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हिंदी हैं हमः नवोदित साहित्यकार और कवि के लिए मंच बना सोशल मीडिया
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों के मुताबिक सोशल मीडिया ने हिंदी को बनाया विश्व व्यापक
बरेली। हिंदी अब एक क्षेत्र विशेष की भाषा ना होकर ग्लोबल हो रही है। विदेशी लेखक और कंपनियां अपनी रचनाओं और उत्पादों की बिक्री के लिए हिंदी का सहारा ले रहे हैं। जो हिंदी के लिए रोजगार सृजन की वजह बनी है। यह दावा हिंदी साहित्यकार, लेखक और कवि कर रहे हैं। उनके मुताबिक संचार क्रांति के युग में सोशल मीडिया नवोदित रचनाकारों का मंच है। जिसने हिंदी साहित्य के सूनेपन को फिर पूरा किया है। अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत वरिष्ठ हिंदी साहित्यकारों से बात की गई तो उन्होंने बेबाकी से अपनी राय दी।
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बरेली। हिंदी अब एक क्षेत्र विशेष की भाषा ना होकर ग्लोबल हो रही है। विदेशी लेखक और कंपनियां अपनी रचनाओं और उत्पादों की बिक्री के लिए हिंदी का सहारा ले रहे हैं। जो हिंदी के लिए रोजगार सृजन की वजह बनी है। यह दावा हिंदी साहित्यकार, लेखक और कवि कर रहे हैं। उनके मुताबिक संचार क्रांति के युग में सोशल मीडिया नवोदित रचनाकारों का मंच है। जिसने हिंदी साहित्य के सूनेपन को फिर पूरा किया है। अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत वरिष्ठ हिंदी साहित्यकारों से बात की गई तो उन्होंने बेबाकी से अपनी राय दी।
सोशल मीडिया से हिंदी लगे पंख, लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता के लिए पहल जरूरी
साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित सुरेश बाबू मिश्रा का कहना है कि हिंदी को ग्लोबल बनाने में इंटरनेट, सोशल मीडिया की अहम भूमिका है। इस मंच के जरिये नवोदित साहित्यकार अपनी लेखनी से आगे बढ़ रहे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार भी अब इसी मंच पर हैं। हिंदी को आगे बढ़ाने में हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका है। हिंदी पत्रकारिता ने रोजगार सृजित किए। मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में उत्पाद बेचने के लिए हिंदी की शरण में हैं। क्योंकि उनके प्रोडक्ट हिंदी भाषा में होंगे तभी लोग समझेंगे और खरीदेंगे। इसलिए विदेशी कंपनी उत्पाद विक्रय के लिए कर्मचारी, अफसरों को हिंदी सिखा रहे हैं। हालांकि, सामाजिक परिवेश में हिंदी की स्वीकार्यता कम है। क्योंकि इंटर के बाद आईटी, लॉ, प्रोफेशनल कोर्स, मेडिकल सब पाठ्य पुस्तक इंग्लिश में हैं। इसलिए अभिभावक बच्चों के भविष्य को देखते हुए हिंदी पढ़ाने में झिझकते हैं। हिंदी में पाठ्यक्रम की पुस्तक प्रकाशित हो, तभी देश में बहुतायत रोजगार की भाषा हिंदी बनेगी। हिंदी को जब तक रोजगार की भाषा नहीं बनाया जाएगा, तब तक इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलना मुश्किल है।
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वरिष्ठ साहित्कारों के संपर्क से निखर रही प्रतिभा
गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज तुलसी साहित्य पुरस्कार और महर्षि दधिचि सम्मान से नवाजे गए कवि आचार्य देवेंद्र देव के मुताबिक पहले कई साहित्यकार और कवि को रचना प्रकाशित करने के लिए भटकना पड़ता था। संचार क्रांति के युग में इंटरनेट की मदद से प्रमुख हिंदी साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ना आसान हुआ। विदेशों में रह रहे साहित्य के प्रेमियों को हिंदी रचना पढ़ने और खोजने की कश्मकश कम हुई। अब सोशल मीडिया के जरिए मंच की तलाश खत्म हुई। नवोदित लेखकों को इस मंच पर वरिष्ठ साहित्यकारों का भी मार्गदर्शन आसानी से मिल रहा है। पहले जिनसे मुलाकात के लिए सफर तय करना पड़ता था। नए कवि और साहित्यकार अपनी रचना सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं। जिन्हें उनकी मित्र मंडली प्रसार करती है। धीरे-धीरे उनकी लेखनी सुधरती जाती है और जो अड़िग रहते हैं वह आगे जरूर बढ़ते हैं। वर्तमान समय में कई लेखक और कवि सोशल मीडिया के जरिए ही मुख्य धारा में शामिल हुए हैं। बशर्ते उनके लेखन से देश की गरिमा और संस्कार पर विपरीत असर न पड़े। तभी वह आगे सफल होंगे।
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