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UP: कैंसर-शुगर को हराएगी काशी की लाल भिंडी, प्राकृतिक तरीके से दो बीघे में पैदावार; किसानों को फायदे का सौदा
Wed, 23 Aug 2023 12:31 PM IST
शाहरुख खान
राहुल दुबे, अमर उजाला, बरेली
राहुल दुबे, अमर उजाला, बरेली
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 23 Aug 2023 12:31 PM IST
सार
बरेली के कृषि विज्ञान केंद्र में प्राकृतिक तरीके से काशी की लाल भिंडी की दो बीघे में पैदावार की गई है। जीवामृत से फसल तैयार की गई है। इसका ट्रायल सफल रहा है। वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने इस प्रजाति को विकसित किया। लाल भिंडी कैंसर-शुगर को हराएगी।
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कैंसर-शुगर को हराएगी काशी की लाल भिंडी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भिंडी तो आपने अब तक हरी ही देखी होगी मगर अब लाल भी बाजार में आ जाएगी। बरेली के कृषि विज्ञान केंद्र में ट्रायल के तौर पर दो बीघे में लाल भिंडी की पैदावार की गई है। ट्रायल सफल रहा और पहली तुड़ाई भी हो गई है। यह औषधीय गुणों से भरपूर है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि यह भिंडी कैंसर और शुगर जैसी बीमारियों की रोकथाम और उन्हें हराने में मददगार साबित होगी।
सब्जी की इस किस्म को विकसित तो वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने किया है। बरेली ने प्राकृतिक तरीके से इसकी पैदावार को आगे बढ़ाया है। इसे काशी लालिमा नाम दिया गया है। मृदा विशेषज्ञ वाणी यादव ने बताया कि इसकी पैदावार पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से की गई है।
इसमें जीवामृत खाद का प्रयोग किया गया है। यानि बीज डालने के बाद जब पौधा तैयार हुआ तो खाद के तौर पर गाय का गोबर, गोमूत्र, वेसन और पुराने पेड़ के पास से मिट्टी का जीवामृत तैयार कर छिड़काव किया गया है। करीब दो महीने में यह फसल तैयार हुई है। उन्होंने बताया कि यह फसल पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से की गई है तो इसका स्वाद भी बहुत अच्छा है।
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बीमारियों से लड़ने में है मददगार
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रबंधक अमित पिप्पल ने बताया कि काशी लालिमा में एंथोसाइनिन पाया जाता है, जबकि हरे रंग की भिंडी में क्लोरोफिल मौजूद होता है। एंथोसाइनिन लाल भिंडी का कारक होता है। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार हैं। लेक्टिन नाम का स्पेशल प्रोटीन भी पाया जाता है। इससे कैंसर के इलाज में मदद मिल सकती है।
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सब्जी की इस किस्म को विकसित तो वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने किया है। बरेली ने प्राकृतिक तरीके से इसकी पैदावार को आगे बढ़ाया है। इसे काशी लालिमा नाम दिया गया है। मृदा विशेषज्ञ वाणी यादव ने बताया कि इसकी पैदावार पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से की गई है।
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इसमें जीवामृत खाद का प्रयोग किया गया है। यानि बीज डालने के बाद जब पौधा तैयार हुआ तो खाद के तौर पर गाय का गोबर, गोमूत्र, वेसन और पुराने पेड़ के पास से मिट्टी का जीवामृत तैयार कर छिड़काव किया गया है। करीब दो महीने में यह फसल तैयार हुई है। उन्होंने बताया कि यह फसल पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से की गई है तो इसका स्वाद भी बहुत अच्छा है।
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बीमारियों से लड़ने में है मददगार
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रबंधक अमित पिप्पल ने बताया कि काशी लालिमा में एंथोसाइनिन पाया जाता है, जबकि हरे रंग की भिंडी में क्लोरोफिल मौजूद होता है। एंथोसाइनिन लाल भिंडी का कारक होता है। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार हैं। लेक्टिन नाम का स्पेशल प्रोटीन भी पाया जाता है। इससे कैंसर के इलाज में मदद मिल सकती है।
डायबिटीज में भी यह भिंडी ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करती है। काशी लालिमा भिंडी में आयरन, जिंक, कैल्शियम और प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। इसके अलावा काशी लालिमा में फोलिक एसिड पाया जाता है, जो गर्भ में पल रहे बच्चे के मानसिक विकास के लिए बेहद आवश्यक होता है। इस भिंडी का नियमित सेवन करने पर कैंसर, डायबिटीज, हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है।
किसानों के लिए फायदे का सौदा
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रबंधक ने बताया कि किसानों के लिए यह फायदे का सौदा है। हर तीसरे दिन इसकी तुड़ाई होती है। हरी भिंडी की तुड़ाई में अगर एक-दो दिन की देर हो जाए तो वह पक जाती है। मगर काशी लालिमा की तुड़ाई में यदि एक-दो दिन की देर होती है तो यह पकती नहीं है। बाजार में किसानों को इसका दाम भी आराम से 80 रुपये किलो तक मिल जाता है। एक हेक्टेयर में करीब 60 क्विंटल तक की पैदावार हो सकती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रबंधक ने बताया कि किसानों के लिए यह फायदे का सौदा है। हर तीसरे दिन इसकी तुड़ाई होती है। हरी भिंडी की तुड़ाई में अगर एक-दो दिन की देर हो जाए तो वह पक जाती है। मगर काशी लालिमा की तुड़ाई में यदि एक-दो दिन की देर होती है तो यह पकती नहीं है। बाजार में किसानों को इसका दाम भी आराम से 80 रुपये किलो तक मिल जाता है। एक हेक्टेयर में करीब 60 क्विंटल तक की पैदावार हो सकती है।