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लो हाथों में मेहंदी रचा ली...पर दिल में दर्द बहुत है
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विकास भवन में मेहंदी लगाकर मतदान के लिए जागरूक किया।
बरेली। मतदाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए अफसरों के आदेश पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने हाथों पर मेहंदी तो रचा ली लेकिन अपने दिल का दर्द नहीं छिपा पाईं। बात हुई तो हाल-ए-दिल भी बयां कर दिया। बोलीं, 2018 में उनका मानदेय आठ हजार हो चुका है लेकिन अब तक साढ़े पांच हजार का पुराना मानदेय ही दिया जा रहा है। वह भी तीन महीने से नहीं मिला है। कोई उनकी सुनता भी नहीं।
दरअसल सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्ट्रोरल पार्टिसिपेशन (स्वीप) यानी सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं भागीदारी के तहत बुधवार को लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को विकास भवन बुलाकर उनके हाथों पर मेहंदी लगवाई गई थी। सीडीओ के निर्देश पर आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने हाथों पर मेहंदी से मतदाता जागरूकता के संदेश और स्लोगन लिखे। महिला कल्याण विभाग की उपनिदेशक नीता अहिरवार ने मत की ताकत के बारे में भी बताया।
हाथों में मेहंदी लगवाते वक्त आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का दर्द भी छलक पड़ा। एक तरफ से उन्होंने तमाम समस्याएं गिनाईं। सबसे ज्यादा पीड़ा इस बात पर जताई कि सरकार ने एक अप्रैल 2018 में उनका मानदेय साढ़े पांच हजार से बढ़ाकर आठ हजार कर दिया लेकिन उन्हें अब भी साढ़े पांच हजार भी दिए जा रहे हैं। वह भी हर महीने समय से नहीं मिलते। कई बार छह-छह महीने उनका मानदेय नहीं आता। इस बार भी तीन महीने से मानदेय नहीं दिया गया है। सरकारी कामों के लिए कहीं आने-जाने की जरूरत पड़ती है तो उन्हें किराए के पैसे जुटाने के लिए उधार लेना पड़ता है।
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दरअसल सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्ट्रोरल पार्टिसिपेशन (स्वीप) यानी सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं भागीदारी के तहत बुधवार को लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को विकास भवन बुलाकर उनके हाथों पर मेहंदी लगवाई गई थी। सीडीओ के निर्देश पर आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने हाथों पर मेहंदी से मतदाता जागरूकता के संदेश और स्लोगन लिखे। महिला कल्याण विभाग की उपनिदेशक नीता अहिरवार ने मत की ताकत के बारे में भी बताया।
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हाथों में मेहंदी लगवाते वक्त आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का दर्द भी छलक पड़ा। एक तरफ से उन्होंने तमाम समस्याएं गिनाईं। सबसे ज्यादा पीड़ा इस बात पर जताई कि सरकार ने एक अप्रैल 2018 में उनका मानदेय साढ़े पांच हजार से बढ़ाकर आठ हजार कर दिया लेकिन उन्हें अब भी साढ़े पांच हजार भी दिए जा रहे हैं। वह भी हर महीने समय से नहीं मिलते। कई बार छह-छह महीने उनका मानदेय नहीं आता। इस बार भी तीन महीने से मानदेय नहीं दिया गया है। सरकारी कामों के लिए कहीं आने-जाने की जरूरत पड़ती है तो उन्हें किराए के पैसे जुटाने के लिए उधार लेना पड़ता है।
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