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तिथियों को लेकर न पड़े भ्रम में..मृत्यु तिथि पर करें श्राद्ध
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बरेली। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व ‘महालय’ यानी पितरों का महापर्व, पितृपक्ष शनिवार से शुरू हो चुका है, जो 28 सितंबर तक चलेगा। लेकिन हिंदू और अंग्रेजी तिथियों में अंतर कर पाने में असमर्थ लोग असमंजस में हैं। इसलिए पितृपक्ष शुरू होते ही तिथियों की जानकारी के लिए शुकवार को पंड़ितों के फोन घनघनाते रहे। लोगों ने अंग्रेजी और हिंदी तिथियों में से पितृ की मृत्युतिथि की जानकारी मांगी, उसके बाद पितृपक्ष में पितरों का श्राद्धकर्म किए जाने का संकल्प लेकर विधि पूछी।
ज्योतिषाचार्य पं. सोनू मिश्रा ने बताया कि पितृपक्ष का समय भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक रहता है। दरअसल, इस समय सूर्य कन्या राशि पर गतिशील होते हैं इसलिए इस पक्ष को कनागत कहा जाता है। बताया कि शुक्रवार को हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार तिथियों का ज्ञान न होने से लोगों ने जानकारी हासिल की। बताया कि लोगों को अब अंग्रेजी तारीख की जानकारी तो है लेकिन हिंदी तिथि का ज्ञान नहीं है। इसलिए वे असमंजस में हैं। कहा, धर्मशास्त्र की मान्यता के अनुसार मृत्यु तिथि पर ही श्राद्ध करना सर्वोत्तम माना जाता है। हिंदी पंचांग में पूर्णिमा, प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्टि, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या कुल 16 तिथियां होती हैं। एक मास में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष 2 पक्ष होते हैं। पूर्णिमा, अमावस्या मास में एक ही बार आती है और बाकी तिथियां दो बार आती हैं। उन्होंने लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्युतिथि की जानकारी के लिए ज्योतिषी या पंडित से सुझाव लेने की बात कही है। क्योंकि बिना जाने किसी भी तिथि पर पितृ का श्राद्ध कर्म करना फलरहित होता है। तर्पण पितरों को प्राप्त नहीं होता।
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ज्योतिषाचार्य पं. सोनू मिश्रा ने बताया कि पितृपक्ष का समय भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक रहता है। दरअसल, इस समय सूर्य कन्या राशि पर गतिशील होते हैं इसलिए इस पक्ष को कनागत कहा जाता है। बताया कि शुक्रवार को हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार तिथियों का ज्ञान न होने से लोगों ने जानकारी हासिल की। बताया कि लोगों को अब अंग्रेजी तारीख की जानकारी तो है लेकिन हिंदी तिथि का ज्ञान नहीं है। इसलिए वे असमंजस में हैं। कहा, धर्मशास्त्र की मान्यता के अनुसार मृत्यु तिथि पर ही श्राद्ध करना सर्वोत्तम माना जाता है। हिंदी पंचांग में पूर्णिमा, प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्टि, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या कुल 16 तिथियां होती हैं। एक मास में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष 2 पक्ष होते हैं। पूर्णिमा, अमावस्या मास में एक ही बार आती है और बाकी तिथियां दो बार आती हैं। उन्होंने लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्युतिथि की जानकारी के लिए ज्योतिषी या पंडित से सुझाव लेने की बात कही है। क्योंकि बिना जाने किसी भी तिथि पर पितृ का श्राद्ध कर्म करना फलरहित होता है। तर्पण पितरों को प्राप्त नहीं होता।
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