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भैंस भारत की ‘ब्लैक गोल्ड’, संपत्ति के रूप में देखते हैं कई राज्य : डॉ. अमरेश
Wed, 17 Dec 2025 01:22 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Wed, 17 Dec 2025 01:22 AM IST
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बरेली। भैंसें भारत की ‘ब्लैक गोल्ड’ हैं। इनके मांस के निर्यात से देश को लाखों डॉलर मिल रहे हैं। इसके बावजूद मांस उत्पादन के क्षेत्र में पर्याप्त योजनाबद्ध विकास नहीं हो पा रहा है। ये बातें भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय भैंस विकास सम्मेलन के समापन के अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. अमरेश कुमार ने कहीं।
उन्होंने कहा कि यह केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण, सुरक्षा और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं। हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में भैंस को संपत्ति के रूप में देखा जाता है। पहले भैंस ग्रामीण जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा थीं। विभिन्न आयु वर्गों में नर भैंसों के पोषण और प्रबंधन पर किए गए अध्ययन से यह सिद्ध हुआ है कि प्रारंभिक अवस्था में वैज्ञानिक पोषण देने से मांस की गुणवत्ता, प्रोटीन कंटेंट और ऑर्गेनोलैप्टिक गुणों में उल्लेखनीय सुधार होता है। फैट कंटेंट में कमी आती है।
उन्होंने कहा कि पशुओं से निकलने वाली मीथेन गैस को कम करने में पोषण विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि हम आहार प्रबंधन और पोषण रणनीतियों से मीथेन उत्सर्जन को नियंत्रित कर सकें तो जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में यह बड़ा योगदान होगा। देश में ब्रीडर सोसायटी का गठन अत्यंत आवश्यक है। यदि एक मुर्रा भैंस 25 लीटर दूध देती है और दूसरी केवल 5–10 लीटर, तो वैज्ञानिक रूप से उच्च उत्पादक नस्लों के आधार पर ही जेनेटिक सुधार किया जाना चाहिए। भैंसों के संरक्षण, प्रजनन सुधार, गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पादन तथा उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए विशेष नीतिगत पहल आवश्यक है।
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उन्होंने कहा कि यह केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण, सुरक्षा और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं। हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में भैंस को संपत्ति के रूप में देखा जाता है। पहले भैंस ग्रामीण जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा थीं। विभिन्न आयु वर्गों में नर भैंसों के पोषण और प्रबंधन पर किए गए अध्ययन से यह सिद्ध हुआ है कि प्रारंभिक अवस्था में वैज्ञानिक पोषण देने से मांस की गुणवत्ता, प्रोटीन कंटेंट और ऑर्गेनोलैप्टिक गुणों में उल्लेखनीय सुधार होता है। फैट कंटेंट में कमी आती है।
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उन्होंने कहा कि पशुओं से निकलने वाली मीथेन गैस को कम करने में पोषण विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि हम आहार प्रबंधन और पोषण रणनीतियों से मीथेन उत्सर्जन को नियंत्रित कर सकें तो जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में यह बड़ा योगदान होगा। देश में ब्रीडर सोसायटी का गठन अत्यंत आवश्यक है। यदि एक मुर्रा भैंस 25 लीटर दूध देती है और दूसरी केवल 5–10 लीटर, तो वैज्ञानिक रूप से उच्च उत्पादक नस्लों के आधार पर ही जेनेटिक सुधार किया जाना चाहिए। भैंसों के संरक्षण, प्रजनन सुधार, गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पादन तथा उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए विशेष नीतिगत पहल आवश्यक है।
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