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जरी कारोबार: बरेली में चार लाख लोगों के रोजगार का जरिया है जरी, यहां बने सूट-साड़ियों की डिमांड विदेश तक

Mon, 07 Aug 2023 10:31 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: मुकेश कुमार Updated Mon, 07 Aug 2023 10:31 AM IST
सार

बरेली में जरी के बने सूट, साड़ियों की मांग दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद और पंजाब में सर्वाधिक हैं। यहां सूट पर कढ़ाई का काम महिलाओं को लुभाता है। यहां बने विदेशों में ही निर्यात होते हैं।  

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four lakh people got employment to Zari Zardozi industry in Bareilly
जरी जरदोजी का काम करते कारीगर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काली पन्नी और गल चुकी पुरानी चादरों से तनी छोटी सी कोठरी देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगता कि यहां सुई-धागों से देश-विदेश तक चमक बिखेरने वाली जरी कारीगरी हो रही है। बरेली जिले में जरी कारोबार करीब चार लाख लोगों की गुजर-बसर का जरिया बना हुआ है।

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जरी कारोबारी शाकिर के मुताबिक, बरेली में जरी के बने सूट, साड़ियों की मांग दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद और पंजाब में सर्वाधिक हैं। यहां सूट पर कढ़ाई का काम महिलाओं को लुभाता है। ऐसे उत्पाद विदेश में खाड़ी देश के दुबई, तुर्किये, अरब के अलावा लंदन, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में निर्यात होते हैं। 
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करीब 300 करोड़ का सालाना कारोबार देश और विदेश तक फैला है। करीब पांच हजार ठेकेदारों के निर्देशन में यह कारोबार बरेली में हो रहा है। इसमें करीब चार लाख से ज्यादा आबादी कार्य कर रही है। बताया कि बरेली का पुराना शहर, बाकरगंज, बहेड़ी, फरीदपुर, नवाबगंज, फतेहगंज पश्चिमी में जरी कारोबार जोरों पर होता है।

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ब्रिटिश काल में प्रभावित रहा काम

जरदोजी फारसी शब्द है। जो ‘जरी’ और ‘दोजी’ से मिलकर बना है। ‘जरी’ मतलब सोना और ‘दोजी’ मतलब कढ़ाई यानी ‘सोने की कढ़ाई’ का काम। बरेली में जरी कारोबार मुगल काल से हो रहा है। ब्रिटिश शासन काल में औद्योगीकरण ने जरदोजी को ऐसी टक्कर दी कि यह कला औंधे मुंह आ गिरी। आजाद भारत में इसे एक बार फिर उठने का मौका मिला। जो अभी जारी है।

दो दशक में काफी प्रभावित हुआ कारोबार

कारोबारियों के मुताबिक पहले साड़ी पर जरी कारीगरी खूब होती थी। फतेहगंज पश्चिमी में सर्वाधिक जरी साड़ियां बनती थीं। कीमत 300 रुपये होती थी। अब साड़ियों की मांग कम हुई है। महिलाएं सूट या गाउन पहनती हैं। वैवाहिक आयोजन में लहंगा का चलन है। लिहाजा, कारोबार खासा प्रभावित हुआ। करीब 50 फीसदी तक प्रभावित होने की आशंका है।

पशमीना शॉल पर भी अब होती है कढ़ाई

शाकिर के मुताबिक बरेली में ही पशमीना शॉल पर जरी की कढ़ाई होती है। एक शॉल की कीमत 30 से 40 हजार रुपये होती है। इन पर कढ़ाई के चार प्रकार हैं। पहला दरबार। इस पर हाथी, घोड़े और राजा होते हैं। दूसरा मधुवन। इसमें तितली, हिरन, पेड़-पौधे होते हैं। तीसरा शिकार। इसमें हिरन पर घोड़े पर तीन चलाना। चौथा बरात। इसमें फेरे, हाथी, घोड़े, बाजा आदि की कढ़ाई करते हैं।

पहले सोने-चांदी के तारों से होती थी कारीगरी

जरी का काम पहले सोने, चांदी की तारों, छोटे मोती, नगीनों, रत्नों से होता था। राजा-महाराजाओं के कपड़े जरदोजी के होते थे। अब सिल्क, साटिन, वेलवेट फैब्रिक पर मेटल एंब्रॉइडरी होती है। इसके लिए जरी, गोल्डन थ्रेड, मोती, सुनहरे सितारे, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका आदि प्रयोग होता है। लहंगे, दुपट्टे, सूट, बोतल के कवर, बैग आदि पर जरदोजी का काम होता है।

यूं होता है जरी का काम

जिस कपड़े पर जरदोजी होनी है, उसे कढ़ाई के लिए लकड़ी के एक फ्रेम में फिट करते हैं। इसे अड्डा कहा जाता है। कढ़ाई हुक जैसी नोक वाले सुआ या अरी से होती है। एक-एक दाना, मोती, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका, बड़े ध्यान से लगाने पड़ते हैं। इतना बारीक काम है कि इस काम में लगे कारीगरों को समय से पहले आंखों पर चश्मा लग जाता है।

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