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Bareilly News: क्रोमियम प्रदूषण से निपटने में सक्षम जीवाणु घटाएगा कैंसर का खतरा
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रुविवि के पादप विज्ञान विभाग में हुआ अध्ययन, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में हुआ है प्रकाशित
बरेली। बढ़ते उद्योगों के साथ औद्योगिक प्रदूषकों का खतरा भी बढ़ रहा है। चमड़ा उद्योग, इस्पात निर्माण, धातु चढ़ाने व रासायनिक कारखानों में इस्तेमाल किया जाने वाला हेक्सावैलेंट क्रोमियम मिट्टी में जहर घोल रहा हैं। इसे कैंसर का प्रमुख कारक भी माना जाता है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग के प्रो. पंकज अरोरा व उनकी टीम ने जीवाणु के जरिये इस समस्या का हल ढूंढने में सफलता प्राप्त की है। इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में भी जगह मिली है।
शोधकर्ताओं ने बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस नामक जीवाणु के केएनपी प्रकार पर अध्ययन किया। यह विषैले क्रोमियम के संपर्क में रहते हुए न केवल जीवित रहता है, बल्कि उसे कम हानिकारक रूप में परिवर्तित भी कर देता है। प्रो. पंकज ने बताया प्रकृति में विद्यमान सूक्ष्मजीवों की सहायता से भारी धातुओं के प्रदूषण जैसी जटिल समस्याओं का समाधान संभव है। बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस जैसे जीवाणु पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
शोधार्थियों ने अध्ययन में पाया कि बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस केएनपी जीवाणु ने 48 घंटे में 500 पीपीएम हेक्सावैलेंट क्रोमियम को कम विषैले रूप में परिवर्तित कर दिया। क्रोमियम के प्रभाव से जीवाणु की कोशिकीय संरचना में परिवर्तन देखे गए, जिससे उसके अनुकूलन तंत्र का पता चलता है। यह जीवाणु विषैले तत्वों से दूर हटने और पोषक तत्वों की ओर बढ़ने की क्षमता रखता है।
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जीवाणु की मदद करते हैं विशेष जीन
अब तक के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि इस जीवाणु में उपस्थित विशेष जीन उसे अपने परिवेश में उपस्थित रसायनों को पहचानने और उनके अनुसार प्रतिक्रिया देने में सहायता करते हैं। यही विशेषता इसे प्रदूषित क्षेत्रों में प्रभावी बनाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार के जीवाणुओं का उपयोग जैव शोधन तकनीक में किया जा सकता है। यह विधि किफायती, पर्यावरण के अनुकूल और रासायनिक उपचारों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। संवाद
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बरेली। बढ़ते उद्योगों के साथ औद्योगिक प्रदूषकों का खतरा भी बढ़ रहा है। चमड़ा उद्योग, इस्पात निर्माण, धातु चढ़ाने व रासायनिक कारखानों में इस्तेमाल किया जाने वाला हेक्सावैलेंट क्रोमियम मिट्टी में जहर घोल रहा हैं। इसे कैंसर का प्रमुख कारक भी माना जाता है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग के प्रो. पंकज अरोरा व उनकी टीम ने जीवाणु के जरिये इस समस्या का हल ढूंढने में सफलता प्राप्त की है। इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में भी जगह मिली है।
शोधकर्ताओं ने बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस नामक जीवाणु के केएनपी प्रकार पर अध्ययन किया। यह विषैले क्रोमियम के संपर्क में रहते हुए न केवल जीवित रहता है, बल्कि उसे कम हानिकारक रूप में परिवर्तित भी कर देता है। प्रो. पंकज ने बताया प्रकृति में विद्यमान सूक्ष्मजीवों की सहायता से भारी धातुओं के प्रदूषण जैसी जटिल समस्याओं का समाधान संभव है। बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस जैसे जीवाणु पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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शोधार्थियों ने अध्ययन में पाया कि बैसिलस लिचेनिफॉर्मिस केएनपी जीवाणु ने 48 घंटे में 500 पीपीएम हेक्सावैलेंट क्रोमियम को कम विषैले रूप में परिवर्तित कर दिया। क्रोमियम के प्रभाव से जीवाणु की कोशिकीय संरचना में परिवर्तन देखे गए, जिससे उसके अनुकूलन तंत्र का पता चलता है। यह जीवाणु विषैले तत्वों से दूर हटने और पोषक तत्वों की ओर बढ़ने की क्षमता रखता है।
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जीवाणु की मदद करते हैं विशेष जीन
अब तक के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि इस जीवाणु में उपस्थित विशेष जीन उसे अपने परिवेश में उपस्थित रसायनों को पहचानने और उनके अनुसार प्रतिक्रिया देने में सहायता करते हैं। यही विशेषता इसे प्रदूषित क्षेत्रों में प्रभावी बनाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार के जीवाणुओं का उपयोग जैव शोधन तकनीक में किया जा सकता है। यह विधि किफायती, पर्यावरण के अनुकूल और रासायनिक उपचारों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। संवाद