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पहले रोजे का एहसास- अल्लाह के करम से बहुत अच्छा गुजरा पहला रोजा
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बरेली। माहे रमजान का पहला रोजा बहुत अच्छा गुजरने का रोजेदारों ने एहसास कराया। उनका कहना है कि गर्मी है, पिछली बार भी थी, मगर जब खुदा के नाम पर एक बार रोजा रखने की नीयत कर लो फिर कुछ पता नहीं चलता, बल्कि और भी मजा आता है। मंगलवार को पहले रोजे को लेकर कुछ लोगों ने बातचीत में यह बात कही।
कोहाड़ापीर की शहनाज परवीन का कहना है कि रोजा का तो पता ही नहीं चला। अल्लाह के करम से बहुत आसानी से गुजर गया। सुबह सहरी के बाद फज्र की नमाज अदा की और फिर घर के कुछ काम निपटा कर सो लिए। दोपहर में उठकर जोहर की नमाज अदा की फिर किचन में इफ्तारी आदि के इंतजाम करने में लग गई। साथ ही रात के खाने की भी तैयारी शुरू कर दी। इसी बीच असर की नमाज अदा की और इफ्तार के इंतजाम करते करते वक्त पूरा हो गया।
बिहारीपुर की निशा ने पहला रोजा रखा। उनका कहना है कि पहले तो गर्मी को लेकर सोच रही थी रोजा रख पाऊंगी या नहीं। जब घर के लोग रात में उठे तो वह भी उठ गईं और सहरी खा ली। फिर हिम्मत करके रोजा रख लिया। मगर सबके साथ घर में रह कर पता नहीं चला। दिन में थोड़ी देर सो गए जब घर के लोग इफ्तार की तैयारी में लगे तो उनका हाथ बंटाती रहीं। फिर कुछ मालूम नहीं चला।
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अवकाश प्राप्त शिक्षक हाजी कंबर हुसैन ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि गर्मी का रोजा सख्त होता है। लेकिन जब इंसान इरादा कर लेता है तो फिर पता नहीं चलता। सहरी के बाद फज्र की नमाज अदा की और कुरान की तिलावत के बाद रोजमर्रा के काम में लग गया। थोड़े आराम के बाद बाजार से इफ्तार के लिए कुछ सामान लेने खुद ही चला गया। इस बीच असर की नमाज अदा कर ली और खुदा के करम से वक्त आसानी से गुजर गया।
अवकाश प्राप्त बैंक प्रबंधक सय्यद कायद अली का कहना है कि रोजा इबादत है, और इबादत अल्लाह के लिए होती है। जब कोई काम अल्लाह के नाम पर किया जाता है तो वह आसान हो जाता है। गर्मी बेशक है मगर जब रोजे की नीयत कर ली तो फिर पता नहीं चलता है और आसानी से पूरा हो जाता। फिर नमाज और तिलावत से भी ताकत मिलती है। फिर दिन में रोजमर्रा के काम में लग जाएं तो भूख प्यास का कोई एहसास नहीं होता।
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कोहाड़ापीर की शहनाज परवीन का कहना है कि रोजा का तो पता ही नहीं चला। अल्लाह के करम से बहुत आसानी से गुजर गया। सुबह सहरी के बाद फज्र की नमाज अदा की और फिर घर के कुछ काम निपटा कर सो लिए। दोपहर में उठकर जोहर की नमाज अदा की फिर किचन में इफ्तारी आदि के इंतजाम करने में लग गई। साथ ही रात के खाने की भी तैयारी शुरू कर दी। इसी बीच असर की नमाज अदा की और इफ्तार के इंतजाम करते करते वक्त पूरा हो गया।
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बिहारीपुर की निशा ने पहला रोजा रखा। उनका कहना है कि पहले तो गर्मी को लेकर सोच रही थी रोजा रख पाऊंगी या नहीं। जब घर के लोग रात में उठे तो वह भी उठ गईं और सहरी खा ली। फिर हिम्मत करके रोजा रख लिया। मगर सबके साथ घर में रह कर पता नहीं चला। दिन में थोड़ी देर सो गए जब घर के लोग इफ्तार की तैयारी में लगे तो उनका हाथ बंटाती रहीं। फिर कुछ मालूम नहीं चला।
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अवकाश प्राप्त शिक्षक हाजी कंबर हुसैन ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि गर्मी का रोजा सख्त होता है। लेकिन जब इंसान इरादा कर लेता है तो फिर पता नहीं चलता। सहरी के बाद फज्र की नमाज अदा की और कुरान की तिलावत के बाद रोजमर्रा के काम में लग गया। थोड़े आराम के बाद बाजार से इफ्तार के लिए कुछ सामान लेने खुद ही चला गया। इस बीच असर की नमाज अदा कर ली और खुदा के करम से वक्त आसानी से गुजर गया।
अवकाश प्राप्त बैंक प्रबंधक सय्यद कायद अली का कहना है कि रोजा इबादत है, और इबादत अल्लाह के लिए होती है। जब कोई काम अल्लाह के नाम पर किया जाता है तो वह आसान हो जाता है। गर्मी बेशक है मगर जब रोजे की नीयत कर ली तो फिर पता नहीं चलता है और आसानी से पूरा हो जाता। फिर नमाज और तिलावत से भी ताकत मिलती है। फिर दिन में रोजमर्रा के काम में लग जाएं तो भूख प्यास का कोई एहसास नहीं होता।