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गोकशी के दो आरोपियों को रासुका हाईकोर्ट ने हटाई
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पीलीभीत। उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने बरखेड़ा के दौलतपुर गांव निवासी शमशुल और मोहम्मद अली की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली है। दोनों पर लगाई गई रासुका समाप्त कर दी है। रिहाई के आदेश दिए हैं। बरखेड़ा पुलिस ने गोकशी के मामले में बीते वर्ष सितंबर मेें इन्हें जेल भेजा था।
बरखेडा़ थाना के दौलतपुर गांव निवासी शमशुल और मोहम्मद अली की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। कहा गया कि उन्हें बीते वर्ष सितंबर में बरखेड़ा पुलिस ने गोकशी के मामलों में झूठा जेल भेज दिया था। अक्तूबर महीने में जिला प्रशासन ने रासुका लगा दी। राज्य सरकार ने भी रासुका का अनुमोदन कर दिया। एडवाइजरी बोर्ड और केंद्र सरकार ने भी रासुका की कार्रवाई को वैध ठहराया। एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष शमशुल और मोहम्मद अली के साथ डीएम और एसपी भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे और अपना पक्ष रखा था। राज्य सरकार ने तीन-तीन माह करके जेल में निरुद्ध रखने की अवधि बढ़ाई। अंतिम बार इसी महीने में तीन महीने और जेल में कैद रखने का आदेश प्रदेश सरकार ने दिया। उच्च न्यायालय में शमशुल और मोहम्मद अली की ओर से उनके अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने कहा कि दोनों लोगों ने अपना प्रत्यावेदन जिला प्रशासन, प्रदेश, केंद्र और एडवाइजरी बोर्ड को भेजने के लिए सात नवंबर 2018 को दिया, लेकिन जिला प्रशासन ने जानबूझ कर विलंब किया और 19 नवंबर 2018 को प्रत्यावेदन शासन आदि को अग्रसारित किया। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने याचिका की सुनवाई के बाद जिला प्रशासन के रासुका लगाने के आदेश को गलत ठहराया। शमशुल और मोहम्मद अली को तत्काल रिहा करने के आदेश दिए गए हैं।
शकील के मामले की सुनवाई 30 को
दौलतपुर गांव के ही शकील को भी बरखेड़ा पुलिस ने बीते साल जेल भेजा था। जिला प्रशासन ने शमशुल और मोहम्मद अली के साथ शकील पर भी रासुका लगा दी। उच्च न्यायालय इलाहाबाद में शकील के अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने बताया कि शकील की ओर से भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर दी गई है। इसकी सुनवाई 30 जुलाई को होगी।
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बरखेडा़ थाना के दौलतपुर गांव निवासी शमशुल और मोहम्मद अली की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। कहा गया कि उन्हें बीते वर्ष सितंबर में बरखेड़ा पुलिस ने गोकशी के मामलों में झूठा जेल भेज दिया था। अक्तूबर महीने में जिला प्रशासन ने रासुका लगा दी। राज्य सरकार ने भी रासुका का अनुमोदन कर दिया। एडवाइजरी बोर्ड और केंद्र सरकार ने भी रासुका की कार्रवाई को वैध ठहराया। एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष शमशुल और मोहम्मद अली के साथ डीएम और एसपी भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे और अपना पक्ष रखा था। राज्य सरकार ने तीन-तीन माह करके जेल में निरुद्ध रखने की अवधि बढ़ाई। अंतिम बार इसी महीने में तीन महीने और जेल में कैद रखने का आदेश प्रदेश सरकार ने दिया। उच्च न्यायालय में शमशुल और मोहम्मद अली की ओर से उनके अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने कहा कि दोनों लोगों ने अपना प्रत्यावेदन जिला प्रशासन, प्रदेश, केंद्र और एडवाइजरी बोर्ड को भेजने के लिए सात नवंबर 2018 को दिया, लेकिन जिला प्रशासन ने जानबूझ कर विलंब किया और 19 नवंबर 2018 को प्रत्यावेदन शासन आदि को अग्रसारित किया। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने याचिका की सुनवाई के बाद जिला प्रशासन के रासुका लगाने के आदेश को गलत ठहराया। शमशुल और मोहम्मद अली को तत्काल रिहा करने के आदेश दिए गए हैं।
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शकील के मामले की सुनवाई 30 को
दौलतपुर गांव के ही शकील को भी बरखेड़ा पुलिस ने बीते साल जेल भेजा था। जिला प्रशासन ने शमशुल और मोहम्मद अली के साथ शकील पर भी रासुका लगा दी। उच्च न्यायालय इलाहाबाद में शकील के अधिवक्ता जितेंद्र पाल सिंह ने बताया कि शकील की ओर से भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर दी गई है। इसकी सुनवाई 30 जुलाई को होगी।
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