{"_id":"5c0c26fdbdec22418e1ae19a","slug":"41544300285-bareilly-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"शान-ओ-शौकत से शादी करो और औने-पौने खर्च दिखाकर बजाओ सरकार का ‘बैंड’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शान-ओ-शौकत से शादी करो और औने-पौने खर्च दिखाकर बजाओ सरकार का ‘बैंड’
Updated Sun, 09 Dec 2018 01:48 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरेली। जिले भर में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े कार्यक्रम और शादियां विभिन्न बारात घरों, बैंक्वेट हाल, खुले मैदानों और होटलों में होती हैं, लेकिन टैक्स के नाम पर एक चौथाई भी राजस्व जमा नहीं हो पाता है। एक सर्वे के मुताबिक हर वर्ष करीब 30 करोड़ रुपये से अधिक सीजीएसटी (केंद्रीय वस्तु और सेवाकर) की चोरी होती है। सिस्टम के पास ऐसा कोई पैमाना भी नहीं है जिससे यह पता लगाया जा सके कि किस बारातघर या स्थान पर कितना कारोबार हुआ। हालांकि, सीजीएसटी अफसर तमाम बारातघरों और बैंक्वेट हाल संचालकों को नोटिस भेजकर कारोबारी ब्योरा तलब कर टैक्स जमा करने को कह चुके हैं, फिर भी टैक्स चोरी का खेल बदस्तूर जारी है।
पिछले साल एक जुलाई से देश भर में एक टैक्स व्यवस्था लागू हुई। इसके तहत शादी, पार्टी अथवा अन्य आयोजनों पर 18 फीसदी जीएसटी स्लैब लागू हुआ। इससे पहले सेवाकर वसूला जाता था। एक देश एक टैक्स व्यवस्था में कारोबारी सीमा भी 20 लाख रुपया प्रति वर्ष कर दी गई है। टैक्स चोरों ने इसका भी काट निकाल लिया और करोड़ों का कारोबार करने वाले बारातघर संचालकों ने अपने खातों में एक चौथाई भी इनकम नहीं दिखाई। जिससे वे जीएसटी व्यवस्था से बाहर हो गए। यह खेल भी बहुत ही सुनियोजित तरीके से चल रहा है और सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का टैक्स चोरी कर चूना लगाया जा रहा है।
यह है खेल
ज्यादातर बारातघर संचालक आयोजनकर्ता को पक्की रसीद नहीं देते हैं। सब कुछ कच्चे पर्चों पर होता है। आयोजनकर्ता भी शायद ही कभी रसीद मांगता हो। गिने चुने लोग जो मांगते हैं वह भी इनकम टैक्स विभाग आदि की नजरों से बचने के लिए गुणा-भाग कर रसीद लेते हैं। बारातघर मालिक भी अपने खातों में औनी-पौनी आय दिखाते हैं, इसमें ज्यादातर विवरण सिर्फ भवन किराए से संबंधित होता है। कैटरिंग, सजावट और अन्य मदों पर होने वाला भारी भरकम खर्चा अपने खातों में नहीं दिखाते हैं। जांच में संचालक यह कहकर बच जाते हैं कि कैटरिंग हमारी नहीं थी, न ही सजावट कराई, हमने परिसर किराए पर दिया, बाकी सब व्यवस्था आयोजनकर्ता ने की थी। छानबीन में जब भी यह पूछा जाता है कि किस पार्टी ने कार्यक्रम कराया तो उसका भी नाम पता ज्यादातर मामलों में नहीं मिलता है। ऐसे ही जीएसटी को हजम करने का खेल चल रहा है।
विज्ञापन
कम से कम दो लाख का कार्यक्रम
सर्वे के मुताबिक जिले भर में पांच सौ से अधिक बारातघर हैं। किसी भी शादी या पार्टी में दो लाख रुपये से कम का खर्च तो होता ही नहीं है। अधिक की कोई सीमा नहीं है। खुले मैदानों में होने वाले आयोजनों में यह खर्चा एक करोड़ भी पार कर जाता है। नामी गिरामी क्लबों के मैदानों में यह नजारा हर सीजन देखा जा सकता है, लेकिन संबंधित विभाग इसे लिखा-पढ़ी में पकड़ नहीं पाते।
बीडीए अफसर अपने ‘घर’ में तो सारे नियम जेब में
बीडीए अधिकारी अपना गुडवर्क दिखाने के बहाने बारातघरों को सिर्फ ‘खास मकसद’ नोटिस जारी करते हैं। इसके बाद शुरू होता है वसूली का खेल। जितने ज्यादा नोटिस, उतनी ज्यादा वसूली। फिर बारातघर संचालक भी समझते हैं कि जब बीडीए हमारी जेब में है तो कोई क्या कर सकता है। जिले में बमुश्किल 20 प्रतिशत बारातघर जीएसटी व्यवस्था में पंजीकृत हैं जबकि बीडीए के मानकों के अनुरूप गिने चुने बारातघर होंगे।
सड़क अपनी सरकार की तो पार्किंग की क्या जरूरत
ज्यादातर बारातघर और होटलों में पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। बीडीए से स्वीकृत होटलों ने पार्किंग की जगह हाल बना लिए हैं। करोड़ों रुपये हर साल कमाई होती है। सिविल लाइंस स्थित एक होटल संचालक पार्किंग शुल्क भी वसूल रहा है। शहर हो या हाईवे या फिर गलियां हर जगह आपको बारातघरों के बाहर जाम देखने को मिल जाएगा। इस मुद्दे पर प्रशासन और पुलिस भी खामोश रहती है। परेशानी सिर्फ जनता को होती है। अगर कोई इमरजेंसी में इन गलियों से गुजरता है तो अंदाजा लगाइए उसका क्या होता होगा?
एसोसिएशन में कुल 78 सदस्य हैं और ज्यादातर पंजीकृत हैं। अगर किसी का 20 लाख रुपये से अधिक का टर्नओवर होता है तो वह जीएसटी और अन्य टैक्स नियमानुसार देता है। सीजन बहुत ही ठंडा है ज्यादातर आयोजक खुद ही अपना हलवाई और सजावट की व्यवस्था करते हैं। हम सिर्फ किराया लेते हैं। - गोपेश अग्रवाल, बारातघर एसोसिएशन
शादी और पार्टियों आदि से कारोबार में जीएसटी में हेराफेरी की लगातार सूचनाएं मिल रही हैं। विभाग इसका परीक्षण भी कराता है, लेकिन इसके प्रमाण नहीं मिलते और न ही आयोजक सामने आते हैं, इसलिए विभाग रणनीति बना रहा है। राजस्व चोरी पर शिकंजा कसेंगे। कोई भी व्यक्ति इसकी गोपनीय सूचना भी दे सकता है। - मनोज प्रभाकर, उपायुक्त सीजीएसटी
विज्ञापन
पिछले साल एक जुलाई से देश भर में एक टैक्स व्यवस्था लागू हुई। इसके तहत शादी, पार्टी अथवा अन्य आयोजनों पर 18 फीसदी जीएसटी स्लैब लागू हुआ। इससे पहले सेवाकर वसूला जाता था। एक देश एक टैक्स व्यवस्था में कारोबारी सीमा भी 20 लाख रुपया प्रति वर्ष कर दी गई है। टैक्स चोरों ने इसका भी काट निकाल लिया और करोड़ों का कारोबार करने वाले बारातघर संचालकों ने अपने खातों में एक चौथाई भी इनकम नहीं दिखाई। जिससे वे जीएसटी व्यवस्था से बाहर हो गए। यह खेल भी बहुत ही सुनियोजित तरीके से चल रहा है और सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का टैक्स चोरी कर चूना लगाया जा रहा है।
विज्ञापन
यह है खेल
ज्यादातर बारातघर संचालक आयोजनकर्ता को पक्की रसीद नहीं देते हैं। सब कुछ कच्चे पर्चों पर होता है। आयोजनकर्ता भी शायद ही कभी रसीद मांगता हो। गिने चुने लोग जो मांगते हैं वह भी इनकम टैक्स विभाग आदि की नजरों से बचने के लिए गुणा-भाग कर रसीद लेते हैं। बारातघर मालिक भी अपने खातों में औनी-पौनी आय दिखाते हैं, इसमें ज्यादातर विवरण सिर्फ भवन किराए से संबंधित होता है। कैटरिंग, सजावट और अन्य मदों पर होने वाला भारी भरकम खर्चा अपने खातों में नहीं दिखाते हैं। जांच में संचालक यह कहकर बच जाते हैं कि कैटरिंग हमारी नहीं थी, न ही सजावट कराई, हमने परिसर किराए पर दिया, बाकी सब व्यवस्था आयोजनकर्ता ने की थी। छानबीन में जब भी यह पूछा जाता है कि किस पार्टी ने कार्यक्रम कराया तो उसका भी नाम पता ज्यादातर मामलों में नहीं मिलता है। ऐसे ही जीएसटी को हजम करने का खेल चल रहा है।
विज्ञापन
कम से कम दो लाख का कार्यक्रम
सर्वे के मुताबिक जिले भर में पांच सौ से अधिक बारातघर हैं। किसी भी शादी या पार्टी में दो लाख रुपये से कम का खर्च तो होता ही नहीं है। अधिक की कोई सीमा नहीं है। खुले मैदानों में होने वाले आयोजनों में यह खर्चा एक करोड़ भी पार कर जाता है। नामी गिरामी क्लबों के मैदानों में यह नजारा हर सीजन देखा जा सकता है, लेकिन संबंधित विभाग इसे लिखा-पढ़ी में पकड़ नहीं पाते।
बीडीए अफसर अपने ‘घर’ में तो सारे नियम जेब में
बीडीए अधिकारी अपना गुडवर्क दिखाने के बहाने बारातघरों को सिर्फ ‘खास मकसद’ नोटिस जारी करते हैं। इसके बाद शुरू होता है वसूली का खेल। जितने ज्यादा नोटिस, उतनी ज्यादा वसूली। फिर बारातघर संचालक भी समझते हैं कि जब बीडीए हमारी जेब में है तो कोई क्या कर सकता है। जिले में बमुश्किल 20 प्रतिशत बारातघर जीएसटी व्यवस्था में पंजीकृत हैं जबकि बीडीए के मानकों के अनुरूप गिने चुने बारातघर होंगे।
सड़क अपनी सरकार की तो पार्किंग की क्या जरूरत
ज्यादातर बारातघर और होटलों में पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। बीडीए से स्वीकृत होटलों ने पार्किंग की जगह हाल बना लिए हैं। करोड़ों रुपये हर साल कमाई होती है। सिविल लाइंस स्थित एक होटल संचालक पार्किंग शुल्क भी वसूल रहा है। शहर हो या हाईवे या फिर गलियां हर जगह आपको बारातघरों के बाहर जाम देखने को मिल जाएगा। इस मुद्दे पर प्रशासन और पुलिस भी खामोश रहती है। परेशानी सिर्फ जनता को होती है। अगर कोई इमरजेंसी में इन गलियों से गुजरता है तो अंदाजा लगाइए उसका क्या होता होगा?
एसोसिएशन में कुल 78 सदस्य हैं और ज्यादातर पंजीकृत हैं। अगर किसी का 20 लाख रुपये से अधिक का टर्नओवर होता है तो वह जीएसटी और अन्य टैक्स नियमानुसार देता है। सीजन बहुत ही ठंडा है ज्यादातर आयोजक खुद ही अपना हलवाई और सजावट की व्यवस्था करते हैं। हम सिर्फ किराया लेते हैं। - गोपेश अग्रवाल, बारातघर एसोसिएशन
शादी और पार्टियों आदि से कारोबार में जीएसटी में हेराफेरी की लगातार सूचनाएं मिल रही हैं। विभाग इसका परीक्षण भी कराता है, लेकिन इसके प्रमाण नहीं मिलते और न ही आयोजक सामने आते हैं, इसलिए विभाग रणनीति बना रहा है। राजस्व चोरी पर शिकंजा कसेंगे। कोई भी व्यक्ति इसकी गोपनीय सूचना भी दे सकता है। - मनोज प्रभाकर, उपायुक्त सीजीएसटी