साक्षात्कार: 'देश को समझिए और जमीनी पत्रकारिता कीजिए', वरिष्ठ पत्रकार निधि कुलपति ने दिया संदेश
रोटरी क्लब ऑफ बरेली का 73वां अधिष्ठापन समारोह बुधवार को संपन्न हुआ। समारोह में मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार निधि कुलपति ने सोशल मीडिया का समाज और मीडिया पर प्रभाव विषय पर विचार साझा किए। कार्यक्रम के बाद निधि कुलपति ने अमर उजाला से खास बातचीत की।
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तीन दशक में पत्रकारिता में क्या बदलाव आए? इन्हें समाज ने कैसे स्वीकारा? अब सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में नई पीढ़ी के पत्रकारों के समक्ष क्या चुनौतियां हैं और खुद को कैसे स्थापित करें? इसका सिर्फ एक ही विकल्प है... देश को समझिए और जमीनी पत्रकारिता कीजिए। यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार निधि कुलपति का।
वरिष्ठ पत्रकार निधि कुलपति बुधवार को बरेली पहुंचीं। उन्होंने बतौर मुख्य अतिथि रोटरी क्लब ऑफ बरेली के 73वें अधिष्ठापन समारोह में शिरकत की। इस दौरान अमर उजाला से उन्होंने पत्रकारिता पर खास बातचीत की। पत्रकारिता में अपने अनुभव साझा किए।
सवाल : पत्रकारिता से कब जुड़ीं और कैसे शुरुआत हुई?
जवाब : वर्ष 1991 से मैंने पत्रकारिता शुरू की। शुरुआत टीवी टुडे से हुई। तब वीएचएस टेप का जमाना था। विदेश संचार निगम लिमिटेड पहुंचकर टेप दिया जाता था। प्राइवेट न्यूज चैनल्स तब नहीं थे। दूरदर्शन का जमाना था। तब आधे-आधे घंटे के प्रोग्राम होते थे। बाद में एनडीटीवी से जुड़ी और सिलसिला चल पड़ा।
सवाल : सोशल मीडिया कहीं टेलीविजन को पीछे तो नहीं छोड़ रहा?
जवाब : जब टेलीविजन आया था, तब अखबारों के समक्ष चुनौती थी। सोशल मीडिया आया तो फेक न्यूज के मामले आने लगे। अखबार तेजी से बढ़े। टीवी पर भी लोगों का भरोसा बढ़ा। कोई किसी के लिए चुनौती नहीं। बड़ा प्लेटफार्म है सोशल मीडिया, पर विश्वसनीयता पर सवाल है।
सवाल : एआई के वक्त में मीडिया कैसे सुरक्षित रहेगा?
जवाब : पत्रकारिता सिर्फ खबरों का संकलन नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनाओं को पिरोना भी है। एक मशीन मानवीय संवेदनाओं को उकेरने में कभी सक्षम नहीं हो सकती। जब किसी घटना की लाइव रिपोर्टिंग होती है तो रिपोर्टर उन पहलुओं को छूता है जो समाज को झकझोरते हैं। एआई ऐसा नहीं कर सकता।