिहास पर सटीक बैठता है। रेडियो की यात्रा एक सदी से अधिक लंबी है।
अब इसके माध्यम बदल गए हैं लेकिन लोकप्रियता कम नहीं हुई है। तकनीक से सुर मिलाते हुए यह बदलाव के दौर से गुजर रहा है व लोगों की बीच अपनी पैठ बनाए हुए है। रेडिया का अविष्कार इतालवी वैज्ञानिक गुग्लिल्मो मार्कोनी ने 1890 के दशक में किया था। दशकों से लोगों तक मनोरंजन, समाचार और विज्ञापन पहुंचाने वाले माध्यम रेडियो का दिवस मनाने के लिए यूनेस्को ने 2012 में 13 फरवरी घोषित किया था।
दुनियाभर में रेडियो के श्रोता है। 21वीं सदी की शुरुआत में टीवी का चलन तेजी से बढ़ा तो आशंका जताई गई कि रेडियो खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रेडियो खत्म नहीं हुआ, हमारे आपके बीच कई रूपों में मौजूद है।
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अब मोबाइल एप के जरिए हर किसी की जेब में है। कार में तो यह खूब बजता है। बदले दौर में इतना जरूर हुआ है कि आकाशवाणी का सरकारी प्रोत्साहन कम हुआ तो निजी स्तर पर एफएम रेडियो खुल गए। बरेली का रेडियो स्टेशन 1993 में शुरू हुआ था। पहले यहां का प्रसारण साढ़े नौ घंटे तक का था, अब घट कर चार घंटे का रह गया है।
रेडियो श्रोता तिलक राज अरोड़ा बताते हैं कि विविध भारती देशभर में सुना जाता है। श्रोताओं की पसंद के तमाम कार्यक्रम आज भी आ रहे हैं। अब मोबाइल एप पर विविध भारती सुनते हैं।
नाज रेडियो क्लब के निसार अहमद अंसारी बताते हैं कि रेडियो एक ऐसा जरिया है जो मनोरंजन के साथ-साथ अच्छी जानकारियां मिलती हैं।
किसान भाई भी रेडियो का लाभ उठा रहे हैं। कुछ अलग-अलग शहरों में लोकल रेडियो स्टेशन भी चल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात भी रेडियो के जरिए ही करते हैं।
आकाशवाणी बरेली के उद्घोषक देवेंद्र रावत बताते हैं कि रेडियाे का क्रेज आज भी लोगों में बहुत है। इसका अंदाजा इस बात से लगता हैै कि तमाम चिट्ठियां मन पसंद कार्यक्रम और सुझाव की आती हैं। वहीं निजी रेडियो का बढ़ना भी इसका उदाहरण है। संवाद
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अब इसके माध्यम बदल गए हैं लेकिन लोकप्रियता कम नहीं हुई है। तकनीक से सुर मिलाते हुए यह बदलाव के दौर से गुजर रहा है व लोगों की बीच अपनी पैठ बनाए हुए है। रेडिया का अविष्कार इतालवी वैज्ञानिक गुग्लिल्मो मार्कोनी ने 1890 के दशक में किया था। दशकों से लोगों तक मनोरंजन, समाचार और विज्ञापन पहुंचाने वाले माध्यम रेडियो का दिवस मनाने के लिए यूनेस्को ने 2012 में 13 फरवरी घोषित किया था।
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दुनियाभर में रेडियो के श्रोता है। 21वीं सदी की शुरुआत में टीवी का चलन तेजी से बढ़ा तो आशंका जताई गई कि रेडियो खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रेडियो खत्म नहीं हुआ, हमारे आपके बीच कई रूपों में मौजूद है।
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अब मोबाइल एप के जरिए हर किसी की जेब में है। कार में तो यह खूब बजता है। बदले दौर में इतना जरूर हुआ है कि आकाशवाणी का सरकारी प्रोत्साहन कम हुआ तो निजी स्तर पर एफएम रेडियो खुल गए। बरेली का रेडियो स्टेशन 1993 में शुरू हुआ था। पहले यहां का प्रसारण साढ़े नौ घंटे तक का था, अब घट कर चार घंटे का रह गया है।
रेडियो श्रोता तिलक राज अरोड़ा बताते हैं कि विविध भारती देशभर में सुना जाता है। श्रोताओं की पसंद के तमाम कार्यक्रम आज भी आ रहे हैं। अब मोबाइल एप पर विविध भारती सुनते हैं।
नाज रेडियो क्लब के निसार अहमद अंसारी बताते हैं कि रेडियो एक ऐसा जरिया है जो मनोरंजन के साथ-साथ अच्छी जानकारियां मिलती हैं।
किसान भाई भी रेडियो का लाभ उठा रहे हैं। कुछ अलग-अलग शहरों में लोकल रेडियो स्टेशन भी चल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात भी रेडियो के जरिए ही करते हैं।
आकाशवाणी बरेली के उद्घोषक देवेंद्र रावत बताते हैं कि रेडियाे का क्रेज आज भी लोगों में बहुत है। इसका अंदाजा इस बात से लगता हैै कि तमाम चिट्ठियां मन पसंद कार्यक्रम और सुझाव की आती हैं। वहीं निजी रेडियो का बढ़ना भी इसका उदाहरण है। संवाद