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Bareilly News: बरेली के फलक से गायब हो रही पतंग, घट रही जरी की चमक

Sun, 05 May 2024 03:11 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Updated Sun, 05 May 2024 03:11 AM IST
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Kites are disappearing from the sky of Bareilly, the shine of brocade is decreasing
बरेली। लोकसभा चुनाव में इस बार भी विकास के मुद्दे काफी पीछे रह गए। चुनाव अब जातीय समीकरणों पर आकर टिक गया है। एक समय में बरेली का मांझा, पतंग, बांस-बेंत के फर्नीचर व जरी-जरदोजी उत्पादों की धूम विदेश तक हुआ करती थी। समय के साथ अब इनकी पहचान खत्म होती जा रही है। कारीगराें का कहना है कि सरकार की तरफ से उन्हें कोई खास सहूलियत नहीं मिली। तीसरे चरण का चुनाव अब अंतिम दौर में पहुंच चुका है। प्रत्याशियों ने जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन किसी भी पार्टी ने विकास को लेकर तस्वीर साफ नहीं की। देश-विदेश में जिले को पहचान दिलाने वाले उद्योगों की रफ्तार धीमी हो चुकी है।
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पतंग-मांझा उद्योग को नहीं लग सगे पंख
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बरेली का मांझा एक समय में देश-विदेश तक प्रसिद्ध था। कारोबारी शमी मिर्जा बताते हैं कि सरकारों की उपेक्षा के कारण लोगों को रुझान इस उद्योग की तरफ से कम होता जा रहा है। दस साल पहले बरेली में मांझे व पतंग का दस करोड़ रुपये का कारोबार होता था जो अब पांच करोड़ पर सिमट गया है। पहले एक-डेढ़ लाख लोग इस काम से जुड़े थे। अब इनकी संख्या 25-30 हजार रह गई है। शमी बताते हैं कि मांझे पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगने से भी कारोबार पर असर पड़ा है। अगर मांझा बनाने वालों को कुछ छूट मिले तो दिन बहुर सकते हैं। मांझा बेचने वाले इनाम अली बताते हैं कि बरेली से आज भी मांझा राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों में जाता है। बाकरगंज, स्वालेनगर, नवदिया, अशरफ खां छावनी आदि जगहों पर मांझा बनता है। बाकरगंज का मांझा आज भी सबसे महंगा है।
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लुप्त हो रहे बांस-बेंत के फर्नीचर
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बरेली के बांस-बेंत के फर्नीचर भी काफी प्रसिद्ध हैं। हालांकि, बांस बाहर से आता है पर यहां की कारीगरी ही इसे जिंदा रखे हुए है। बरेली के कारीगरों में बांस-बेंत से फर्नीचर बनाने का जो हुनर है, वो आस-पास कहीं नहीं। हां, अब यहां के कुछ कारीगर दूसरे जिलों में जाकर काम कर रहे हैं। कुमार टॉकीज के पास बांस के फर्नीचर बेचने वाले मुजक्किम बताते हैं कि सरकार की तरफ से कारीगरों तक मदद नहीं पहुंच पाती। यही कारण है कि अब कारीगरों के आगे अपने अस्तित्व को बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
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जरी-जरदोजी की भी कम हो रही धाक
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बरेली की जरी-जरदोजी का काम आज भी देशभर में प्रसिद्ध है। हाथ से की गई कारीगरी का आज भी कोई तोड़ नहीं। विदेश तक इसकी मांग है। कारीगर अय्याज बताते हैं कि 10-15 साल पहले चार-पांच लाख लोग इस काम से जुड़े थे। अब महज डेढ़-दो लाख लोग ही रह गए। काम में मेहनत के एवज में उचित पारिश्रमिक नहीं मिलने के कारण आज कोई ई-रिक्शा चला रहा है तो किसी ने परचून की दुकान खोल ली है। पूरे दिन काम करने पर कारीगर को बमुश्किल 200-400 रुपये मिलते है। पहले यह काम केवल मुस्लिम समाज के लोग ही किया करते थे। अब हिंदू लोग भी इस काम को करने लगे हैं। सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। इस वजह से इसकी चमक फीकी पड़ रही है।
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