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अंतिम नहीं, आलोचक की पहली कड़ी हूं मैं..

Thu, 21 Feb 2019 01:38 AM IST
pawan chandra पवन चंद्रा
Updated Thu, 21 Feb 2019 01:38 AM IST
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अंतिम नहीं, आलोचक की पहली कड़ी हूं मैं..
बरेली। जाने-माने साहित्यकार और समालोचक प्रोफेसर नामवर सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके लेख, विचार और शब्द हमेशा लोगों के जहन में ताजा रहेंगे। एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में 30 नवंबर 2011 में हुए दीक्षांत समारोह में कही उनकी बातें कैंपस के शिक्षकों के जहन में आज भी ताजा हैं। उन्होंने कहा था, आज शिक्षक गुरु नहीं, गुरु घंटाल हैं, वे घंटा बजते ही कक्षा छोड़कर चले जाते हैं। पहले घंटे नहीं होते थे। ‘हिंग्लिश’ आज खिचड़ी जैसी है, जो कभी-कभी खाने में आनंद देती है। उन्होंने खुद के लिए कहा था, अंतिम नहीं.. आलोचक की पहली कड़ी हूं मैं।
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साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त प्रोफेसर नामवर सिंह बनारस के रहने वाले थे। बरेली के शिक्षकों से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा। बरेली कॉलेज में स्वर्गीय वीरेन डंगवाल जी ने एक कार्यक्रम कराया था, जिसमें देश के साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कई साहित्यकार आए थे। उसमें प्रोफेसर नामवर सिंह भी थे। बरेली कॉलेज के शिक्षकों के जहन में आज भी उनकी बातें तरोताजा हैं। विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि हिंग्लिश हमारे सरकारी कामकाज में घुस रही है जबकि पाकिस्तान में लोग हिंदी में बोल रहे हैं। उन्होंने खुद के लिए कहा, अंतिम नहीं.. आलोचक की पहली कड़ी हूं मैं। उन्होंने छात्रसंघ की वकालत भी की थी। उन्हाेंने विश्वविद्यालय द्वारा दिया गया भाषण न पढ़कर खुद का भाषण लिखा और मंच से पढ़ा।
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मैं नामवर जी से मिला तो नहीं लेकिन उनको सुना है। उनकी किताबें पढ़ी हैं। उन जैसा समालोचक शायद ही कोई हो। उनकी कृतियों की हम प्रतीक्षा करते थे। हर विषय को लेकर उनका अलग ही नजरिया था जो उनको सबसे खास बनाता था। उनका जाना साहित्य के लिए बड़ी क्षति है।
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- प्रोफेसर अनिल शुक्ल, कुलपति रुविवि

छात्र जीवन में मैंने उनको जेएनयू में कई बार सुना है। बरेली कॉलेज में वीरेन डंगवाल जी ने एक कार्यक्रम कराया था जिसका संचालन मैंने ही किया था। उसमें प्रो. नामवर सिंह भी आए थे। इस कार्यक्रम में साहित्य के बड़े-बड़े दिग्गज थे, लेकिन प्रोफेसर नामवर सिंह ने एक अलग छापा छोड़ी थी। उनकी कहीं बातें आज भी मुझे याद हैं। उनका जाना साहित्य की दुनिया में बड़ी क्षति है।

-डॉ. एसी त्रिपाठी, एसोसिएट प्रोफेसर दर्शनशास्त्र बरेली कॉलेज

नामवर जी का एक बार बरेली कॉलेज आना हुआ था। उस वक्त मैंने उनको सुना। गजब की शख्सियत थी। विषयों को देखने का नजरिया ही उनको साहित्य की दुनिया में अलग स्थापित करता है।
-डॉ. एसपी मौर्या, विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग बरेली कॉलेज
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