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दिवाली पर पटाखों का शोर और न बढ़ाएं
बरेली
Updated Wed, 11 Oct 2017 01:17 AM IST
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दिवाली का आतिशबाजी का गहरा नाता है। लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन में पटाखे फोड़े जाने की परंपरा है। पटाखों की धमक हमारे चेहरे पर मुस्कान जरूर लाती है, लेकिन यही पटाखे हवा में जहर घोलकर न सिर्फ हमें नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि कई बार जरा सी चूक होने पर मौत का सामान तक बन जाते हैं। पटाखों के प्रदूषण से होने वाले नुकसान का फौरन पता नहीं लगता, इसलिए हम बेपरवाह बने रहते हैं और साल दर साल रोशनी के इस त्योहार पर प्रदूषण बढ़ाकर खुद अपने ही जीवन को कष्टदायी बनाते जा रहे हैं। पर्यावरण विज्ञानियों का आकलन बताता है कि पटाखों से होने वाले वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण मानव जीवन पर काफी बुरा असर डाल रहा है। इसलिए पटाखे चलाएं, लेकिन अपने वायु मंडल का भी ख्याल रखें ताकि हम सभी स्वस्थ जीवन गुजार सकें।
दिवाली के दिन पटाखों से निकलने वाली रासायनिक गैसों और शोर से हर साल प्रदूषण बढ़ रहा है। इस बार दिवाली के लिए 15 टन से ज्यादा पटाखों की खेप शहर में आ चुकी है। मतलब साफ है कि शहरवासियों का इरादा इस बार पिछले साल से भी ज्यादा धूमधड़ाके के साथ दिवाली मनाने का है। जाहिर है कि हम लोगों में से कोई भी पटाखों से होने वाली प्रदूूषण को लेकर फिक्रमंद नहीं है। आपको यह भी बता दें कि दिवाली पर होने वाला प्रदूषण सबसे ज्यादा बच्चों को प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण से कई बच्चे सांस के रोगी बन जाते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि इसकी वजह दिवाली पर होने वाला प्रदूषण है। दिवाली के दिन अगर आप प्रदूषण का ख्याल रखेंगे तो हमारे बच्चे तो बीमारियों से बचेंगे ही, हमारी मेहनत की कमाई भी धुआं होने से बच जाएगी।
एक ही रात में वायु प्रदूषण दोगुना, ध्वनि प्रदूषण डेढ़ गुना
वर्ष 2015 में दिवाली से पहले वातावरण में वायु प्रदूषण 132.37 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर क्यूब था जो दिवाली के दिन 250.98 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर यानी करीब दोगुना हो गया। इसी तरह दिवाली के पहले वायु में सल्फर डाई अक्साइड की मात्रा 30.08 माइक्रोग्राम पर घन मीटर थी जो दिवाली के दिन 38.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया। वायु प्रदूषण दिवाली से पहले की गई जांच में 49.52 डेसीबल था जो दिवाली के दिन बढ़कर 60.01 डेसीबल हो गया था।
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इसी तरह वर्ष 2016 में वातावरण में वायु प्रदूषण की दिवाली के पहले मापने पर 262.21 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया जो दिवाली की रात के बाद मापने पर 483.02 माइक्रोग्राम प्रति मीटर पाया गया। वायु में सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा दिवाली से पहले 18.02 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी जो दिवाली के दिन बढ़कर 33.08 माइक्रोग्राम पर घन मीटर हो गई। सुभाषनगर में दिवाली से पहले की जांच में ध्वनि प्रदूषण दिवाली से पहले 51.20 डेसीबल था जो दिवाली के दिन बढ़कर 65.01 डेसीबल हो गया। इसी तरह दिवाली के बाद शहामतगंज में ध्वनि प्रदूषण 54.90 डेसीबल से बढ़कर 62 डेसीबल पर पहुंच गया।
शहामतगंज और आईवीआरआई इलाका संवेदनशील
शहर में शहामतगंज और आईवीआरआई का इलाका इस बार दिवाली पर खासतौर पर संवेदनशील रहेगा। वजह यह है कि दोनों स्थानों पर इन दिनों ओवरब्रिज का निर्माण का चलने की वजह से सामान्य दिनों की अपेक्षा प्रदूषण काफी बढ़ा हुआ है। ऐसे में दिवाली के दिन आतिशबाजी से दोनों इलाकों में और प्रदूषण बढ़ेगा जो लोगों को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा?
बीमारियों को खुला न्योता
-दिवाली के दिन तेज धमाके के साथ फूटने वाले पटाखों के काले धुएं और शोर का मानव शरीर पर अत्यधिक विपरीत प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों का मानना है कि यह बीमारियों के लिए खुला न्योता है।
-पटाखों से वायु में सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन डाइआक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाने से शरीर को कई तरह के नुकसान होते हैं। पटाखों के धुएं से अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियां बढ़ जाती हैं। नाक में पानी आता है। सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। बच्चे और वृद्ध खासतौर पर इसका शिकार होते हैं।
-पटाखों की आवाज सुनने की क्षमता पर भी असर डाली है। धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होने लगती है।
-आम दिनों में शोर का मानक दिन में सामान्य तौर पर 50 से 55 डेसीबल तक रहता है। रात में शोर का स्तर 40 से 45 डेसीबल तक रह जाता है। दिवाली की रात शोर का स्तर 70 डेसीबल तक पहुंच जाता है।
-पटाखों से हादसे भी होते हैं। घर या प्रतिष्ठानों में आग लगने से लाखों रुपये का नुकसान होने की घटनाएं आम हैं। पिछले साल ही दिवाली की रात कई शोरूम पटाखों की चिंगारी से जलकर राख हो गए थे। एक गुरुद्वारे में भी पटाखे से लगी आग से काफी नुकसान हुआ था।
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दिवाली के दिन पटाखों से निकलने वाली रासायनिक गैसों और शोर से हर साल प्रदूषण बढ़ रहा है। इस बार दिवाली के लिए 15 टन से ज्यादा पटाखों की खेप शहर में आ चुकी है। मतलब साफ है कि शहरवासियों का इरादा इस बार पिछले साल से भी ज्यादा धूमधड़ाके के साथ दिवाली मनाने का है। जाहिर है कि हम लोगों में से कोई भी पटाखों से होने वाली प्रदूूषण को लेकर फिक्रमंद नहीं है। आपको यह भी बता दें कि दिवाली पर होने वाला प्रदूषण सबसे ज्यादा बच्चों को प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण से कई बच्चे सांस के रोगी बन जाते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि इसकी वजह दिवाली पर होने वाला प्रदूषण है। दिवाली के दिन अगर आप प्रदूषण का ख्याल रखेंगे तो हमारे बच्चे तो बीमारियों से बचेंगे ही, हमारी मेहनत की कमाई भी धुआं होने से बच जाएगी।
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एक ही रात में वायु प्रदूषण दोगुना, ध्वनि प्रदूषण डेढ़ गुना
वर्ष 2015 में दिवाली से पहले वातावरण में वायु प्रदूषण 132.37 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर क्यूब था जो दिवाली के दिन 250.98 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर यानी करीब दोगुना हो गया। इसी तरह दिवाली के पहले वायु में सल्फर डाई अक्साइड की मात्रा 30.08 माइक्रोग्राम पर घन मीटर थी जो दिवाली के दिन 38.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया। वायु प्रदूषण दिवाली से पहले की गई जांच में 49.52 डेसीबल था जो दिवाली के दिन बढ़कर 60.01 डेसीबल हो गया था।
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इसी तरह वर्ष 2016 में वातावरण में वायु प्रदूषण की दिवाली के पहले मापने पर 262.21 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया जो दिवाली की रात के बाद मापने पर 483.02 माइक्रोग्राम प्रति मीटर पाया गया। वायु में सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा दिवाली से पहले 18.02 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी जो दिवाली के दिन बढ़कर 33.08 माइक्रोग्राम पर घन मीटर हो गई। सुभाषनगर में दिवाली से पहले की जांच में ध्वनि प्रदूषण दिवाली से पहले 51.20 डेसीबल था जो दिवाली के दिन बढ़कर 65.01 डेसीबल हो गया। इसी तरह दिवाली के बाद शहामतगंज में ध्वनि प्रदूषण 54.90 डेसीबल से बढ़कर 62 डेसीबल पर पहुंच गया।
शहामतगंज और आईवीआरआई इलाका संवेदनशील
शहर में शहामतगंज और आईवीआरआई का इलाका इस बार दिवाली पर खासतौर पर संवेदनशील रहेगा। वजह यह है कि दोनों स्थानों पर इन दिनों ओवरब्रिज का निर्माण का चलने की वजह से सामान्य दिनों की अपेक्षा प्रदूषण काफी बढ़ा हुआ है। ऐसे में दिवाली के दिन आतिशबाजी से दोनों इलाकों में और प्रदूषण बढ़ेगा जो लोगों को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा?
बीमारियों को खुला न्योता
-दिवाली के दिन तेज धमाके के साथ फूटने वाले पटाखों के काले धुएं और शोर का मानव शरीर पर अत्यधिक विपरीत प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों का मानना है कि यह बीमारियों के लिए खुला न्योता है।
-पटाखों से वायु में सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन डाइआक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाने से शरीर को कई तरह के नुकसान होते हैं। पटाखों के धुएं से अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियां बढ़ जाती हैं। नाक में पानी आता है। सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। बच्चे और वृद्ध खासतौर पर इसका शिकार होते हैं।
-पटाखों की आवाज सुनने की क्षमता पर भी असर डाली है। धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होने लगती है।
-आम दिनों में शोर का मानक दिन में सामान्य तौर पर 50 से 55 डेसीबल तक रहता है। रात में शोर का स्तर 40 से 45 डेसीबल तक रह जाता है। दिवाली की रात शोर का स्तर 70 डेसीबल तक पहुंच जाता है।
-पटाखों से हादसे भी होते हैं। घर या प्रतिष्ठानों में आग लगने से लाखों रुपये का नुकसान होने की घटनाएं आम हैं। पिछले साल ही दिवाली की रात कई शोरूम पटाखों की चिंगारी से जलकर राख हो गए थे। एक गुरुद्वारे में भी पटाखे से लगी आग से काफी नुकसान हुआ था।