किसान मर रहे हैं, नेता क्या कर रहे हैं!
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ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से फसलों के बर्बाद होने से अन्नदाता कहा जाने वाला किसान सदमे में दम तोड़ रहा है लेकिन इनके बूते अपनी सियासत चमकाने वाले राजनेता अभी इनके पास फटके तक नहीं हैं। हालांकि इस बहाने नेता वोट बैंक बनाने की कवायद जरूर कर रहे हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने जनप्रतिनिधियों, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को नुकसान का जायजा लेने में जुटाया है और 20 अप्रैल तक उसकी रिपोर्ट प्रदेश कार्यालय पर पहुंचनी है। दूसरी ओर राज्य में सत्तारूढ़ सपा ने इसे ड्रामा करार दिया है। अति पिछड़ों की राजनीति करने वाली बसपा भी बस दोनों सरकारों पर आरोपों की झड़ी लगा रही है तो कांग्रेस किसानों के लिए मुआवजे की मांग संबंधी ज्ञापन देने तक ही सीमित है। जमीनी तौर पर किसानों की मदद के लिए कोई आगे आया हो, ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है।
किसानी पृष्ठभूमि वाले आंवला विधायक और भाजपा के प्रदेश महामंत्री धर्मपाल सिंह का कहना है कि केंद्र ने किसानों के लिए राहत मद में अपनी ओर से देय नौ हजार रुपये प्रति हेक्टेयर राहत राशि को बढ़ाते हुए साढ़े 13 हजार कर दिया है लेकिन वह बंट ही नहीं रही है। उन्होंने आंवला के फुलासी गांव में गत एक अप्रैल को सदमे में मरे किसान सत्यपाल के आश्रितों को मुआवजा न मिलने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पार्टी वास्तविक तथ्य जुटाकर सीधे किसानों के ही खाते में मुआवजा दिलाने के लिए केंद्र से अनुरोध करेगी। दूसरी ओर सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव का कहना है कि सपा सरकार किसानों के प्रति संवेदनशील है। प्रशासन को मिल रही गलत सर्वे संबंधी शिकायतों के आधार पर संबंधित लेखपालों पर कार्रवाई जारी है। जरूरी हुआ तो इस सर्वे को सपा कार्यकर्ता दोबारा चेक करेंगे और दबाव बनाकर प्रशासन से हर किसान को मुआवजा बंटवाएंगे।
बसपा के बरेली जोन कोआर्डिनेटर ब्रह्मस्वरूप सागर ने कहा कि अब तक हुए सरकारी सर्र्वे में असली किसान बाहर है और इसीलिए वे खुदकुशी कर रहे हैं। उन्होंने अपने शीर्ष नेतृत्व को हालात से अवगत करा दिया है और वहां से निर्देश मिलते ही आगे की कार्यवाही होगी। कांग्रेस जिलाध्यक्ष रामदेव पांडेय का कहना है कि सदमे में मर रहे किसानों के आश्रितों को पर्याप्त मुआवजा दिलाने के लिए आंदोलन जारी है एवं लगातार राष्ट्रपति और राज्यपाल को ज्ञापन भेजे जा रहे हैं।