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‘बची-खुची संस्कृति भी खा रही हैं फिल्में’
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बरेली। फिल्मों की कमजोर स्क्रिप्ट और स्टार कास्ट हावी होने से फिल्में सकारात्मक छाप नहीं छोड़ पा रही हैं। हां बची-खुची भारतीय संस्कृति को खा जरूर रही हैं। जब तक निर्माता-निर्देशक स्टार के बजाय स्क्रिप्ट पर ध्यान नहीं देंगे तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। यह कहना है प्रसिद्ध गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का। उन्होंने कहा कि फिल्मों का प्रभाव इस कदर है कि बच्चे को मां डांट दे तो वह कहता है, अपना टाइम भी आएगा।
शुक्रवार को अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि पटकथाओं में समाज का लोप है। जो कुछ है वह सब नायक के इर्द-गिर्द घूमता है, इसलिए फिल्मों की तैयार पटकथा भी कई बार नायक के अनुसार ही बदल दी जाती है। इससे अर्थ का अनर्थ होता है और खामियाजा समाज और फिल्म के निर्माता-निर्देशक भुगतते हैं। उन्होंने फिल्मों की पटकथा और गायन शैली को बदलकर उसमें समाज की चेतना को मिलाने का सुझाव दिया। मैथिली रचनाओं को उन्होंने लोक चेतना से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि मैथिली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ने लोक चेतना को आधार बनाने के लिए लोक भाषा को अपनाया। वह इसको आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि छायावादी गीत में भावनाएं उभर कर आती हैं जो आधुनिक चेतना को भी अपने साथ जोड़ती हैं। बरेली से जुड़ाव के सवाल पर कहा कि साहित्यकारों के लिए बरेली उर्वर भूमि हैं। यहां पंडित राधेश्याम कथावाचक, किशन सरोज, वसीम बरेलवी और ज्ञानवती सक्सेना जैसे धर्मज्ञ, साहित्यकार, शायर और गीतकार हुए हैं। इनके जरिए बरेली का नाम देश-दुनिया तक पहुंचा। बता दें कि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र करीब छह वर्ष बाद बरेली आए।
परिचय
बिहार के देवधा स्थित समस्तीपुर के डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य, विख्यात आलोचक नामवर सिंह के गुरु भाई और गीतकार किशन सरोज के बेहद करीबी हैं। उन्हें हिंदी और मैथिली भाषा में गीत, निबंध, कहानी, रिपोर्ताज और पटकथा लेखन में ख्याति प्राप्त है। जाल फेंक रे मछेरेे, जाड़े में पहाड़, शिखरिणी, ऋतुराज एक पल का उनका गीत संग्रह है। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ‘क्यों और कैसे’ के लिए पटकथा लेखन भी किया है। रूस का अंतरराष्ट्रीय अलेग्जेंडर पुष्किन सम्मान, राष्ट्रकवि दिनकर जन्मशती राष्ट्रीय सम्मान, दुष्यंत कुमार अलंकरण, साहित्य भूषण उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान समेत दो दर्जन से अधिक सम्मान उन्हें मिल चुके हैं।
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शुक्रवार को अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि पटकथाओं में समाज का लोप है। जो कुछ है वह सब नायक के इर्द-गिर्द घूमता है, इसलिए फिल्मों की तैयार पटकथा भी कई बार नायक के अनुसार ही बदल दी जाती है। इससे अर्थ का अनर्थ होता है और खामियाजा समाज और फिल्म के निर्माता-निर्देशक भुगतते हैं। उन्होंने फिल्मों की पटकथा और गायन शैली को बदलकर उसमें समाज की चेतना को मिलाने का सुझाव दिया। मैथिली रचनाओं को उन्होंने लोक चेतना से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि मैथिली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ने लोक चेतना को आधार बनाने के लिए लोक भाषा को अपनाया। वह इसको आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि छायावादी गीत में भावनाएं उभर कर आती हैं जो आधुनिक चेतना को भी अपने साथ जोड़ती हैं। बरेली से जुड़ाव के सवाल पर कहा कि साहित्यकारों के लिए बरेली उर्वर भूमि हैं। यहां पंडित राधेश्याम कथावाचक, किशन सरोज, वसीम बरेलवी और ज्ञानवती सक्सेना जैसे धर्मज्ञ, साहित्यकार, शायर और गीतकार हुए हैं। इनके जरिए बरेली का नाम देश-दुनिया तक पहुंचा। बता दें कि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र करीब छह वर्ष बाद बरेली आए।
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परिचय
बिहार के देवधा स्थित समस्तीपुर के डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य, विख्यात आलोचक नामवर सिंह के गुरु भाई और गीतकार किशन सरोज के बेहद करीबी हैं। उन्हें हिंदी और मैथिली भाषा में गीत, निबंध, कहानी, रिपोर्ताज और पटकथा लेखन में ख्याति प्राप्त है। जाल फेंक रे मछेरेे, जाड़े में पहाड़, शिखरिणी, ऋतुराज एक पल का उनका गीत संग्रह है। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ‘क्यों और कैसे’ के लिए पटकथा लेखन भी किया है। रूस का अंतरराष्ट्रीय अलेग्जेंडर पुष्किन सम्मान, राष्ट्रकवि दिनकर जन्मशती राष्ट्रीय सम्मान, दुष्यंत कुमार अलंकरण, साहित्य भूषण उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान समेत दो दर्जन से अधिक सम्मान उन्हें मिल चुके हैं।
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