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पुराना शहर वालों ने केमिकल रंगों से बनाई दूरी, गुलाल से खेली होली
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बरेली। इस बार पुराना शहर में लोगों ने सांप्रदायिक सौहार्द के साथ सिर्फ गुलाल से ही होली खेली और एक दूसरे से गले मिलकर उन्हें बधाई दी। गुरुवार भोर में अचानक मौसम खराब होने लगा। सर्द और तेज हवाओं के साथ बारिश होने लगी, लेकिन लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। लोकगीतों के बीच होलिका दहन किया गया।
पंचांग के अनुसार गुरुवार सुबह सात बजे तक पूर्णिमा होने से होेलिका दहन मुहूर्त भी था, इसलिए पुराना शहर में ज्यादातर स्थानों पर भाईचारे के बीच दर्जनों स्थानों पर बारिश की फुहार के बीच होलिका दहन के कार्यक्रम हुए। इसके बाद जगतपुर समेत विभिन्न स्थानों पर सिर्फ गुलाल से ही होली खेली गई। हालांकि लोगों ने इसका फैसला काफी पहले ही ले लिया था। गुलाल से होली खेले जाने के लिए अन्य समुदाय को भी आमंत्रित किया गया तो उन्होंने भी पूरे मनोयोग से साथ देकर सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत किया।
जगतपुर निवासी तारा सम्राट, सुरेश कुमार, डॉ. जयप्रकाश, अमर सिंह आदि ने बताया कि जब उन्हें यह पता चला कि केमिकल रंग त्वचा खराब करने के साथ ही अन्य बीमारी दे सकते हैं तो उन्होंने आसपास के लोगोें से आग्रह किया कि इस बार होली पर केमिकल रंगों से नहीं बल्कि गुलाल से होली खेलें। उन्होंने बताया कि ज्यादातर लोगों ने इसका अनुसरण किया, इससे उनका अभियान सफल रहा।
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त्योहारों के बहाने सौहार्द
कुछ वर्षों तक दंगों के लिए बदनाम रहा पुराना शहर त्योहारों के बहाने धीरे-धीरे सांप्रदायिक सौहार्द की ओर लौट चुका है। कभी ईद तो कभी होली पर दोनों संप्रदाय एक दूसरे से गले मिलने के साथ ही त्योहार में साथ ही बनाते रहे हैं, लेकिन कुछ वर्ष पहले शरारती तत्वों ने इस सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन पुरानी परंपरा और सौहार्द भारी पड़ी, त्योहारों पर इसका प्रभाव भी दिखने लगा है। बालजती स्कूल परिसर में आयोजित होली मिलन में भी बड़ी संख्या में दूसरे समुदायों की भागेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। मेला संरक्षक राजू सक्सेना और अध्यक्ष छंगामल मौर्य ने बताया कि दूसरे संप्रदाय के सक्रिय योगदान से अलग जोश दिखता है।
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पंचांग के अनुसार गुरुवार सुबह सात बजे तक पूर्णिमा होने से होेलिका दहन मुहूर्त भी था, इसलिए पुराना शहर में ज्यादातर स्थानों पर भाईचारे के बीच दर्जनों स्थानों पर बारिश की फुहार के बीच होलिका दहन के कार्यक्रम हुए। इसके बाद जगतपुर समेत विभिन्न स्थानों पर सिर्फ गुलाल से ही होली खेली गई। हालांकि लोगों ने इसका फैसला काफी पहले ही ले लिया था। गुलाल से होली खेले जाने के लिए अन्य समुदाय को भी आमंत्रित किया गया तो उन्होंने भी पूरे मनोयोग से साथ देकर सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत किया।
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जगतपुर निवासी तारा सम्राट, सुरेश कुमार, डॉ. जयप्रकाश, अमर सिंह आदि ने बताया कि जब उन्हें यह पता चला कि केमिकल रंग त्वचा खराब करने के साथ ही अन्य बीमारी दे सकते हैं तो उन्होंने आसपास के लोगोें से आग्रह किया कि इस बार होली पर केमिकल रंगों से नहीं बल्कि गुलाल से होली खेलें। उन्होंने बताया कि ज्यादातर लोगों ने इसका अनुसरण किया, इससे उनका अभियान सफल रहा।
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त्योहारों के बहाने सौहार्द
कुछ वर्षों तक दंगों के लिए बदनाम रहा पुराना शहर त्योहारों के बहाने धीरे-धीरे सांप्रदायिक सौहार्द की ओर लौट चुका है। कभी ईद तो कभी होली पर दोनों संप्रदाय एक दूसरे से गले मिलने के साथ ही त्योहार में साथ ही बनाते रहे हैं, लेकिन कुछ वर्ष पहले शरारती तत्वों ने इस सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन पुरानी परंपरा और सौहार्द भारी पड़ी, त्योहारों पर इसका प्रभाव भी दिखने लगा है। बालजती स्कूल परिसर में आयोजित होली मिलन में भी बड़ी संख्या में दूसरे समुदायों की भागेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। मेला संरक्षक राजू सक्सेना और अध्यक्ष छंगामल मौर्य ने बताया कि दूसरे संप्रदाय के सक्रिय योगदान से अलग जोश दिखता है।