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Bareilly News: पहले गले में खिचखिच... फिर दिल को दर्द दे रहा बैक्टीरिया, आईवीआरआई के शोध में खुलासा

Fri, 28 Mar 2025 01:26 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: मुकेश कुमार Updated Fri, 28 Mar 2025 01:26 PM IST
सार

आईवीआरआई के शोध में पता चला है कि स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया के हमले से लोगों के गले में खराश की समस्या हो रही है। यह समस्या दो दिन से ज्यादा हो तो इसे नजरअंदाज न करें। तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। 

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First there tickle in the throat then bacteria causing pain in the heart IVRI research
IVRI Bareilly - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बदलते मौसम के साथ गले में दो दिन से ज्यादा खराश और सूजन होना कहीं स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया का हमला तो नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी स्थिति में अनदेखी भारी पड़ सकती है। इससे गठिया, हृदय रोग समेत अन्य बीमारियां होने की आशंका रहती है। यह दावा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) से महामारी विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. भोजराज सिंह के नेतृत्व में चार वर्ष तक चले शोध में किया गया है।

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डॉ. भोजराज ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान वर्ष 2021 में शोध कार्य शुरू हुआ था, तब गले में खराश के मामले ज्यादा थे। उन मरीज के सैंपल जांच के लिए पहुंचे, जिनमें कोरोना नहीं था। लेकिन उनके गले में खराश और सूजन के लक्षण थे। उसके बाद मनुष्यों के 507 सैंपल की जांच में पता चला कि स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया के हमले से लोगों के गले में खराश की समस्या हो रही है। बताया कि लंबे समय तक ध्यान न देने और लगातार खांसी आने से टांसिल में सूजन थी। लिहाजा, भोजन निगलने में दर्द होने लगा था। सांस लेने में परेशानी हो रही थी।
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38 एंटीबॉयोटिक और 15 हर्बल दवाओं का परीक्षण
बैक्टीरिया नष्ट करने के लिए टीम ने 38 एंटीबॉयोटिक और 15 हर्बल दवाओं का प्रभाव स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया पर देखा। बगैर मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए एलोपैथी में एस्पिरिन, डिस्पिरिन को गुनगुने पानी में डालकर गरारा करने पर सौ फीसदी, इमीपेनम 87 फीसदी असरदार रही। आयुर्वेदिक पद्धति में दालचीनी और आजवाइन का असर 75 फीसदी, तुलसी 50 फीसदी व पान के पत्ते में लौंग का सेवन 48 फीसदी प्रभावी रहा। हालांकि इन दवाओं का सेवन डॉक्टर के परामर्श पर ही  करना चाहिए।

बैक्टीरिया बनाने लगता है एंटीबॉडी
शोध में पता चला कि स्ट्रेप्टोकोकस का अगर शुरुआत में ही इलाज न हो तो वह शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करने लगता है। शरीर में मौजूद प्रोटीन को प्रभावित करते हुए एंटी माइक्रोबियल रेसिस्टेंस बनाने लगता है। इससे रूमेटिक बुखार, इम्पेटिगो, प्रसूति ज्वर, स्ट्रेप्टोकोकस शॉक सिंड्रोम, स्ट्रेप थ्रोट, टॉल्सिलाइटिस, जोड़ों का दर्द, ब्लड प्रेशर, हृदय आदि की बीमारियां होने लगती हैं। हार्ट अटैक की भी आशंका रहती है।

जहां इलाज वहीं सक्रियता ज्यादा
डॉ. भोजराज ने बताया कि स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया सबसे ज्यादा अस्पताल परिसर में होता है। क्योंकि वहां इलाज को पहुंचे मरीजों के खांसने, छींकने से हवा के कणों में या फिर गिरकर कुर्सी, मेज, दीवार पर चिपका रहता है। अगर बीमार व्यक्ति बगैर नाक, मुंह ढंके खांसे या छींके आसपास मौजूद स्वस्थ व्यक्ति की सांस के साथ बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर जाता है। वह लोगों को बीमार बना देता है। 

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