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सुनकर पढ़ा, बोलकर लिखवाया, 8 सीजीपीए लाया
बरेली।
Updated Sun, 04 Jun 2017 02:03 AM IST
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सुनकर पढ़ा, बोलकर लिखवाया, 8 सीजीपीए लाया
- फोटो : सुनकर पढ़ा, बोलकर लिखवाया, 8 सीजीपीए लाया
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यह खबर है मस्कुलर डिस्ट्रोफी जैसी बीमारी से जूझ रहे बच्चे अस्तित्व की। अस्तित्व न तो हाथ से लिख सकता है और न ही दो घंटे से ज्यादा व्हील चेयर पर बैठ सकता है। असीम दर्द से जूझता यह बच्चा सप्ताह में सिर्फ दो दिन स्कूल जाता रहा वह भी दूसरों के सहारे। उसे उठाकर कुर्सी पर बैठाया जाता, जहां वह सिर्फ ब्लैक बोर्ड देखता लिखता कुछ नहीं। उसने राइटर की मदद से सीबीएसई बोर्ड की दसवीं की परीक्षा दी और ग्रेड प्वाइंट 8 के साथ पास हुआ। अस्तित्व के जज्बे के कायल न सिर्फ उसके माता पिता हैं बल्कि कालोनी के दूसरे स्टूडेंट भी हैं।
उसकी सफलता में मम्मी पापा का सहयोग जरूर रहा। स्कूल से आने के बाद वह घर में जो बोलता था तो उसकी मां उसके नोट्स बनाती थी। इतनी कठिनाइयों के बीच इस होनहार बच्चे ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर ये साबित कर दिया कि अगर लगन सच्ची हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।
यश कुमार और वैशाली के इस होनहार बेटे को छह साल की उम्र में ये बीमारी लग गई थी। इसमें शारीरिक मशल्स ने काम करना बंद कर दिया। माता पिता ने डॉक्टर को दिखाया। दिल्ली एम्स भी ले गए लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। फिर भी न तो माता पिता ने हार मानी और न ही बच्चे ने। मां बेसिक शिक्षा विभाग में टीचर हैं जबकि पिता एलआईसी एजेंट। पिता यश कुमार के अनुसार अस्तित्व पढ़ाई में शुरू से ही तेज था। जब बाकी बच्चे लिखकर पढ़ते थे उसका मन भी पढ़ने को मचल उठता था। कई बार पढ़ाई करने से मना किया लेकिन बच्चे की जिद और लगन के आगे उनको उसकी बात माननी पड़ी। बिशप कानराड स्कूल में उसका एडमीशन कराया। स्कूल से सप्ताह में दो बार लाने की परमीशन ली। वहां क्लास में जब बच्चे लिखते थे तो अस्तित्व केवल ब्लैक बोर्ड देखता था। फिर घर पहुंचकर मां से नोट्स बनवाता था। स्कूल के फादर और स्टाफ का सहयोग रहा। शरद कुमार ने उसको कोचिंग दी। यश की बहन सीए की तैयारी कर रही है। अपनी बहन की पढ़ाई देखकर अस्तित्व भी सीए करना चाहता है।
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उसकी सफलता में मम्मी पापा का सहयोग जरूर रहा। स्कूल से आने के बाद वह घर में जो बोलता था तो उसकी मां उसके नोट्स बनाती थी। इतनी कठिनाइयों के बीच इस होनहार बच्चे ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर ये साबित कर दिया कि अगर लगन सच्ची हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।
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यश कुमार और वैशाली के इस होनहार बेटे को छह साल की उम्र में ये बीमारी लग गई थी। इसमें शारीरिक मशल्स ने काम करना बंद कर दिया। माता पिता ने डॉक्टर को दिखाया। दिल्ली एम्स भी ले गए लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। फिर भी न तो माता पिता ने हार मानी और न ही बच्चे ने। मां बेसिक शिक्षा विभाग में टीचर हैं जबकि पिता एलआईसी एजेंट। पिता यश कुमार के अनुसार अस्तित्व पढ़ाई में शुरू से ही तेज था। जब बाकी बच्चे लिखकर पढ़ते थे उसका मन भी पढ़ने को मचल उठता था। कई बार पढ़ाई करने से मना किया लेकिन बच्चे की जिद और लगन के आगे उनको उसकी बात माननी पड़ी। बिशप कानराड स्कूल में उसका एडमीशन कराया। स्कूल से सप्ताह में दो बार लाने की परमीशन ली। वहां क्लास में जब बच्चे लिखते थे तो अस्तित्व केवल ब्लैक बोर्ड देखता था। फिर घर पहुंचकर मां से नोट्स बनवाता था। स्कूल के फादर और स्टाफ का सहयोग रहा। शरद कुमार ने उसको कोचिंग दी। यश की बहन सीए की तैयारी कर रही है। अपनी बहन की पढ़ाई देखकर अस्तित्व भी सीए करना चाहता है।
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