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ठेकेदार को फ्री में मिलने वाले डामर की सप्लाई में होती है गड़बड़ी
Updated Mon, 10 Sep 2018 02:19 AM IST
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बरेली। सड़कों के खराब होने के लिए बदनाम बारिश हो रही है लेकिन इसमें डामर के इस्तेमाल में होने वाली गड़बड़ी भी कम जिम्मेदार नहीं है। सूत्र बताते हैं रोड बनाने में पीडब्ल्यूडी स्वीकृत मात्रा से 50-60 फीसदी ही डामर का इस्तेमाल करती है। बाकी में खेल हो जाने के बाद रोड की क्वालिटी पर पर इसका साफ असर दिखाई देता है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जाता है कि जिस रोड की समय-सीमा चार से पांच साल होती है, वह एक से दो साल में ही उधड़नी शुरू हो जाती है। ऊपर से लेकर नीचे तक सेटिंग होने से ऐसे इस खेल का पर्दाफाश भी नहीं हो पा रहा है।
डामर को इस्तेमाल करने का खेल इतना सटीक तरीके से होता है, उस पर निगाह दौड़ाना आसान नहीं है। सड़कों के छोटे काम (करीब एक करोड़ तक) के लिए डामर की ठेकेदार को सप्लाई पीडब्ल्यूडी देता है। सूत्रों की मानें तो तीन से चार मीटर चौड़ी सिंगल लेन रोड के लिए प्रति किलोमीटर करीब 35 से 40 ड्रम डामर का प्रयोग होना चाहिए। जबकि ठेकेदारों को बमुश्किल 20 से 25 ड्रम ही डामर की आपूर्ति मिलती है लेकिन खपत पूरी दिखा दी जाती है। इसके अलावा ड्रमों में डामर भरने में घटतौली भी बड़े पैमाने पर होती है। सूत्रों का कहना है कि मथुरा और आंवला से टैंकर में डामर आता है। बाद में इसे 180 किलो की क्षमता वाले ड्रमों में भरा जाता है। जबकि इसमें 130 से 150 किलो तक ही डामर की सप्लाई होती है। ऐसे में डामर के कम इस्तेमाल से रोड अपनी समय सीमा नहीं गुजार पाती।
बड़े ठेकेदार भी सरकारी डामर लेकर लगाते हैं चूना
छोटे ठेकेदारों को रोड बनाने के लिए डामर खुद पीडब्ल्यूडी देता है। जबकि बड़े ठेकेदारों को खुद डामर की खरीद करनी पड़ती है। चूंकि सरकारी और निजी डामर के रेट में काफी अंतर है, इसलिए बड़े ठेकेदार पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों से मिलीभगत से सरकारी डामर को चूना लगाती है। सूत्र बताते हैं कि बड़े ठेकेदार मथुरा या आंवला से आने वाले डामर को सरकारी रेट से ऊंचे भाव पर खरीद लेते हैं। जबकि उन्हें फिर भी उन्हें निजी रेट से प्रत्येक टैंकर पर लाखों रुपये का भुगतान मिल जाता है। जबकि पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी घटतौली करके इस कमी को पूरा कर देती हैं। हालांकि पीडब्ल्यूडी के अधिकारी इस गड़बड़ी की कोई जानकारी न होने की बात कह रहे हैं।
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मिट्टी-रेता और पानी भर कर पूरी होती है कमी
डामर के ड्रम की तौल को पूरा करने के लिए कर्मचारी डामर भरने से पहले रेता, ईंट या मिट्टी भर देते हैं। ऊपर पानी भी भर दिया जाता है। अगर ठेकेदार इसकी शिकायत करने की कोशिश भी करे तो उसे विभाग के लाख पचड़े झेलने पड़ते हैं।
शहर की सड़कों का भी हाल खराब
पीडब्ल्यूडी ने चौपुला से किला, कुदेशिया फाटक, बदायूं रोड बनाई थी। इसके अलावा शहर में नगर निगम और बीडीए ने भी तमाम रोड बनवाई है। यह सड़कें बारिश में पूरी उधड़ चुकी है। इससे स्टेडियम रोड, चौकी चौराहा रोड, ईंट पजाया के पास सहित कई जगहों रोड की हालत बेहद खराब है।
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डामर को इस्तेमाल करने का खेल इतना सटीक तरीके से होता है, उस पर निगाह दौड़ाना आसान नहीं है। सड़कों के छोटे काम (करीब एक करोड़ तक) के लिए डामर की ठेकेदार को सप्लाई पीडब्ल्यूडी देता है। सूत्रों की मानें तो तीन से चार मीटर चौड़ी सिंगल लेन रोड के लिए प्रति किलोमीटर करीब 35 से 40 ड्रम डामर का प्रयोग होना चाहिए। जबकि ठेकेदारों को बमुश्किल 20 से 25 ड्रम ही डामर की आपूर्ति मिलती है लेकिन खपत पूरी दिखा दी जाती है। इसके अलावा ड्रमों में डामर भरने में घटतौली भी बड़े पैमाने पर होती है। सूत्रों का कहना है कि मथुरा और आंवला से टैंकर में डामर आता है। बाद में इसे 180 किलो की क्षमता वाले ड्रमों में भरा जाता है। जबकि इसमें 130 से 150 किलो तक ही डामर की सप्लाई होती है। ऐसे में डामर के कम इस्तेमाल से रोड अपनी समय सीमा नहीं गुजार पाती।
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बड़े ठेकेदार भी सरकारी डामर लेकर लगाते हैं चूना
छोटे ठेकेदारों को रोड बनाने के लिए डामर खुद पीडब्ल्यूडी देता है। जबकि बड़े ठेकेदारों को खुद डामर की खरीद करनी पड़ती है। चूंकि सरकारी और निजी डामर के रेट में काफी अंतर है, इसलिए बड़े ठेकेदार पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों से मिलीभगत से सरकारी डामर को चूना लगाती है। सूत्र बताते हैं कि बड़े ठेकेदार मथुरा या आंवला से आने वाले डामर को सरकारी रेट से ऊंचे भाव पर खरीद लेते हैं। जबकि उन्हें फिर भी उन्हें निजी रेट से प्रत्येक टैंकर पर लाखों रुपये का भुगतान मिल जाता है। जबकि पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी घटतौली करके इस कमी को पूरा कर देती हैं। हालांकि पीडब्ल्यूडी के अधिकारी इस गड़बड़ी की कोई जानकारी न होने की बात कह रहे हैं।
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मिट्टी-रेता और पानी भर कर पूरी होती है कमी
डामर के ड्रम की तौल को पूरा करने के लिए कर्मचारी डामर भरने से पहले रेता, ईंट या मिट्टी भर देते हैं। ऊपर पानी भी भर दिया जाता है। अगर ठेकेदार इसकी शिकायत करने की कोशिश भी करे तो उसे विभाग के लाख पचड़े झेलने पड़ते हैं।
शहर की सड़कों का भी हाल खराब
पीडब्ल्यूडी ने चौपुला से किला, कुदेशिया फाटक, बदायूं रोड बनाई थी। इसके अलावा शहर में नगर निगम और बीडीए ने भी तमाम रोड बनवाई है। यह सड़कें बारिश में पूरी उधड़ चुकी है। इससे स्टेडियम रोड, चौकी चौराहा रोड, ईंट पजाया के पास सहित कई जगहों रोड की हालत बेहद खराब है।