{"_id":"5a25a9cc4f1c1b3c3d8bb94b","slug":"kadaknath-giving-poultry-industry-to-sanjivani","type":"story","status":"publish","title_hn":"कड़कनाथ दे रहा पोल्ट्री उद्योग को संजीवनी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कड़कनाथ दे रहा पोल्ट्री उद्योग को संजीवनी
बरेली।
Updated Tue, 05 Dec 2017 01:32 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
भारतीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) में क्रॉस ब्रीड से तैयार किया गया कड़कनाथ पोल्ट्री उद्योग को संजीवनी दे रहा है। इस पक्षी की उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड, हरियाणा तक खूब मांग है। क्रॉस ब्रीडिंग के जरिये संस्थान के वैज्ञानिकों ने कम समय में इसका वजन और अंडों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सफलता हासिल की है। मेडीशनल वैल्यू के चलते इसके अंडे और मांस की मांग भी खूब रहती है।
ऐसे मिले बेहतर परिणाम
सीएआरआई में कुक्कुट आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार बताते हैं कि झाबुआ के इस पक्षी पर लगभग 40 वर्षों से काम चल रहा है। विदेशी नस्ल के पक्षी से क्रॉस ब्रीडिंग कर तैयार किए गए कड़कनाथ की उत्पादकता बढ़ी है। मूल ब्रीड का कड़कनाथ 18-20 सप्ताह की आयु में करीब एक किलो वजन का होता है लेकिन सीएआरआई में क्रॉस ब्रीडिंग कर तैयार किए गए कड़कनाथ ने 12-13 सप्ताह की आयु में ही इतना वजन हासिल कर लिया। मूल नस्ल की मादा कड़कनाथ साल भर में जहां 70-90 तक अंडे देती थी, वहीं क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार मादा 160-170 तक अंडे देने में सक्षम है। सीएआरआई में तैयार प्रजाति कैरी श्यामा को कड़कनाथ से क्रॉस कराने पर साल 210 अंडे तक मिल जाते हैं। इस तरह पोल्ट्री फार्म संचालकों के लिए कड़कनाथ भी कमाई का अच्छा जरिया साबित हो सकता है।
कड़कनाथ
मध्य प्रदेश के झाबुआ में मूलरूप से पाया जाने वाला यह पक्षी मुर्गा प्रजाति का ही है और देखने में भी लगभग उसके जैसा ही होता है। सामान्य मुर्गा जहां अलग-अलग रंग का होता है, वहीं कड़कनाथ काले रंग का होता है। इसके पंख से लेकर पैर और कलंगी तक काले रंग की होती है।
विज्ञापन
वर्जन
कड़कनाथ पर संस्थान में लंबे समय से काम चल रहा है। हमने इसकी उत्पादकता बढ़ाने में सफलता हासिल की है। क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार नस्ल कम समय में ज्यादा वजन हासिल कर रही है और ज्यादा अंडे देने में भी सक्षम है।
- डॉ. एबी मंडल, प्रभारी निदेशक, सीएआरआई
ऐसे मिले बेहतर परिणाम
सीएआरआई में कुक्कुट आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार बताते हैं कि झाबुआ के इस पक्षी पर लगभग 40 वर्षों से काम चल रहा है। विदेशी नस्ल के पक्षी से क्रॉस ब्रीडिंग कर तैयार किए गए कड़कनाथ की उत्पादकता बढ़ी है। मूल ब्रीड का कड़कनाथ 18-20 सप्ताह की आयु में करीब एक किलो वजन का होता है लेकिन सीएआरआई में क्रॉस ब्रीडिंग कर तैयार किए गए कड़कनाथ ने 12-13 सप्ताह की आयु में ही इतना वजन हासिल कर लिया। मूल नस्ल की मादा कड़कनाथ साल भर में जहां 70-90 तक अंडे देती थी, वहीं क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार मादा 160-170 तक अंडे देने में सक्षम है। सीएआरआई में तैयार प्रजाति कैरी श्यामा को कड़कनाथ से क्रॉस कराने पर साल 210 अंडे तक मिल जाते हैं। इस तरह पोल्ट्री फार्म संचालकों के लिए कड़कनाथ भी कमाई का अच्छा जरिया साबित हो सकता है।
विज्ञापन
कड़कनाथ
मध्य प्रदेश के झाबुआ में मूलरूप से पाया जाने वाला यह पक्षी मुर्गा प्रजाति का ही है और देखने में भी लगभग उसके जैसा ही होता है। सामान्य मुर्गा जहां अलग-अलग रंग का होता है, वहीं कड़कनाथ काले रंग का होता है। इसके पंख से लेकर पैर और कलंगी तक काले रंग की होती है।
विज्ञापन
वर्जन
कड़कनाथ पर संस्थान में लंबे समय से काम चल रहा है। हमने इसकी उत्पादकता बढ़ाने में सफलता हासिल की है। क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार नस्ल कम समय में ज्यादा वजन हासिल कर रही है और ज्यादा अंडे देने में भी सक्षम है।
- डॉ. एबी मंडल, प्रभारी निदेशक, सीएआरआई