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Diwali 2024: दिवाली पर जलाएं परंपरा के दीप... रोशन होंगे कुम्हारों के घर; जानिए मिट्टी के दीयों का महत्व
Fri, 25 Oct 2024 05:38 PM IST
मुकेश कुमार
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Published by: मुकेश कुमार
Updated Fri, 25 Oct 2024 05:38 PM IST
सार
Diwali 2024: प्रकाश पर्व दिवाली पर हर घर रोशन हो, सबकी दहलीज पर खुशियों की दस्तक हो, इसके लिए सामूहिक सहभागिता जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि हम परंपरागत मिट्टी के दीये खरीदें और जलाएं। इससे कुम्हारों के घर भी रोशन होंगे। वह भी हमारे साथ खुशी से त्योहार मना सकेंगे। पढ़िए दीये बनाने वाले कुम्हारों की कहानी...
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मिट्टी के दीये
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
परंपरा पर हावी होती आधुनिकता की वजह से कुम्हारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। बढ़ती लागत, मांग में कमी की वजह से कुम्हारों की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी है। युवा अपने पारंपरिक पेशे से मुंह मोड़ने लगे हैं। झालरों और डिजाइनर दीयों के बढ़ते चलन की वजह से मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग कम हो गई है। हालांकि, धार्मिक महत्व होने के कारण ये आज भी प्रासंगिक हैं। इतना जरूर है कि इन दीयों की रोशनी इन्हें बनाने वाले कुम्हारों के घर तक नहीं पहुंच पा रही।
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लागत बढ़ी, मुनाफा कम
बरेली में दीपावली के लिए दीये तैयार कर रहे कैंट निवासी रघुवीर प्रजापति बताते हैं कि यह उनका पुश्तैनी काम है। पिता हरद्वारी लाल और बाबा मोतीराम भी दीये बनाते थे। वह दीये बनाने के लिए मिट्टी बिथरी चैनपुर से मंगवाते हैं। दीयों को पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली लकड़ी, उपले भी महंगे हो गए हैं। रंगों का भाव भी आसमान छू रहा है। इससे दीयों की लागत बढ़ गई है, मुनाफा कम हो गया है।
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रघुवीर बताते हैं कि उन्होंने समय के साथ बदलाव किया है। ग्राहकों की मांग के अनुरूप अब वह भी डिजाइनर दीये बनाने लगे हैं। उनके मुताबिक, अब ग्राहक डिजाइनर दीयों की मांग करते हैं। हालांकि, इनकी बिक्री सीमित होती है। ज्यादा बिक्री परंपरागत दीयों की ही होती है।
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दीये बनाते रघुवीर प्रजापति
- फोटो : अमर उजाला
टूटे घर में कब कदम रखेंगी खुशियां
कैंट के कुम्हारन टोला निवासी अमित प्रजापति ने बताया कि उन्होंने पांच साल पहले दीये बनाने के काम में पिता जयराम प्रजापति का हाथ बंटाना शुरू किया था। अमित के परिवार में चार सदस्य हैं। परिवार इसी पुश्तैनी काम पर निर्भर है, लेकिन अब दीयों की मांग कम होने से घर की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं। जर्जर मकान की मरम्मत नहीं करा पा रहे।
कैंट के कुम्हारन टोला निवासी अमित प्रजापति ने बताया कि उन्होंने पांच साल पहले दीये बनाने के काम में पिता जयराम प्रजापति का हाथ बंटाना शुरू किया था। अमित के परिवार में चार सदस्य हैं। परिवार इसी पुश्तैनी काम पर निर्भर है, लेकिन अब दीयों की मांग कम होने से घर की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं। जर्जर मकान की मरम्मत नहीं करा पा रहे।
दीये बनाते अमित प्रजापति
- फोटो : अमर उजाला
अमित बताते हैं कि कुछ साल पहले तक वह 20 हजार दीये तैयार करते थे। अब 10-12 हजार ही बनाते हैं। अमित दीये बनाने के साथ आईटीआई भी कर रहे हैं। अमित जैसे कितने कुंभकारों के घरों में मिट्टी के चाक घूम तो रहे हैं, लेकिन उनकी उम्मीदें हमारी-आपकी खरीदारी पर टिकी हैं।
दीयों का धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित नत्थूलाल शर्मा बताते हैं कि मिट्टी का दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जिस घर में सुबह-शाम दीये जलाए जाते हैं, वहां भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। मिट्टी के दीपक घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित नत्थूलाल शर्मा बताते हैं कि मिट्टी का दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जिस घर में सुबह-शाम दीये जलाए जाते हैं, वहां भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। मिट्टी के दीपक घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।