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Bareilly News: मुर्गियों का महंगा दाना फीका करेगा अंडा और चिकन का स्वाद
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बरेली। मुर्गियों के दाने की बढ़ती कीमत ने पोल्ट्री कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। मुर्गी पालन की लागत बढ़ने से मुनाफा बचाने की चुनौती है। कारोबारियों का कहना है कि आगे यही स्थिति रही तो उत्पादन में कमी आएगी। चिकन की कीमत 50 रुपये प्रति किलो तक बढ़ने की संभावना है। प्रति अंडा 10 रुपये तक का हो सकता है।
केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एमपी सागर के मुताबिक, मुर्गियों के दाने में मक्का और सोयाबीन कच्चे माल की तरह होते हैं। मक्का मुर्गियों को ऊर्जा देने वाला प्रमुख घटक है, जबकि सोयाबीन मील प्रोटीन का अहम स्रोत है। इसलिए दोनों के भाव में तेजी का असर सीधे मुर्गी, अंडे और चिकन की लागत पर पड़ता है। फीड लागत बढ़ने से पूरे पोल्ट्री उत्पादन चक्र की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
कारोबारी बोले- मक्के की बढ़ती मांग से दबाव
पोल्ट्री कारोबारी नदीम के मुताबिक मक्का की मांग पोल्ट्री समेत एथेनॉल उद्योग में भी बढ़ी है। सोयाबीन और सोया मील की उपलब्धता में कमी से कीमत बढ़ी है। कहा कि ब्रॉयलर में फीड लागत उत्पादन खर्च का बड़ा हिस्सा होती है। फिलहाल बाजार में मुर्गे, अंडे की कीमत नहीं बढ़ने से बचत कम हो रही है। छोटे फार्मरों के पास बड़े पैमाने पर दाना खरीदने की क्षमता नहीं होने से ज्यादा दबाव होता है। बताया कि पिछले माह तक 50 किलो दाने का कट्टा दो हजार रुपये था, जो अब 2,350 रुपये में मिल रहा है। गुणवत्ता बढ़ने पर उत्पादों की कीमत अलग-अलग है।
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जरूरी पोषक तत्व कम न करने का सुझाव
वैज्ञानिक डॉ. जयदीप रोकड़े के मुताबिक पोल्ट्री उत्पादन में फीड की हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई तक होती है। फीड महंगा होने की स्थिति में किसान को सस्ता दाना लेने या उसमें पोषक तत्व कम करने से बचने को कहा है। फीड में ऊर्जा, प्रोटीन, अमीनो एसिड, मिनरल, विटामिन का संतुलन पक्षी की वृद्धि, अंडा उत्पादन के लिए जरूरी है। गुणवत्ता में कमी से बचत के बजाय नुकसान हो सकता है।
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केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एमपी सागर के मुताबिक, मुर्गियों के दाने में मक्का और सोयाबीन कच्चे माल की तरह होते हैं। मक्का मुर्गियों को ऊर्जा देने वाला प्रमुख घटक है, जबकि सोयाबीन मील प्रोटीन का अहम स्रोत है। इसलिए दोनों के भाव में तेजी का असर सीधे मुर्गी, अंडे और चिकन की लागत पर पड़ता है। फीड लागत बढ़ने से पूरे पोल्ट्री उत्पादन चक्र की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
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कारोबारी बोले- मक्के की बढ़ती मांग से दबाव
पोल्ट्री कारोबारी नदीम के मुताबिक मक्का की मांग पोल्ट्री समेत एथेनॉल उद्योग में भी बढ़ी है। सोयाबीन और सोया मील की उपलब्धता में कमी से कीमत बढ़ी है। कहा कि ब्रॉयलर में फीड लागत उत्पादन खर्च का बड़ा हिस्सा होती है। फिलहाल बाजार में मुर्गे, अंडे की कीमत नहीं बढ़ने से बचत कम हो रही है। छोटे फार्मरों के पास बड़े पैमाने पर दाना खरीदने की क्षमता नहीं होने से ज्यादा दबाव होता है। बताया कि पिछले माह तक 50 किलो दाने का कट्टा दो हजार रुपये था, जो अब 2,350 रुपये में मिल रहा है। गुणवत्ता बढ़ने पर उत्पादों की कीमत अलग-अलग है।
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जरूरी पोषक तत्व कम न करने का सुझाव
वैज्ञानिक डॉ. जयदीप रोकड़े के मुताबिक पोल्ट्री उत्पादन में फीड की हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई तक होती है। फीड महंगा होने की स्थिति में किसान को सस्ता दाना लेने या उसमें पोषक तत्व कम करने से बचने को कहा है। फीड में ऊर्जा, प्रोटीन, अमीनो एसिड, मिनरल, विटामिन का संतुलन पक्षी की वृद्धि, अंडा उत्पादन के लिए जरूरी है। गुणवत्ता में कमी से बचत के बजाय नुकसान हो सकता है।