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जीते जी हमें ‘मारकर’ कहां तुम चले गए..

Mon, 13 Nov 2017 01:21 AM IST
बरेली।
बरेली। Updated Mon, 13 Nov 2017 01:21 AM IST
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Where did you go? Where did you go?
ह‌िष्‍ाषिऱ्र्षित के प‌िररिवार के लाोग
हाल ही में हुईं चार युवाओं की हत्याओं ने पूरे शहर के अभिभावकों को हिलाकर रख दिया है। वैसे तो हर्षित, विक्की, विकास और शानू की हत्याओं का सीधा असर उनके परिवारों पर पड़ा हैै, मगर हर मां-बाप कहीं न कहीं अपने लाडलों से इसे जोड़कर चिंतित हैं। इन चारों युवाओं के मां-बाप, भाई-बहन तो सब जीते जी बेजान-बेेसुध हो चुके हैं। ये चारों युवा तो चले गए, मगर अपने घरवालों को जीवित ही ‘मार’ गए। इन हालात मेें स्वाभाविक है कि हत्याओं की वजहों पर मंथन-चिंतन भी हर मां-बाप करेंगे ही। सभी परिवारों को अपनी यह चूक विचलित कर रही है कि उन्होंने अच्छे संस्कारों से सींचकर बड़े किए अपने लाडले के संग-साथ को बाद में जांचने-परखने की चूक कैसे कर दी। कहां उनके समझने-भांपने में कमी रह गई। खुशियां-दुख, हंसना-रोना तो जीवन का चक्र है, मगर अमर उजाला टीम का प्रयास है कि दुखी परिवारों केे इस चिंतन-मंथन से हर मां-बाप सीखें और अपने लाडलों को सुरक्षित करें, क्योंकि अभी बाजी आपके हाथ में है।   
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हर्षित हत्याकांड: अधेड़ महिला के चक्कर में कैसे फंसा.. पता नहीं 
कंप्यूटर शोरूम संचालक हर्षित की हत्या के बाद परिवार को पता चला कि वह एक अधेड़ महिला के संपर्क में था। पुलिस को अंदेशा है कि महिला हर्षित को ब्लैक मेल कर रही थी। कुवैत रह कर आए हर्षित की विदेशी महिला मित्र के बारे में भी परिवार को फेसबुक से हर्षित की मौत के बाद ही पता चला। पिता अशोक गुप्ता ने कहा, बेटे ने कभी नहीं बताया, कई बातें तो उसके दोस्तों से पता चली हैं। महिला के चक्कर में कैसे फंस गया, यह भी नहीं पता चल सका। मां कुसुम बेटे को याद करते हुए विलाप करती है कि रंजिश किसी से नहीं, फिर भी उनके बेटे को मारकर किच्छा में शव फेंका गया। 
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विक्की रस्तोगी हत्याकांड: मौत के बाद मिले मेमोरी कार्ड में थीं प्रेमिका की ढेरों तस्वीरें 
सराफ विक्की की हत्या के बाद से बड़े भाई दीपक रस्तोगी और मां सुनीता दहशत में है। विक्की की हत्या के बाद ही परिवार को उसकी प्रेमिका के बारे में पता चला था, यहां तक कि दोस्तों ने ही तहरीर लिखते वक्त संकेत दिया कि प्रेमिका का कनेक्शन हत्या के पीछे हो सकता है। परिवार को घर पर एक मेमोरी कार्ड मिला, जिसमें प्रेमिका के साथ विक्की की एक हजार से ज्यादा तस्वीरें हैं। विक्की के रिश्ते से अंजान परिवार अब हैरत में हैै कि इतना सब कुछ होता रहा और उन्हें पता तक नहीं चला। दहशत मेें आए परिवार ने ब्याज पर रुपये देने का काम समेट लिया है। भाई दीपक कहते हैं कि उन्हें अंदाजा था कि एक लड़की से उनका भाई बात करता है, लेकिन डिफेंस कॉलोनी में एक महिला से उसका अफेयर है, यह नहीं पता था। 
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विकास पटेल हत्याकांड: प्रेमिका को दिया था मोबाइल, दोस्तों से पता चला
कस्टम विभाग में काम करने वाले विकास के चाचा नरेश पाल नौकरी छोड़कर अपने भतीजे के कातिलों को पकड़वाने के लिए पुलिस की मदद करने में जुटे हैं। मां प्रवेश कुमारी ने रोते हुए बताया कि विकास किसी लड़की के चक्कर में है, इसका उन्हें कभी अंदेशा ही नहीं हुआ। बहन प्रियंका को आज भी अपनेे भाई विकास का इंतजार है। भाई विशाल हर रोज थाने पर जाकर बैठता है कि शायद उसके भाई के हत्यारे आज पकड़ लिए जाएं। शाम ढलते ही मोहल्ले के लोग विकास की याद में दरवाजे पर इकट्ठा होते हैं। परिवार को हत्या के बाद विकास के दोस्तों से ही उसकी महिला मित्र के बारे में पता चला।

शानू हत्याकांड: डेढ़ घंटे बाद मां और तीन महीने बाद चल बसे पिता 
आजमनगर में 10 जुलाई की रात दुकान बंद करते समय पॉलिथीन मैटेरियल दुकानदार शानू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। बेटे की मौत के सदमे में डेढ़ घंटे बाद ही शानू की मां नुज्त बेगम का इंतकाल हो गया। वालिद ताहिर बेग भी बेटे और फिर बीवी की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए, तीन महीने बाद ही वह भी चल बसे। परिवार में बचे तीन भाई और एक बहन तीन मौतों से सदमे में हैं। परिवार बिखर चुका है। परिवार को शानू की गलत सोहबत और जुआ खेलने की लत का उसकी हत्या के बाद ही पता चला। जुए में रुपये हारनेे के विवाद में ही शानू की हत्या की गई थी। 

दिखावा कल्चर भी है जिम्मेदार 
पश्चिमी संस्कृति को अपनाकर बच्चों को बड़ों के जैसे काम करते देखकर हम खुश होते हैं, लेकिन सावधानी पूर्वक उनकी निगरानी नहीं करते। स्कूल से लेकर मॉल में दोस्तों के साथ जाते बच्चे घर से मिलने वाले रुपयों से ज्यादा खर्च करते हैं। परिवार और पड़ोस के लोग नजर रखें तो निश्चित तौर पर कुछ जिंदगियां खतरे में पड़ने से बच सकती हैं। 

- डॉ. रविंद्र बंसल, समाजशास्त्री 

बच्चे अभिभावकों से ज्यादा दोस्तों से बात साझा करते हैं। कच्ची उम्र में ही बड़ाें की तरह व्यवहार करने लगते हैं। इसे हम सब बढ़ावा देते हैं। मानसिक स्तर से भले ही तैयार न हों, लेकिन हमारा व्यवहार और बातों की मर्यादा अब नहीं रही। इसका बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी फर्क पड़ता है। अब बच्चों के साथ उनके दोस्तों से भी बात करने की जरूरत है। उनके गैजेट पर भी नजर रखनी चाहिए। 
- डॉ. आशीष कुमार, मनोचिकित्सक 
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